शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। “मुझमें है दिन और रात का मिलन, इसीलिए मैं हूँ संझा…” यह महज़ एक संवाद नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की तलाश में भटकते एक जीवन की गहरी पीड़ा है। डॉ. किरण सिंह की बहुचर्चित कहानी पर आधारित नाटक “संझा : विवाह शिखंडी का” समाज के सामने एक ऐसा ही ज्वलंत सवाल खड़ा करता है। इस कहानी की मुख्य पात्र ‘संझा’ खुद से और इस समाज से यह पूछने को मजबूर है कि आख़िर उसकी वास्तविक पहचान क्या है? वह जन्म से ही न तो पूरी तरह से लड़का है और न ही लड़की।
श्रीराम सेंटर में T.R.U.S.T थियेटर की प्रस्तुति:
हाल ही में राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित श्रीराम सेंटर में इस नाटक का अत्यंत भावपूर्ण मंचन किया गया। राजेश तिवारी की परिकल्पना और निर्देशन में सजे इस नाटक को T.R.U.S.T थियेटर (थियेटर रिसर्च यूनिट फॉर स्टेज टूल्स) द्वारा प्रस्तुत किया गया। यह एक ऐसी विचारोत्तेजक और मार्मिक प्रस्तुति रही, जिसने दर्शकों को न सिर्फ़ भीतर तक झकझोरा, बल्कि उन्हें सराहना और ढेरों जिज्ञासाओं के साथ समाज के एक ज़रूरी पहलू पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया।
मंच पर “संझा” की मार्मिक जीवन-यात्रा:
यह एक, एकल नाट्य प्रस्तुति (सोलो प्ले) है, जो एक “संझा” की मार्मिक जीवन-यात्रा को मंच पर जीवंत करती है। नाटक का केंद्र थर्ड जेंडर/किन्नर अस्मिता, सामाजिक बहिष्कार, पहचान और प्रतिरोध है। कहानी की नायिका “संझा” जन्म से ही लैंगिक अस्पष्टता (intersex/trans identity) के कारण समाज की क्रूरता झेलती है, लेकिन अपने हुनर, साहस और आत्म सम्मान से अपनी जगह बनाती है।
यह नाटक उठाता है तीन बड़े सवाल:
पहला- ऐसे लोग जो स्त्री-पुरुष की आम परिभाषा में फिट नहीं बैठते, शारीरिक रचना की वजह से समाज उन्हें एक आम इंसान की तरह मान्यता और जीने का अधिकार क्यों नहीं देता? दूसरा- परिवार और समाज की उपेक्षा की वजह से ऐसे लोग एक अपराध बोध और त्रासद मनोदशा में जीने लगते हैं, वे मन ही मन अपने आप से पूछते हैं कि ‘मैं हूँ कौन’? तीसरा- शारीरिक रचना या किसी कमी की वजह से क्या एक इंसान- प्रेम और अपनापन पाने के योग्य नहीं? समाज अपनी पारंपरिक सोच को कब बदलेगा?
