शकील अख्तर, इंदौर स्टूडियो। ‘सानंद’ का सदस्य बनने के लिए एक लंबी ‘प्रतीक्षा सूची’ है। अगर हमारे पास अपना बड़ा और सर्व-सुविधायुक्त नाट्य गृह हो, तो हमारी सदस्य संख्या 4 हज़ार से बढ़कर दोगुनी यानी 8 हज़ार हो सकती है।’ यह बात मराठी समाज की प्रतिष्ठित संस्था ‘सानंद न्यास’ इंदौर के अध्यक्ष जयंत भिसे और मानद सचिव संजीव वावीकर ने कही। उनसे संस्था के कला सफ़र और इसके उद्देश्य के बारे में चर्चा हुई। यह संस्था एकजुटता और सहकारिता की प्रतीक है—एक ऐसा रोडमैप जिसे अपनाकर कोई भी कला संगठन सफलता के नए आयाम छू सकता है।
रिकॉर्ड दर्शक संख्या,अनुशासित व्यवहार: ‘सानंद न्यास’ न केवल रिकॉर्ड दर्शक संख्या, बल्कि दर्शकों के अनुशासित व्यवहार के लिये भी विख्यात है। संस्था के दर्शक बिना कहे अपना वार्षिक सदस्यता शुल्क स्वयं जमा करते हैं और अन्य सदस्यों को कार्यक्रम स्थल तक लाने-ले जाने के लिए ‘पिक एंड ड्रॉप’ की सेवाएं देते हैं। यह संस्था उन सभी नाट्य समूहों के लिये एक उदाहरण है जो दर्शकों की कमी का रोना रोते हैं। इसके विपरीत, ‘सानंद’ के कोष में दर्शकों के अंशदान से प्रतिवर्ष लगभग 80 लाख रुपये का योगदान जमा होते हैं। कला के क्षेत्र में इन्हीं उपलब्धियों के चलते वर्ष 2023 में मध्य प्रदेश सरकार ने संस्था को ‘राजा मान सिंह तोमर पुरस्कार’ से नवाजा है।
‘एक नाटक, पाँच शो’ का प्रबंधन करती है संस्था: नाट्य गृह की आवश्यकता पर चर्चा करते हुए पदाधिकारियों ने बताया कि इंदौर के वर्तमान सभागारों की क्षमता सीमित होने के कारण विस्तार रुका हुआ है। यही कारण है कि सानंद की सदस्यता पाने की इच्छा रखने वाले समाज के बहुत से सदस्य ‘वेटिंग लिस्ट’ में हैं। फिलहाल 4 हज़ार दर्शकों के प्रबंधन के लिये संस्था को एक ही नाटक के पाँच शो आयोजित करने पड़ते हैं। जयंत जी ने कहा, “हम चाहते हैं कि सरकार उचित मूल्य पर उपयुक्त भूमि प्रदान करे, ताकि हम अपने स्वयं के भव्य नाट्य गृह का स्वप्न साकार कर सकें।”
कलाकारों की दृष्टि से ‘आदर्श प्रेक्षागृह’ की परिकल्पना: सरकारी नाट्य गृहों में कलाकारों के लिए सुविधाओं की कमी पर चिंता जताते हुए जयंत जी ने स्पष्ट किया कि भविष्य में बनने वाला ‘सानंद’ का अपना नाट्य गृह, न केवल दर्शकों के लिए आरामदायक होगा, बल्कि ‘परफॉर्मर्स’ की तकनीकी और बुनियादी जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया एक ‘आदर्श मंच’ होगा।
महाप्रबंधक से सांस्कृतिक सेनानी तक का सफर: आपको बता दें, संस्था के अध्यक्ष जयंत भिसे लंबे समय तक सचिव के रूप में सेवारत रहे हैं। इंदौर क्लॉथ मार्केट सहकारी बैंक में महाप्रबंधक (जीएम) के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) लेने के बाद वे पूर्णतः सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यों में समर्पित हो गए। वे सदैव खुद को संस्था का एक विनम्र कार्यकर्ता मानते हैं और प्रारंभ से ही आरएसएस से जुड़े विभिन्न सामाजिक संगठनों के माध्यम से सेवा कार्य कर रहे हैं। जयंत भिसे भोपाल की उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत कला अकादमी के निदेशक भी रहे।
भरोसे की बुनियाद पर वटवृक्ष बना ‘सानंद’: संस्था की स्थापना का इतिहास साझा करते हुए बताया गया कि 80 के दशक के आखिर में जब मराठी नाटकों का दौर थमता दिख रहा था, उस वक्त इंजीनियर सुधाकर काले जी के मन में एक तड़प थी कि अपनी संस्कृति को कैसे बचाया जाए। जयंत जी ने कहा- ‘हमने 1992 में मराठी समाज के करीब 800 परिवारों से सीधा संपर्क किया और उनसे केवल 200 रुपये लेकर साल भर नाटक दिखाने का वादा किया। वह भरोसा ही था जिसने ‘सानंद’ का पौधा रोपा जो आज वटवृक्ष बन गया है’।
