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शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। दिल्ली के कमानी सभागार में नाटक ‘समुद्र-मंथन’ की कल्पनाशील प्रस्तुति के साथ भारत रंग महोत्सव 2024 का समापन हो गया। आसिफ़ अली के लिखे इस नाटक का निर्देशन और संगीत राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी ने किया। नाटक की प्रस्तुति को अधिक प्रभावशाली और भव्य बनाने के लिये ऑडियो-विज़ुअल तकनीक का सदुपयोग किया गया। इस समन्वयन ने दर्शकों को रोमांच से भर दिया। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) दिल्ली द्वारा आयोजित भारत रंग महोत्सव का यह 25 वां महोत्सव था। देश के 15 शहरों में यह 21 दिन चला। इसमें 200 से अधिक प्रस्तियां हुईं। 1500 स्थानों पर एक ही समय में नाटकों के मंचन का वर्ल्ड रिकॉर्ड बना।
समापन समारोह में 6 महिला अतिथि: नाटक के मंचन से पहले समापन का औपचारिक कार्यक्रम संपन्न हुआ। कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों में अग्रणी स्थान रखने वाली छह विदूषी महिलाओं को निमंत्रित किया गया। इनमें बतौर मुख्य अतिथि कथक नृत्यांगना सुश्री शोवना नारायण के साथ ही लोक गायिका मालिनी अवस्थी,अभिनेत्री हिमांशी शिवपुरी के साथ श्रीमती उमा नंदूरी, नमिता जोशी और रश्मी सलूजा शामिल हुईं। उमा जी संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव हैं जबकि रश्मी सलूजा, रेलियगेयर के निदेशक मंडल की अध्यक्ष और नमिता जोशी नवभारत टाइम्स की इंटरटेनमेंट एडिटर हैं। उनके साथ ही मंच को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) सोसायटी के अध्यक्ष और ख्यात अभिनेता परेश रावल और विद्यालय के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी ने मंच साझा किया। एनएसडी के रजिस्ट्रार प्रदीप के मोहंती ने अंत में धन्यवाद ज्ञापित किया। प्रारंभ में गीतकार और रानावि के पूर्व छात्र स्वानंद किरकिरे के लिखे एंथम ‘जय-जय भारंगम्, वंदे भारंगम्’ सुनाया गया।
भव्य प्रस्तुति ने जगाई दिलचस्पी: ढाई हज़ार साल पुराने इस पौराणिक वृतांत से प्राय: सभी लोग परिचित हैं। मानस पटल पर अंकित अकल्पनीय दृश्यों वाले इस नाटक को अगर प्रस्तुति के स्तर पर,बड़ा और भव्य ना बनाया जाता, तब यह नाटक एक साधारण प्रस्तुति बनकर रह जाता। श्री त्रिपाठी ने अपनी संकल्पना में इस बात का विशेष ध्यान रखा। इस तरह महर्षि दुर्वासा से लेकर भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, शिवजी, राक्षसों और ऐरावत हाथी से लेकर कछुए, गरूड़ पक्षी, कामधेनु गाय, वासुकि नाग जैसे पात्रों वाला यह नाटक दर्शकों सम्मोहित करता चला गया। नाटक के विषय में एनएसडी के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी ने कहा – ‘समुद्र मंथन विष्णु पुराण के पूर्व भाग के प्रथम अंश में उल्लिखित भारतीय पौराणिक साहित्य की महत्वपूर्ण कथा है। भरत मुनि रचित नाट्य शास्त्र में इसे विश्व का सबसे पहला नाटक माना गया है’।
अभिनय और संगीत ने जगाई दिलचस्पी: अभिनय,संगीत और नृत्य संयोजन नाटक के उत्कृष्ट कला पक्ष रहे। मंच सज्जा, वेशभूषा, प्रकाश संयोजन के अलावा वासुकि नाग या ऐरावत हाथी आदि का कलात्मक निर्माण और उनका नाटक में उपयोग दिलचस्प अनुभव बना। रंगमंडल प्रमुख राजेश सिंह ने कहा कि इस नाटक को कलाकारों ने सिर्फ 15 दिनों में तैयार किया। एक घंटे दस मिनट के इस नाटक ने अंत तक दर्शकों को बाँधकर रखा। हालांकि नाटक के विषय को लेकर दर्शकों की अलग-अलग प्रतिक्रिया रही।
क्या है समुद्र मंथन की कथा: भारतीय धर्म ग्रंथों के अनुसार, एक बार महर्षि दुर्वासा के श्राप की वजह से स्वर्ग – ऐश्वर्य, धन और वैभव विहीन हो गया था। तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास गये। भगवान विष्णु ने उन्हें दैत्यों या असुरों के साथ मिलकर, समुद्र मंथन का उपाय बताया। भगवान विष्णु ने कहा, समुद्र मंथन से अमृत निकल आयेगा, उसे ग्रहण कर तुम अमर हो जाओगे। मगर मंथन के समय समुंद्र से विष निकलने लगा, तब भगवान शिव ने रक्षा की और उन्होंने विष को पी लिया। अंत में समुद्र से निकले अमृत कलश को राक्षसों ने प्राप्त कर लिया। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया। उन्होंने मोहिनी के रूप में असुरों को अपने वश में कर लिया और उनके हाथ से अमृत कलश लेकर उसे देवताओं को सौंप दिया।
मालिनी बनी दर्शकों का आकर्षण: समापन संध्या की एक और विशेष बात मालिनी अवस्थी की शादी-ब्याह के दौरान घर में सहज गाये जाने वाले एक लोकगीत की प्रस्तुति थी। इस गीत को जब मालिनी ने अपने अंदाज़ में गाने के साथ ही अभिनीत कर दिखाया, दर्शक ताली बजाये बिना नहीं रह सके। उन्होंने बताया कि किस तरह से सहज भाव से महिलाएं घर के काम निपटाते हुए शादी के कामों को करती हैं। बिना कृत्रितमा के अपने संवेदनशील भावों को प्रकट करती हैं। उनका घर मंच तो नहीं होता, परंतु वह भी हमारी संस्कृति और कला से कुछ कम नहीं होता। समापन समारोह की अगली रिपोर्ट में आगे पढ़िये –
https://indorestudio.com/manav-ke-hit-me-ho-hamari-kala/