शिखंडी के मिथकीय संदर्भ से संवाद:
कहानी का मूल नाम “संझा” है। ‘हंस’ पत्रिका में प्रकाशन के बाद यह कहानी चर्चा में आई थी। नाटक का शीर्षक “विवाह शिखंडी का” कहानी में एक और परत को जोड़ता है। यह पात्र शिखंडी के मिथकीय संदर्भ से संवाद करता है। लैंगिक पहचान और सामाजिक संरचना पर प्रतीकात्मक आयाम बनाता है। कई स्तरों पर यह दर्शकों से संवाद करता है।
नाटक में मोहित भाटिया का भावपूर्ण अभिनय:
इस नाटक में अभिनेता मोहित भाटिया ने अत्यंत भावपूर्ण अभिनय किया। उन्होंने मुख्य चरित्र को जीने के साथ ही कहानी में आने वाले कई अन्य पात्रों की भूमिकाएँ भी बखूबी अदा कीं। अपनी इस बहुआयामी अभिनय क्षमता से उन्होंने दर्शकों को ख़ासा प्रभावित किया। उल्लेखनीय है कि इस नाटक की पिछली प्रस्तुतियों में मनीष शर्मा ने मुख्य भूमिका निभाई थीं। नाटक का यह पाँचवाँ प्रदर्शन रहा।
सोलो नहीं संपूर्ण थियेटर की अनुभूति:
कहने को तो यह एक एकल नाटक है, लेकिन अपनी भव्य प्रस्तुति में यह किसी संपूर्ण नाटक से कम नहीं था। यह निर्देशक राजेश तिवारी की एक बड़ी कलात्मक उपलब्धि है। उन्होंने नाटक का सेट इस तरह से डिज़ाइन किया कि मंच के सभी हिस्सों का रचनात्मक उपयोग हो सके। मंच पर ही आवश्यक प्रॉप्स (सामग्री) मौजूद थे, जिनका दृश्यों के कार्य-व्यापार के अनुसार बेहतरीन इस्तेमाल किया गया। वेशभूषा, प्रकाश योजना के साथ ही नाटक का पार्श्व संगीत इसका एक प्रभावशाली पक्ष रहा।
“संझा” नाम की सार्थकता और पारिवारिक पृष्ठभूमि:
यह नाटक “संझा” नाम के एक ऐसे बच्चे की कहानी है, जो न तो पूरी तरह लड़का है और न ही पूरी तरह लड़की। उसका जन्म एक गाँव के जाने पहचाने वैद्य महाराज के घर हुआ है। जन्म के साथ ही ये साफ़ हो जाता है कि उसका शरीर स्त्री-पुरुष की सामान्य श्रेणी में फिट नहीं बैठता। यहीं से उसके जीवन की त्रासदी शुरू होती है। पिता, समाज के डर से उसकी पहचान छिपाते हैं। उसे घर की चारदीवारी में ही कैद कर दिया जाता है। लेकिन संझा भी दूसरे बच्चों की तरह बाहर जाकर खेलना चाहती है, दूसरे लोगों से मिलना और उनके बारे में जानना चाहती है। वह चाहती है कि पिता के साथ वह भी जड़ी-बूटियां लाने जंगल जाये।
सामाजिक प्रतिष्ठा का भय और विवाह का निर्णय:
पिता को समाज में अपनी इज़्ज़त चले जाने का डर है। लोगों के पूछने पर वे अक्सर उसे बीमार बताते हैं। वे जानते हैं कि संझा के घर से बाहर कदम रखते ही लोग उसकी सच्चाई के बारे में जान जाएंगे। उसे लोगों की बदसलूकी का शिकार होना पड़ेगा। और फिर जैसे ही उन्हें अवसर मिलता है, 27 साल की संझा का वे कन्हाई नाम के व्यक्ति से विवाह कर देते हैं। यहां से संध्या के जीवन में एक दूसरी त्रासदी शुरू होती है। वह जानती है कि वह पूरी तौर पर औरत नहीं है, अब शादी के बाद क्या होगा, जब कन्हाई के उसके करीब आयेगा।
वैवाहिक जीवन की विडंबना और संझा का संकल्प:
विवाह के बाद संझा को एक नई बात का आभास होता है कि उसका पति पूरी तौर पर मर्द नहीं है। उसका व्यवहार भी समलैंगिकों जैसा प्रतीत होता है, इसके बावजूद संझा जीवन में पहली बार किसी इंसान के करीब आने, उसके स्पर्श और उसके रिश्ते के अहसास से ख़ुश है। वह कन्हाई के साथ एक आत्मिक जुड़ाव महसूस करने लगती है। वह संकल्प लेती है कि कन्हाई को अपने औषधी ज्ञान से पूरी तरह से सक्षम मर्द बनाकर रहेगी। यहां तक कि वह कन्हाई को उस प्रेमिका से मिला देगी जिससे वह प्यार करता है। इस तरह कन्हाई का चरित्र, कहानी का एक और प्रतीकात्मक मोड़ है, यह ऐसे लोगों का वृंतात हैं जो भले शारीरिक रूप से सम्बंध बनाने के काबिल न हों, लेकिन तब भी, उन्हें प्रेम का हक़ है, उनके साथ सहानुभूति की ज़रूरत है।
विपरीत परिस्थितियों में आत्म-अस्तित्व की हुंकार:
इस तरह कहानी संझा को उस मोड़ पर लेकर पहुँचती है। जहां से उसके नये जीवन का आरंभ होता है। तमाम सामाजिक विसंगतियों, विरोधों और तिरस्कार के बावजूद वह समाज की एक मान्य वैद्य बन जाती है। औषधियों की एक ऐसी जानकार- जिसे पूरे गाँव के अंदरूनी हाल का पता है। वह जानती है कि किन पुरुषों की वजह से किन महिलाओं का उसने गर्भपात कराया है! वह कहती भी है– ‘मैं भी मनुष्यों के बीच जाकर रहूँगी, ज़िंदा रहने के लिए सबकी ज़रूरत बन जाऊँगी। तुम लोग मुझे मारना तो दूर, मुझे छू भी नहीं सकते क्योंकि मैं तुम्हारे जीन की वजह बन जाऊँगी।’
संझा के बहाने थर्ड डेंडर समाज की गहरी पड़ताल:
ज़ाहिर है कि नाटक ‘संझा’ के बहाने, समाज के ऐसे ही लोगों (थर्ड जेंडर / किन्रर समाज ) की गहरी पड़ताल करता है। यह हमारे आसपास मौजूद ऐसे इंसानों के प्रति एक मानवीय, जागरूक और समझदार रवैया अपनाने की माँग करता है। नाटक में संझा के जटिल किरदार को मोहित भाटिया ने मंच पर बखूबी जिया है। उनके संवाद और अभिनय दर्शकों की अमिट यादों का हिस्सा बन गए, जैसे उनका यह कहना– ‘न ही मैं तुम्हारी जैसी मर्द हूँ और न ही औरत, मैं वो हूँ जिसमें पुरुष का पौरुष है और औरत का औरतपन।’ हालांकि इस एकल प्रस्तुति में अभी बहुत संभावना है। एक अभिनेता के लिये यह एक गहरा, कई परतों में लिपटा, एक चुनौतीपूर्ण नाटक है, अभिनय की एक खोजपूर्ण यात्रा है।
चुनौती भरे विषय को मंच पर लाने का साहस:
निर्देशक की दृष्टि से भी यह अत्यंत कठिन और चुनौतीपूर्ण विषय माना जाएगा, परंतु राजेश तिवारी ने अपने उद्देश्यपूर्ण रंगकर्म और सामाजिक प्रतिबद्धता के लिए इस विषय को मंच पर लाने का साहस किया, यह बड़ी बात है। निर्देशक के अनुसार, ‘लेखिका डॉ. किरण सिंह की यह कहानी वास्तविक जीवन की सच्चाई से प्रेरित है। उन्होंने ख़ुद भी इस विषय पर काफी अध्ययन किया और उसके बाद ही उन्होंने इसके रूपांतरण और निर्माण पर काम किया।’ इस प्रॉडक्शन में ट्रस्ट थियेटर के मधुर भारद्वाज का विशिष्ट योगदान रहा, उन्होंने नाटक की प्रकाश योजना के दायित्व को भी संभाला। नाटक के प्रभावशाली संगीत का संयोजन अखिल पांडे ने किया। मेकअप, वेशभूषा में सहयोग ख़ुशबू का रहा।
मोहित और मनीष दोनों के अभिनय वाले नाटक अद्भुत:
