अजित राय, इंदौर स्टूडियो डॉट कॉम। भारत में दर्जनों भाषाओं में फिल्में बनती है और उनमें से कुछ तो दुनिया भर में सराही जाती है, पर संस्कृत में फिल्म निर्माण की किसी बड़ी गतिविधि की कोई सूचना नहीं है। एक जमाने में आकाशवाणी और दूरदर्शन पर संस्कृत में समाचारों का प्रसारण जरूर होता था और शायद अब भी होता होगा। आश्चर्य है कि देवभाषा कही जाने वाली संस्कृत में सिनेमा की इतनी क्षीण परंपरा क्यों है। क्या यह भाषा दृश्य श्रव्य माध्यम के लिए उपयुक्त नहीं है या इसका बाजार नहीं है जबकि सरकारों से इसे हमेशा से संरक्षण मिलता आया है।
करीब चार साल पहले 2016 में सामाजिक सवालों से टकराती एक संस्कृत फिल्म आई थी “इश्ति” जिसे जी प्रभु ने निर्देशित किया था।। यह फिल्म अपने जोखिम भरे विषय के कारण और अन्य कई कारणों से चर्चा में रही। संस्कृत भाषा मे बनी यह चौथी फिल्म है। जी वी अय्यर ने सबसे पहले 1983 मे पहली संस्कृत फिल्म बनाई थी “आदि शंकराचार्य”। उन्होने ही 1993 मे दूसरी संस्कृत फिल्म “भगवदगीता” बनाई। इसके 22 साल बाद विनोद मतकरी ने 2015 मे तीसरी संस्कृत फिल्म “प्रियवासनम” बनाई जिसे केरल अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के आयोजकों ने फिल्म पर जान बूझकर हिंदुत्व का प्रचार करने का आरोप लगाकर दिखाने से मना कर दिया था। जबकि “प्रियवासनम” को 2015 में भारत के 46 वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह गोवा मे भारतीय पैनोरामा की उद्घाटन फिल्म बनाया गया था।
आश्चर्य होता है कि ये चारों संस्कृत फिल्में केरल मे ही बनी है। तीन फिल्में तो प्राचीन हिंदू परंपरा के बारे मे सकारात्मक नजरिए से बनाई गई है लेकिन चौथी फिल्म “इश्ति” आज के समय की बात करती हुई परंपरा का आलोचनात्मक दृश्य रचती है। यह पहली संस्कृत फिल्म है जो आज के सामाजिक सवालों से टकराती है। फिल्म का स्त्रीवादी नजरिया उसे और महत्वपूर्ण बना देता है।इसके लेखक- निर्देशक- प्रोड्यूसर जी प्रभु चेन्नै के लोयला कॉलेज मे संस्कृत पढ़ाते है।
केरल के नंबूदरी ब्रांह्मण समुदाय के पुरूष दूसरे समुदाय की स्त्रियो से सहवास कर सकते है पर किसी भी जिम्मेदारी से इनकार करते है। इस कुप्रथा की शिकार स्त्रियों के पास सदियों से कोई विकल्प नही था।नंबूदरियों की नई पीढ़ी ने इस प्रथा का विरोध किया। फिल्म का ढांचा रंगमंचीय और यथार्थवादी है। कम से कम प्रापर्टी का इस्तेमाल किया गया है। पारंपरिक परिधान जिसमे सफेद साड़ी- धोती, सहज अभिनय पुराने मकान हवन-पूजा पद्धतियां,सतत जलती हुई हवि की आग, मशाल और सूरज की रौशनी, निरीह चेहरे – सबकुछ स्वाभाविक लगता है।कोई स्पेशल इफेक्ट नही, न कोई शोर चीख पुकार, बस मद्धम पार्श्व संगीत और कम से कम संवाद दृश्यों को दिल तक पहुँचाते हैं।
