Wednesday, May 13, 2026
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‘सारेगामा’ में छिड़े फिल्मी गीतों के राग

पाल ले एक रोग नादाँ ज़िंदगी के वास्ते / सिर्फ़ सेहत के सहारे ज़िंदगी कटती नहीं 

फ़रीद बदायूँनी के इस शेर को अपनी ज़िदंगी का फ़लसफ़ा मानने वाले कन्हैया लाल पांडे फिल्म संगीत के एक चलते-फिरते इनसाइक्लोपीडिया हैं। उन्होंने फिल्म संगीत का अध्धयन सिर्फ सुगम की दृष्टि से नहीं बल्कि शास्त्रीय संगीत की दृष्टि से किया है। उस शोध को एक अनमोल रागोपीडिया ग्रंथ में तब्दील कर दिया है। इस तरह के रागों और फिल्म संगीत के शोध पर वे करीब 10 पुस्तकें लिख चुके हैं। यही वजह है कि उनकी पुस्तकों का लाभ फिल्म और शास्त्रीय संगीत पर शोध करने वाले कई छात्रों को मिल रहा है।

सारेगामा में सजी सुरों की महफिल

हाल ही में इंदौर के सारेगामा संगीत प्रशिक्षण केंद्र में उनके काम पर केंद्रित एक खास कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस आयोजन में उन्होंने ना सिर्फ अपने ग्रंथ के बारे में कई अहम जानकारियां दी बल्कि फिल्मों में राग-रागनियों के प्रयोग वाले कई गीतों का ज़िक्र किया। उन गीतों को श्रोता और संगीत कलाकार इस कार्यक्रम में गुनगुनाते नज़र आये। कार्यक्रम में अपने शोध के आधार पर कन्हैया लाल पांडे ने कई अहम जानकारियां श्रोताओं के सामने रखीं। उन्होंने बताया,1932 से पहले रिकॉर्डेड गीत नहीं आते थे। फिल्म इंद्रसभा में 74 गाने थे। कई फिल्मों में एक-एक लाइन के गीत भी होते थे। उन्होंने हिंदी के साथ मराठी फिल्म संगीत की भी जानकारी दी। उन्होंने बताया ‘दृष्टि’ फिल्म में किशोरी आमोणकर ने पांच अलग-अलग रागों में पांच आलाप लिये| कन्हैया लाल के मुताबिक राग हमीर में रफी के गाये – ‘मधुबन में राधिका नाचे रे’ के अलावा सोलह से अधिक फिल्मीं रचनाएँ हैं। जबकि भैरवी, बिलावल, काफी,खमाज, यमन वो राग हैं जिनका फिल्मों में बहुत ज़्यादा प्रयोग हुआ है। आपने बताया, फिल्मों में पुरुषों की तुलना में महिला गायिकाओं ने ज़्यादा गीत गाये हैं।

रागों का नामकरण कैसे हुआ ?

एक डेमोग्राफिक चार्ट  के जरिए उन्होंने रागों के नामकरण के बारे में भी समझाया। जैसे राग पहाड़ी क्यों है ? इसमें चढ़ाव है फिर उतार है ?  राग मांड ऊंट कैसे चलता है या  खमाज में लहरों जैसा प्रभाव क्यों है?  उन्होंने रागों के भौगोलिक महत्व के बारे में भी बताया। कहा, पांच रागों का इस्तेमाल हमारे नार्थ ईस्ट से शुरू होता है तो बर्मा मलाया, चीन, जापान तक फैलता चला जाता है |  उन्होंने बताया, एक सौ बीस रागों का चक्र है, किस समय कौन सा राग गाया  जाये , कर्नाटक संगीत से बहुत से राग आये लेकिन वहाँ राग किसी समय,काल से बंधे नहीं हैं| इस ग्रंथ से कई और बातें भी सामने आती है जैसे फिल्मीं संगीतकारों के पसंदीदा राग होते थे। खैयाम साहब और रोशन ने यमन का बहुत इस्तेमाल किया तो एस डी बर्मन ने खमाज का।

26 हज़ार गीत गाने का दावा सही नहीं

कन्हैया लाल ने लता मंगेशकर के छब्बीस हज़ार गानों के दावे को ख़ारिज किया। उन्होंने शोध के आधार पर कहा, लताजी से ज़्यादा स्व. मोहम्मद रफ़ी और आशा भोंसले ने गीत गाये हैं। मगर उनकी उनकी भी संख्या आठ हज़ार से कुछ ज़्यादा ही है। श्री कन्हैया का कहना है-अस्सी का दशक फिल्मीं संगीत के लिए सबसे बेकार रहा नब्बे में फिर से मेलोडी लौटी। इंदौर स्टुडियो के लिये जावेद अहमद शाह खान “अलहिंदी” की रिपोर्ट। 

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