प्रदर्शन में विशेष रूप से उपस्थित कला समीक्षक रवींद्र त्रिपाठी ने कहा- ‘ मैंने मोहित भाटिया और मनीष शर्मा अभिनीत दोनों ही नाटकों को देखा है। ज़ायका भले कुछ अलग हो, आर्किटेक्चर और प्रतीकात्मक स्वरूप अलग; परंतु प्रस्तुति में दोनों ही अभिनेताओं के ये प्रदर्शन अद्भुत रहे हैं’। नाटक के अंत में राजेश तिवारी ने अपनी प्रस्तुति के बारे में जानकारियां साझा कीं, उन्होंने दर्शकों की प्रतिक्रिया और उनके सवालों के जवाब दिये। सभी दर्शकों ने नाटक की प्रशंसा की।
निर्देशक राजेश तिवारी का समृद्ध रंग-सफ़र:
राजेश तिवारी एक प्रतिष्ठित थिएटर निर्देशक, नाटककार और प्रशिक्षक हैं, जिन्होंने 1992 से अब तक दिल्ली और मुंबई में 50 से अधिक नाटकों का निर्देशन किया है। दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी (ऑनर्स) और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (B.H.U.) से हिंदी में एम.ए. की शिक्षा प्राप्त तिवारी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) की रेपरटरी कंपनी के पूर्व सदस्य (1994-95) रहे हैं। उन्होंने इप्टा (IPTA) दिल्ली के सचिव, श्री राम सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स (दिल्ली) के स्कोलास्टिक हेड, और इनर कथा इंटरवेंशंस (मुंबई) के आर्टिस्टिक डायरेक्टर जैसी महत्वपूर्ण प्रशासनिक व कलात्मक भूमिकाएँ निभाई हैं। वर्तमान में वे अपनी स्वयं की संस्था ‘ट्रस्ट’ (T.R.U.S.T.) के ऑनर-ट्रस्टी हैं। अपने सुदीर्घ करियर में उन्होंने रॉबिन दास, मोहन महर्षि, सत्यदेव दुबे, एम.के. रैना, बी.एम. शाह, प्रसन्ना और अनामिका हक्सर जैसी भारतीय रंगमंच की दिग्गज हस्तियों के साथ काम किया है।
एक प्रतिष्ठित नाटककार और महत्वपूर्ण नाटकों के निर्देशक:
एक निर्देशक और नाटककार के रूप में उन्होंने इस्मत चुगताई, मुंशी प्रेमचंद और भीष्म साहनी की कहानियों का नाट्य रूपांतरण किया है। उनके द्वारा निर्देशित प्रमुख नाटकों में ‘चौथी का जोड़ा’, ‘पाक, पाली और दिल्ली’, ‘एक कंठ विषपायी’, ‘रहीमन पानी राखिये’, ‘द जस्ट’ (अल्बेयर कामू), ‘माया ठगे बनारस को’, ‘मरणोपरांत’ (सुरेंद्र वर्मा) और ‘छुईमुई’ शामिल हैं। इसके अलावा, उन्होंने ‘हड़ताल’, ‘बापूजी के तीन बंदर’ और ‘लोकसभा-शोकसभा’ जैसे मूल नाटकों की रचना भी की है। उन्होंने एफटीआईआई (FTII), श्री राम सेंटर सहित कई संस्थानों में अभिनय सिखाया है। नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं (सेस्की/एकता परिषद) और सड़क पर रहने वाले बच्चों (यूथ रीच) के साथ कार्यशालाएं करने के साथ-साथ, इंडियन ऑयल, पावरग्रिड और एशियन पेंट्स जैसे प्रमुख कॉर्पोरेट घरानों के लिए भी रंगमंच-आधारित प्रशिक्षण आयोजित किए हैं। आगे पढ़िये एनएसडी में प्रदर्शित उस नाटक की समीक्षा जिसमें मंच पर एक पात्र के लिये आती हैं तीन-तीन दुल्हनें! https://indorestudio.com/mai-re-main-kase-kahun-nsd-theatre-review/


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