निशिकांत मंडलोई, इंदौर स्टूडियो। नईदुनिया अखबार के सहभागी और पूर्व प्रबंध सम्पादक महेंद्र सेठिया का गुरुवार 18 अगस्त को निधन हो गया। जैसे ही यह खबर मिली, नईदुनिया से लगाव रखने वाले पाठकों और इस संस्थान से जुड़े हम जैसे पत्रकार साथियों में शोक की लहर दौड़ गई। एक जमाना था, जब नई दुनिया अखबार का ज़िक्र आते ही अभय छजलानी के साथ महेंद्र सेठिया जी का नाम याद किया जाता था। सरल और साफ हृदय उनके व्यक्तित्व की विशेषता थी।
खंडवा से विशेष समाचारों के लाने पर होती थी मुलाक़ात: महेंद्र भैया से मेरा सन 1990 से पहले भी कई बार मिलना हुआ । उन दिनों मैं खंडवा से कभी-कभी जरूरी खबर लेकर आता था। 1990 में आदरणीय अभय छजलानी जी की सहमति के बाद महेंद्र (भैया) सेठिया जी ने मुझे कार्यालयीन साथी के रूप में नियुक्त किया, तब से मेरे सेवाकाल मार्च 2012 तक अमूमन हर दिन नईदुनिया के सेवादार की हैसियत से मिलना होता ही रहा। मेरी उनसे अंतिम बार मुलाकात कनाड़िया स्थित सेठिया परिवार द्वारा संचालित शिक्षण संस्थान शिशुकुंज के पास ओएसिस टाउनशिप में श्वेतांम्बर जैन समाज के नवनिर्मित मंदिर में हुई। उस दिन वे अकेले नहीं सपत्नीक थे। उनके भाई श्री प्रेम सेठिया भी साथ थे। उन्होंने मुझसे कहा, यहाँ कैसे ? तब मैंने उन्हें बताया कि इस कार्यक्रम की रिपोर्टिंग के लिए, तो बहुत ही खुश हुए थे। चरण स्पर्श के बाद एक जोरदार हाथ उनका मेरी पीठ पर एक आवाज का अहसास व सुखद अनुभव करा गया। उन्होंने आदरणीय भाभी जी से कहा पहचाना। इसे यह वही है जिसने विनीत की विवाह पत्रिका में आमंत्रितों के सुंदर अक्षरों में नाम लिखे थे।
सुंदर लिखावट की डायरी, चुनिंदा शायरी का वह संग्रह: महेंद्र जी भी खुश हो गए और बोले अरे हाँ। भाभी ने कहा, अरे भूल गए। आपने अपनी सुंदर लिखावट में एक डायरी (इसमें चुनिंदा शायरी जिसका संग्रह स्वयं महेंद्र भैया ने किया था) लिखी थी, आपके भैया के कहने पर। वह उन्होंने मेरे विशेष दिन पर भेंट की थी। मेरी खुशी परवान पर थी। महेंद्र भैया से हाल जानने पर वे बोले अब तबियत ठीक नहीं रहती है इसलिए कहीं आना जाना कम ही होता है। बस यही मुलाकात उनसे अंतिम थी। वैसे उन्होंने कहा था कार्यक्रम से निपट कर घर आना। पर फिर कभी उनसे मिलने का अवसर नहीं मिला। मन तो बहुत करता था, जब कभी हमारे साथी श्री पवन गंगवाल जी से और श्री प्रकाश जैन जी मुलाकात होती तो विचार करते थे कि चलो एक दिन महेंद्र भैया से मिल आते हैं लेकिन यह कभी सम्भव नहीं हो पाया और आज उनकी खबर मिलने पर बरबस ही वह पंक्तियां याद आ गई – ‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब / पल में परलय होत है बहुरि करेगा कब’।
तकलीफ़ मत उठाना, कोई दिक्कत हो तो बता देना: वे एक सरल हृदय, व्यवहारिक और सकारात्मक सोच के धनी थे। मुझे याद है जब उन्होंने मुझे कार्य पर रखा था तो उन्होंने मुझसे पूछा था, रहने की क्या व्यवस्था। तब मेरे मन की बात यही मैंने उनसे कही थी, आपने काम दिया, अब आगे की व्यवस्था तो मेरी जिम्मेवारी बनती है। फिर भी उन्होंने कहा था, तकलीफ मत उठाना बता देना। यह था उनका व्यक्तित्व। एक बार उनके मन में अपनी पत्नी को किसी अवसर विशेष पर कुछ अलग भेंट देने का विचार आया। उनके पास कुछ चुनिंदा शायरी का संग्रह जिन्हें टाइप करवा कर प्रिंट निकलवाकर एक डायरी में पेस्ट करवाने का विचार आया। उस समय हमारे साथी श्री सुल्तान खान को उन्होंने कहा कि इसे डायरी में पेस्ट करवा देना। तब खान साहब ने ही उन्हें सुझाव दिया था कि मंडलोई से लिखवा लीजिए सुंदर हो जाएगा। और जब वह मैंने लिखी तो उसमें स्केच के साथ दो पेज शायरी भी मैंने अपनी तरफ से लिखी थी जो उस डायरी के प्रथम और द्वितीय पेज थी। उनका उस वक्त शाबासी देने का जो अंदाज था वह सिर्फ मैं ही अनुभव कर सकता हूं। उसके बाद उनके बेटे विनीत सेठिया जी के विवाह अवसर पर छपी निमंत्रण पत्रिकाओं पर मुझसे उन्होंने आमंत्रितों के नाम लिखवाए थे। वे मेरी लिखावट की बहुत कद्र करते थे, यह अलग बात है कि मेरी लिखावट इतनी अच्छी नहीं थी पर उन्होंने मुझे इस लायक समझा। यही मेरे लिए उपलब्धियों के पल थे। महेंद्र भैया के बारे में अगर मुझे कुछ कहना है तो बस इतना ही कि ,,, ना भूतो ना भविष्यते,,, वे सिर्फ वे ही थे उनका कोई सानी नहीं। ऐसे व्यक्तित्व को मेरा बार-बार प्रणाम व श्रद्धा सुमन अर्पित।

