नाट्य समीक्षा- अख़तर अली
नाटक – हरसिंगार
लेखक – श्रीकांत किशोर
संगीत एवं निर्देशक – संजय उपाध्याय
प्रस्तुति – छत्तीसगढ़ फ़िल्म एंड विजुअल आर्ट सोसायटी ,रायपुर
छत पर बने प्रेक्षागृह में खेला गया नाटक : बेहतरीन वेशभूषा से सुसज्जित यह नाटक जब मंच पर अवतरित हुआ तब पहले ही दृश्य में दर्शक समझ गए कि संगीत इस नाटक का असली लिबास है। संजय उपाध्याय …शायद इस जगत में आदम का जन्म इसीलिए हुआ क्योंकि भविष्य में नाट्य जगत में संजय उपाध्याय का जन्म होना था। हाल ही में इस नाटक का मंचन रायपुर में किया गया। रायपुर के रंगकर्मी सुभाष–रचना मिश्र ने घर की छत पर ‘जनमंच’ नाम का एक मिनी आडिटोरियम बनाया है , सौ दर्शको की क्षमता वाला रंगमंच की तकनीक को ध्यान में रख कर बनाया गया प्रेक्षागृह इस बात का अहसास कराता ही नहीं है कि इसे रेत सीमेंट और ईंट से बनाया गया है, क्योंकि यह थियेटर की दीवानगी , नाट्य कला के प्रति उत्साह और बेहतर कर सकने की ललक से बनाया गया है । उम्मीद की जानी चाहिये कि भविष्य में यह मंच जिसका नाम ‘जनमंच’ रखा गया है अनेक यादगार नाट्य प्रस्तुतियों का साक्षी बनेगा ।
नाट्य शिविर में तैयार हुआ नाटक : यह नाटक 18 दिवसीय नाट्य शिविर में तैयार किया गया था । हरसिंगार श्रीकांत किशोर की नाट्य रचना है जो संजय उपाध्याय की नाट्य प्रस्तुति बनी । लिखते समय हर लेखक को निर्देशक और तैयारी के समय हर निर्देशक को लेखक होना होता है तभी एक अच्छी स्कृप्ट और एक अच्छी नाट्य प्रस्तुति तैयार होती है | संजय उपाध्याय इस समय रंग क्षेत्र में पूरे देश का ध्यान खींचे हुए है , मंच का यह कुशल शिल्पी नाटक को तराशने में महारथ हासिल किये हुए है , यही वजह है कि इनका अभिनेता आँख से बोलता है और ज़ुबान से इशारे करता है । दर्शकों की कल्पना के बाहर का कुछ मंच पर घट जाना ही नाट्य कला है और इसे संजय उपाध्याय का रचा हर दृश्य और हर अभिनेता सच साबित करता है ।| संजय उपाध्याय लेखक के संवाद , अभिनेता की देह , प्रकाश की किरण और संगीत की स्वर लहरी के संयोजन से मंच पर जो प्रभाव पैदा करते है वह प्रभाव ही उनके काम की पहचान है ।
सत्ता में शक्ति के नाजायज़ इस्तेमाल की पोल : नाटक सत्ता में शक्ति के नाजायज़ इस्तेमाल की परतें खोलता है ,लेकिन नाटक अपने आरंभ से अंत तक की जो कलात्मक यात्रा करता है वह दर्शनीय है , यह यात्रा दर्शकों को आनंदित कर देती है । नाटक का पहला ही दृश्य दर्शकों को सावधान कर देता है की बीस प्रतिशत अतरिक्त चौकन्ना होकर नाटक देखना होगा , देखने की ज़रा सी भी चूक पछतावा बन जायेगी । नाटक में अभिनय का स्तर बहुत उंचाई तक पंहुचा । हरबिसना की भूमिका में भूपेन्द्र सेठिया और हरबिसनी की भूमिका में गरिमा दिवाकर ने मंच पर जो कमाल पैदा किया उस कमाल को सलाम कहना ही बनता है , गरिमा का गरिमापूर्ण अभिनय मंच पर अभिनय की नई परिभाषा गढ़ता है , चंचलता वाले दृश्य में तो गरिमा फ़िदा बाई का अहसास करा रही थी , गरिमा ने प्रेम वाले दृश्य में उत्साह और भूपेन्द्र ने पीड़ा वाले दृश्य में जो करुणा पैदा की यह उन्ही से संभव है जो दक्ष है ।
छोटे-छोटे दृश्यों में अभिनय के रूप : नाटक में हरबिसना और हरबिसनी के समानांतर एक जोड़ी और थी सूत्रधार और नटी के रूप में अनुपम तिवारी और सिग्मा उपाध्याय की जोड़ी । इन दोनों के अंदर अभिनय के कई रूप भरे हुए है जिसे संजय उपाध्याय ने छोटे-छोटे दृश्यों में गज़ब का उभारा है । इप्टा अशोक नगर गुना के अभिनेता अनुपम तिवारी और रायपुर की अभिनेत्री सिग्मा अपने सहज अभिनय से नाटक को लय और गति प्रदान करते रहे । इन दोनों के अभिनय की एक अन्य विशेषता यह थी कि इनमें संभावना होने के बावजूद ये मुख्य जोड़ी हरबिसना और हरबिसनी को लांघने की ज़रा भी कोशिश नहीं करते , नाटक में यही अभिनय आदर्श अभिनय कहलाता है। इसके अतिरिक्त दरोगा (गौरव मुजेवार) संतरी ( मीजान खान ) राजा (कुशल बलय्या ) रानी (संध्या वर्मा ) व्यापारी ( ऋषभ सहगल) दलाल ( शत्रुहन निषाद) दीवान (आकाश वैष्णव) ने अपने होने से नाटक को कही भी लडखडाने नहीं दिया और दर्शकों को पूरी तरह कला की बूंदों से भिगो दिया नाटक नाटक में सब कुछ अच्छा था लेकिन कथानक सत्ता में शक्ति के नाजायज़ इस्तेमाल से होता हुआ जब स्त्री पुरुष के अवैध संबंधों तक पहुचता है तो इसे उचित साबित करने के लिये नटी द्वारा जो सफ़ाई दी जाती है वह अस्वीकार्य है। मै हैरान हूँ कि इतनी उम्दा नाट्य रचना में श्रीकांत किशोर ने स्त्री के समर्थन में यह लाइन क्यों लिखी जिसका अर्थ यह होता है कि शादी हो गई इसका यह मतलब नहीं कि औरत एक ही आदमी से जुडी रहे , यह बेहयाई है , मैं इसे ठीक नहीं मानता हूं।
अख़तर अली,निकट मेडी हेल्थ हास्पिटल,आमानाका,रायपुर (छत्तीसगढ़)
Email –akhterspritwala@gmail.com

