रायपुर से योग मिश्र ( इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम)। मंदराजी महोत्सव के दौरान, नाचा के पुरखा मँदराजी दाऊ के गांव जाने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ। वहीं नाचा की संस्कृति से भी मेरा सही मायने में प्रथम साक्षात्कार भी हुआ। मैंने देखा इस महोत्सव के आयोजक खुमान सावजी नीचे जमीन पर बैठकर कार्यक्रम का आनंद उठा रहे थे। नाचा की संस्कृति और संस्कार से तो मै पहले से ही प्रभावित था ही,नाचा परंपरा के इस जन आयोजन को देखकर मन गदगद हो गया।
इस महोत्सव में सब कुछ इतना व्यवस्थित था कि किसी को कोई शिकायत ही नही मिल सकती थी।कहीं कुछ भी बनावटी नही सबकुछ नाट्य परंपरा के अनुरूप घट रहा था । सबसे अग्रिम पँक्ती में नाचा के विद्यार्थी बैठे थे वहीं बैठकर खुमान साव बता रहे थे कि उनकी शिक्षा अभी खत्म नही हुई । मैं भी इस पाठशाला का उतना ही अदना सा विद्यार्थी हूँ, जितने कि तुम हो। ऐसे व्यवस्थित आयोजन का हुनर तो लंबे अनुभवों, सैकड़ों गलतियों और हजारों तरह की तकलीफें सहने के बाद ही मिलता है। ग्राम रवेली के दर्शकों को देख मुझे मुक्तिबोध नाट्य समारोह के हमारे दर्शक जरूर याद आए पर नाचा के दर्शक खुश होकर नोट लुटाने में भी नही हिचक रहे थे। हमारे दर्शक टिकट लेकर नाटक देखना अपनी बेइज्जती समझते हैं बस इतना सा फर्क ही मुझे दिखा !
छत्तीसगढ़ के इतने महत्वपूर्ण आयोजन के प्रति संस्कृति विभाग की निष्ठुरता जब खुलकर सामने आती है तो मन में क्षोभ होता है। आपको आश्चर्य होगा सुनकर कि मंदराजी महोत्सव जैसे कार्यक्रम के लिए हमारे संस्कृति विभाग ने जो अनुदान राशि निर्धारित की है, वह इतनी कम है कि उस राशि के भरोसे यह कार्यक्रम कराया ही नही जा सकता और वह भी उन्हें पिछले साल का भी अबतक नही मिला है। (लेखक रायपुर वरिष्ठ रंग निर्देशक हैं।)

