Wednesday, May 13, 2026
Homeकला खबरेंसंकीर्णता से दूर संस्कृति और धर्म के गहरे अर्थों को जीने वाला...

संकीर्णता से दूर संस्कृति और धर्म के गहरे अर्थों को जीने वाला गांधी जैसा कोई नहीं

  • धर्म और संस्कृति को हथियार बनाकर किया राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन
  • महात्मा गांधी: शिक्षा, संस्कृति और भारतीय भाषाएँ पर केंद्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी
  • भाषा, शिक्षा और संस्कृति को लेकर बेहद सजग थे महात्मा गांधी
  • एक ब्रश राष्ट्र के नाम चित्रकला प्रदर्शनी को निहारा सैकड़ों कला रसिकों ने

उज्जैन। संकीर्णता से दूर संस्कृति और धर्म के गहरे अर्थों को जीने वाला गांधी जैसा कोई दूसरा व्यक्तित्व हमें कहीं दिखाई नहीं देता। उन्होंने धर्म और संस्कृति को हथियार बनाकर देश में अपनी तरह का अनूठा राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन किया। यह बदलाव केवल गांधी के दर्शन से ही संभव हो सकता था। वे भाषा, शिक्षा और संस्कृति को लेकर बेहद सजग थे।

यह बात विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन की हिन्दी अध्ययनशाला, गांधी अध्ययन केंद्र तथा हिंदुस्तानी भाषा अकादमी, दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में महात्मा गांधी के 150 वें जयंती वर्ष के अवसर पर उज्जैन में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में वक्ताओं ने कही। महात्मा गांधी: शिक्षा, संस्कृति और भारतीय भाषाएँ पर केंद्रित इस संगोष्ठी में दस से अधिक राज्यों के विद्वान और अध्येतागण भाग ले रहे हैं। थे।

वरिष्ठ सम्पादक एवं लेखक डॉ राकेश पांडेय, नई दिल्ली ने कहा कि गांधीजी भाषा और संस्कृति को लेकर बेहद सजग थे। गांधी जी ने विदेश में रहते हुए चार भाषाओं में अखबार निकाले। उनके द्वारा विदेशों में स्थापित आश्रमों में भी भारतीय भाषाओं की पढ़ाई होती थी। आज भी अनेक लोकगीतों में गांधीजी जीवंत हैं। आजादी के पहले गांधी जी जुड़े लोकगीतों की कई पुस्तिकाओं को प्रतिबंधित कर दिया गया था, जिन्हें प्रकाशित किया जा रहा है। गांधी जी के कारण ही गिरमिटिया प्रथा समाप्त हुई.

हरियाणा साहित्य अकादमी, चंडीगढ़ की पूर्व निदेशक एवं साहित्यकार डॉ. मुक्ता, गुड़गांव ने कहा कि गांधीजी समानता के पक्षधर थे। उन्होंने साम्राज्यवाद के खिलाफ बहुत बड़ी लड़ाई लड़ी और भारत आजाद हुआ।

विक्रम विवि के कुलपति प्रो बालकृष्ण शर्मा ने कहा कि संस्कृति जिस विविधतापूर्ण सौंदर्य का संवहन करती है, वही भारतीय भाषाओं के माध्यम से प्रकट होता है। देश की सभी भाषाएँ भिन्न-भिन्न रंग और सुवास लिए हुए पुष्पों की भांति है, हिन्दी सूत्र के समान है जो सबको बांधती है। गांधी जी का शिक्षा दर्शन व्यापक है। शिक्षा के चार चरण हैं पढ़ो, समझो, आचरण करो और अंत में प्रचारण करो। गांधी जी ने पहले आचरण किया और अन्य लोगों को दिशा दी।

प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि गांधी का शिक्षा और संस्कृति चिंतन व्यापक मानवीयता के आधार पर खड़ा है। महात्मा गांधी का संस्कृति चिंतन समावेशी है। उनके लिए संस्कृति और धर्म व्यापक मानवीयता पर टिके हुए हैं। संस्कृति और धर्म के गहरे अर्थों को लेकर जीने वाला उनके जैसा कोई दूसरा व्यक्तित्व दिखाई नहीं देता, जो बिना संकीर्ण हुए राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन में इनका इस्तेमाल करता हो। स्वतंत्रता और परिवर्तन की दिशा में गांधी विचार के सार्वकालिक और सार्वभौमिक होने के पीछे बड़ा कारण उनका सांस्कृतिक दृष्टिकोण है।

इस अवसर पर सुधी चित्रकार डॉ मुक्ति पाराशर, कोटा के संयोजन में एक ब्रश राष्ट्र के नाम समूह चित्रकला प्रदर्शनी लगाई गई, जिस में देश-विदेश के कलाकारों की चालीस से अधिक चित्र-कृतियों के माध्यम से सन 1857 से 1947 के मध्य के इतिहास के महत्त्वपूर्ण पहलुओं को प्रदर्शित किया जा रहा है। इस प्रदर्शनी में किशोर से लेकर वरिष्ठ आयु वर्ग के 30 से अधिक चित्रकार अपनी चित्रकृतियों के माध्यम से देशभक्ति का संदेश दे रहे हैं। यह प्रदर्शनी राजस्थान के अनेक शहरों में संयोजित की जा चुकी है।

हिंदुस्तानी भाषा अकादमी, नई दिल्ली का परिचय संस्था अध्यक्ष श्री सुधाकर पाठक ने दिया। इस अवसर पर राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा प्रकाशित एवं श्री प्रभु चौधरी द्वारा संपादित विशेष स्मारिका महात्मायनी और श्री सुधाकर पाठक द्वारा संपादित हिंदुस्तानी भाषा भारती पत्रिका का लोकार्पण अतिथियों ने किया। स्वागत भाषण डॉ. गीता नायक ने दिया। संचालन डॉ जगदीश चंद्र शर्मा ने किया एवं आभार प्रदर्शन डॉ प्रेमलता चुटैल ने किया।

तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ हरेराम वाजपेयी, इंदौर ने की। विशिष्ट अतिथि यशवंत भंडारी, झाबुआ थे। इस सत्र में अनेक शोध कर्ताओं ने शोध आलेखों का वाचन किया। दूसरे सत्र में गांधी जी के शिक्षा, संस्कृति और भारतीय भाषाओं के क्षेत्र में अवदान पर मंथन हुआ इसमें डॉ. रमेश तिवारी, दिल्ली, पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्री शशिमोहन श्रीवास्तव, उज्जैन, श्रीमती सुरेखा शर्मा, गुरुग्राम, हरियाणा, श्रीमती मनीषा शर्मा, दिल्ली, श्री राजकुमार श्रेष्ठ, दिल्ली, डॉ शिव चौरसिया, डॉ ब्रजकिशोर शर्मा, उज्जैन, जीवनसिंह ठाकुर, देवास, श्रीमती सुषमा भंडारी, श्रीमती शकुंतला मित्तल, श्रीमती सरिता गुप्ता, विजय शर्मा, दिल्ली, दीपक विजयरण, दिल्ली श्रीमती सरोज शर्मा, दिल्ली, डॉ हरेराम वाजपेयी, इंदौर, विजय कुमार राय, दिल्ली, श्रीमती नीतू पांचाल, दिल्ली, श्रीराम दवे, उज्जैन आदि ने अपनी बात रखी।

 

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments

जावेद अहमद शाह ख़ान "अल-हिंदी" on रंगमंच की नई उड़ान…सौम्या व्यास