समकालीन कहानियों में बाज़ार का दबाव और भूमण्डलीकरण के बाद हुए बदलाव साफ नजर आते हैं। ये कहानियाँ अपने वक़्त के बदलते हुए समाज को रेखांकित करती हैं। यह बात जनवादी लेखक संघ लखनऊ के क़ैफ़ी आज़मी एकेडमी में ‘लखनऊ में कहानी’ कार्यक्रम में वक्ताओं ने कही।
कार्यक्रम के पहले सत्र में पाँच कहानीकारों की कहानियों का पाठ हुआ। सबसे पहले अवधेश श्रीवास्तव के अस्वस्थ होने के कारण उनकी कहानी ‘सुदामाज’ का पाठ आभा खरे ने किया। उसके बाद क्रमशः प्रताप दीक्षित ने अपनी कहानी ‘आउट ऑफ डेट’, मनीष वैद्य ने ‘एचएमटी 3511’, सोनी पाण्डेय ने ‘भात’ और संदीप मील ने ‘लाश के साथ एक रात’ कहानी का पाठ किया।
इसके दूसरे सत्र में पढ़ी गई कहानियों पर कथाकार अखिलेश की अध्यक्षता में चर्चा हुई। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए उन्होंने कहा कि अवधेश जी की कहानी अपने इरादे में अच्छी है। लेकिन यह अंत का पीछा करती हुई कहानी है। प्रताप जी की कहानी में कुछ तथ्यात्मक बदलाव लाज़िम हैं। मनीष वैद्य की कहानी भूमंडलीकरण के दौर में अच्छी कहानी है। सोनी के पास ग्राम जीवन की गहरी सूझ है। यहाँ मानवीय रिश्ते प्रमुख हैं। संदीप मील अपनी बात कहने के लिए यथार्थ के पार जाते हैं। उनकी कहानी नया शिल्प गढ़ते हैं।
वरिष्ठ कथा आलोचक संजीव कुमार ने कहा कि संदीप मील की कहानी पृष्ठतानाव निर्मित करती है। यह नया प्रयोग है। बाकी चार कहानियाँ समकालीन परंपरा से थोड़ा पीछे हैं। आज का कहानीकार केन्द्रित होकर कम सोच पा रहा है। प्रक्रिया पक्ष और परिणति पक्ष दोनों पर विचार होना चाहिए। प्रताप जी की कहानी चकित करती है। सोनी जी ने अपनी कथाभाषा अर्जित कर ली है। मनीष की कहानी का गठन सुन्दर है। अनुराधा गुप्ता का मत था कि सोनी पांडेय आंचलिकता के रस को लेकर कहानी लिखती हैं। मनीष वैद्य और प्रताप दीक्षित की कहानियों में बाजार के दबाव को महसूस किया जा सकता है। उपभोक्तावाद जीते जागते आदमी को मरघट तक पहुँचा देता है। अवधेश श्रीवास्तव की कहानी अपने ट्रीटमेंट में गड़बड़ है। संदीप मील की कहानी में तीखा व्यंग्य है। कहानी बने बनाये ढाँचे को तोड़ती है। राजेन्द्र वर्मा ने अवधेश श्रीवास्तव की कहानी पर विशेष तौर पर बात की। कहानी की अस्वाभाविकता और संवाद शैली की कमी की ओर उन्होंने इशारा किया। प्रताप दीक्षित की कहानी में कथारस बना रहता है। मनीष वैद्य की कहानी में गाँव का मनोविज्ञान है। सोनी पांडेय की कहानी पूरे परिवेश को उभारती है। संदीप मील की कहानी प्रतीक शैली में गजब की बन पड़ी है।
संध्या सिंह ने मुख्यतः प्रताप दीक्षित की कहानी पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि प्रताप दीक्षित की कहानियों में आदर्शोन्मुख यथार्थवाद दिखाई देता है। उनकी इस कहानी में बाजार का स्वर प्रमुख है। मनीष वैद्य की कहानी में भी यही स्वर प्रमुख है। सोनी पांडेय के यहाँ लोक का स्वर मुख्य है। संदीप मील की कहानी प्रयोगधर्मी है। अवधेश श्रीवास्तव की कहानी की भाषा में कहीं-कहीं बदलाव अपेक्षित है।
कार्यक्रम का संचालन जलेस के सचिव ज्ञानप्रकाश चौबे ने किया और अतिथियों को धन्यवाद ज्ञापन जलेस अध्यक्ष नलिन रंजन सिंह द्वारा किया गया।