रामाविक्रमन नंबूदरी 71 साल की उम्र में घर में दो-दो पत्नियों के होते हुए भी दहेज के लालच में 17 साल की श्रीदेवी से तीसरा विवाह करते है। वे सोमयाजी है और उनकी इच्छा है कि वे ऐसा अनुष्ठान करें कि हवन कुंड की आग कभी न बुझे और इसी पवित्र आग से उनका अंतिम संस्कार हो। इस धार्मिक अनुष्ठान मे स्त्रियो का कोई हिस्सा नहीं है। यहां तक कि उनका प्रवेश भी वर्जित है। नंबूदरी ब्रांह्मण समुदाय मे घर के मुखिया के पास ही सारी संपत्ति सारे अधिकार होते है। वे पढ़ाई- लिखाई को धर्म विरोधी मानते है। उनके बच्चे रट्टा मारकर वेद मंत्रों का पाठ तो कर सकते है पर लिख पढ़ नही सकते। 17 साल की पत्नी और 71 साल के पति की सुहागरात की कल्पना सहज ही की जा सकती है। रामाविक्रमन का छोटा भाई नारायणन हर रात नीची जाति की स्त्रियो के पास जाता है और कभी कभी बूढ़े नंबूदरियों की जवान पत्नियों को भी संतुष्ट करता है। उन्ही स्त्रियो में से एक से जन्मा नारायणन का बच्चा इलाज न करा पाने से मर जाता है क्योकि रामाविक्रमन उसे यह कहते हुए पैसे देने से मना कर देता है कि नीच जाति की औरतों से जन्मे बच्चों की जिम्मेदारी नंबूदरीयों की नही है। बेटे की मृत्यु के गहरे दुख और उसकी माँ के साथ हुए अन्याय से आहत नारायणन अपना जनेऊ जलाते हुए कहता है- “कुत्ते या बिल्ली के रूप मे जनम लेना अच्छा है पर नंबूदरी ब्रांह्मण समुदाय मे जन्म नहीं लेना चाहिए।”
रामाविक्रमन का जवान बेटा रामन नंबूदरी उस समय विद्रोह कर देता है जब उसकी बहन लछमी की शादी एक 73 साल के बूढ़े नंबूदरी ब्रांह्मण से होने वाली है जिसकी पहले से ही चार पत्नियां है। एक दृश्य में श्रीदेवी रामन और लछमी को सूप मे बिछे चावल पर हाथ से अ आ इ ई लिखना सिखा रही है। उसके खिलाफ साजिश रची जाती है। यह अफवाह फैलाई जाती है कि श्रीदेवी और रामन मे अनैतिक संबंध है। नंबूदरियों की पंचायत मे उसका पति भी उसके खिलाफ हो जाता है।वह अपने बड़े बेटे को जाति बाहर कर घर से निकाल देता है। आहत श्रीदेवी सबके सामने मंगलसूत्र तोड़कर रामाविक्रमन के हाथ मे देते हुए कहती है- “धर्म का पालन केवल वेद रटने से नही, मनुष्य बनने से होता है।अब मै आजादी के साथ खुली हवा में सॉस ले सकती हूं।” वह घर से निकलते हुए अपने सिर से विवाहिता का प्रतीक सफेद चादर उतार फेंकती है और बँधे हुए केश ऐसे खोलती है जैसे मुक्ति का परचम लहरा रहा हो। अंतिम दृश्य मे रामाविक्रमन जब हवन मंडप मे जाता है तो कुंड की आग बुझ चुकी है।
जी प्रभु ने जिस साहस और कलात्मकता के साथ “इश्ति” बनाई है वह काबिलेतारीफ है। संस्कृत भाषा मे ऐसी फिल्म बनाने के बारे मे कोई सोच भी नही सकता। फिल्म का एक-एक फ्रेम किसी सुंदर पेंटिंग की तरह लगता है। सुप्रसिद्ध रंगगुरू कावलम नारायण पणिक्कर की मंडली के कलाकार नेदुमणि वेणु ने प्रमुख नंबूदरी रामाविक्रमन की भूमिका को अविस्मरणीय बना दिया है। भारतीय सिनेमा के इतिहास मे ” इश्ति ” को हमेशा याद रखा जाएगा।