अनुशासन का अनूठा ‘सीट नंबर’ मॉडल: संस्था की सबसे बड़ी विशेषता इसका स्व-अनुशासन है। 4 हज़ार सदस्यों को पाँच समूहों में बांटकर स्थायी सीट नंबर आवंटित कर दिए जाते हैं। यहाँ कोई ‘गेट कीपर’ नहीं होता; सदस्य स्वयं समय पर आकर अपनी सीट ग्रहण करते हैं। तीसरी घंटी बजते ही पूरा सभागार में शांत वातावरण छा जाता है।
दिग्गजों की नजर में ‘नाट्य आंदोलन का विश्वविद्यालय’: पदाधिकारियों ने एक महत्वपूर्ण बात भी साझा की। उन्होंने कहा – ‘प्रसिद्ध अभिनेता डॉ. श्रीराम लागू ने सानंद को ‘नाट्य आंदोलन का विश्वविद्यालय’ की संज्ञा दी थी, वहीं महान कलाकार प्रभाकर पणशीकर ने इसे हर शहर के लिए एक ‘अनिवार्य मॉडल’ बताया। पंडित भीमसेन जोशी, पंडित जसराज, आशा भोंसले और उस्ताद जाकिर हुसैन जैसे विश्वविख्यात कलाकार इस मंच पर यादगार प्रस्तुतियां दे चुके हैं।
संस्कारों का संगम: फुलोरा, गोष्टा और दिवाली पहाट: नाट्य प्रस्तुतियों के अलावा संस्था ‘दिवाली पहाट’, ‘गुड़ी पड़वा’ और ‘व्याख्यान माला’ जैसे आयोजन नियमित करती है। ‘गोष्टा’ (कथा वाचन) के माध्यम से परिवारों को जोड़ा गया है, तो ‘फुलोरा’ के जरिए शास्त्रीय संगीत और साहित्यिक विमर्श का मार्ग प्रशस्त होता है। बाबा साहेब पुरंदरे और राहुल द्रविड़ जैसी विभूतियों का आगमन भी संस्था के इतिहास में दर्ज है।
‘आनंद जत्रा’: मिनी महाराष्ट्र का अहसास: संस्था अब तक 1985 कार्यक्रम कर चुकी है। इन सभी आयोजनों के बीच ‘आनंद जत्रा’ (मेला) एक उत्सव की तरह है, जहाँ पारंपरिक मराठी व्यंजनों का स्वाद और मेलों का उत्साह मिलकर इंदौर में ‘मिनी महाराष्ट्र’ को जीवंत कर देते हैं। इस वार्षिक आयोजन का शहर के लोगों को बेसब्री से इंतजार रहता है।
सहकारिता की पराकाष्ठा: जब दर्शक ही बने सारथी: जब कार्यक्रमों का केंद्र शहर से दूर खंडवा रोड पर शिफ्ट हुआ, तब सदस्यों ने एक-दूसरे की मदद की अनूठी मिसाल पेश की। जिनके पास वाहन थे, उन्होंने स्वेच्छा से अपरिचित साथी सदस्यों को ‘लिफ्ट’ देना शुरू किया। इस अपनेपन ने अजनबी सदस्यों को भी एक-दूसरे से परिवार की तरह जोड़ दिया।
मैनेजमेंट जगत के लिए ‘केस स्टडी’ बना ‘सानंद मॉडल’: बिना किसी कॉर्पोरेट फंड या सरकारी अनुदान के, केवल जन-भागीदारी से चल रहे इस आंदोलन को दिल्ली के ‘BIT’ और इंदौर के ‘IMS’ ने अपने मैनेजमेंट पाठ्यक्रम में ‘केस स्टडी’ के रूप में शामिल किया है। छात्र अध्ययन कर रहे हैं कि कैसे ‘सहकारिता’ के माध्यम से इतना बड़ा सांस्कृतिक ढांचा खड़ा किया जा सकता है।
‘सानंद’ के मंच को सुशोभित करने वाले यादगार कार्यक्रम: बाबा महाराज सातारकर का वारकरी कीर्तन, बाबा साहेब पुरंदरे का शिवचरित्र व्याख्यान, पं. भीमसेन जोशी की संतवाणी, शाहीर साबले की ‘महाराष्ट्राची लोकधारा’, गीतरामायण, उस्ताद ज़ाकिर हुसैन का तबला वादन, ज़ी टीवी का ‘सा रे गा मा पा लिटिल चैम्प्स’, आशा भोंसले से संवाद, और पं. हरिहरन और शंकर महादेवन की लाइव प्रस्तुतियां सानंद के स्वर्णिम इतिहास का हिस्सा रही हैं।
‘सानंद न्यास’ के संपर्क में कला जगत की हस्तियां: डॉ. श्रीराम लागू, अशोक सराफ, विक्रम गोखले, जितेन्द्र जोशी, रीमा लागू, दिलीप प्रभावळकर, मृणाल कुलकर्णी, सदाशिव अमरापुरकर, भरत जाधव, सचिन खेडेकर, मुक्ता बर्वे, निवेदिता सराफ, रत्नाकर मतकरी और शरद पोंक्षे सहित मराठी और भारतीय कला जगत की अनगिनत हस्तियां सानंद परिवार से जुड़ी रही हैं। आगे पढ़िये – गुरू-शिष्य परंपरा योजना के नये नियमों से कला जगत में खलबली- https://indorestudio.com/guru-shishya-parampara-scheme-new-rules-controversy/
हमारा अपना ‘नाट्य गृह’ हो तो 8 हज़ार तक पहुँच जाएगी दर्शकों की संख्या
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