स्वरांगी साने,इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। इंदौर की ख्यात कथक नृत्यांगना सविता गोडबोले का 4 सितंबर को निधन हो गया। वे 69 साल की थीं। शहर के आड़ा बाज़ार में रहने वाली सविता गोडबोले करीब 40 सालों से कथक सिखा रही थीं। उन्होंने सैकड़ों कलाकारों को नृत्य का प्रशिक्षण दिया। ‘लयशाला’ जैसी कला संस्था का संचालन किया। मैं खुद भी उनकी शिष्या रही। मेरे साथ उनकी हमउम्र बेटी आस्था भी थी। हम दोनों ने सविता ताई से नृत्य की तालीम ली और उन्हें बेहद करीब से जाना,समझा। मैं अब पुणे में रहती हूं। परंतु उनके निधन के बाद उनसे जुड़ी स्मृतियों ने मुझे झकझोर रख दिया। सच कहूं तो उन जैसी गुरू का मिलना आज मुश्किल है। बेहद उदार और दिल से बड़ी ताई एक ऐसी गुरू भी थीं जिन्होंने मुझे तालीम के लिये बेहिचक नृत्य के एक अन्य आदरणीय गुरू पुरू दाधीच के पास भेजा था। वह भी इसलिये के मेरा घर दाधीच जी प्रशिक्षण स्थल के ज़्यादा करीब था। मेेरा यह लेख उनके प्रति उन्हीं दिनों की याद है। उनके प्रति नतमस्तक मेरी श्रद्धा से भरी भावनाओं का प्रवाह है। आप भी पढ़िये ताई के जाने पर मुझे क्या कुछ याद आया।
करूण रस उनकी आँखों में बसा था: नवरसों में एक रस करुण और यह रस किसी की आँखों में चिरस्थायी बसा था तो वे थीं सविता ताई। आँखों में करुणता और व्यवहार में करुणा देखना हो तो सविता ताई के निकट होना लाज़मी था। इंदौर का आड़ा बाज़ार और वहाँ केलकर के बाड़े में सविता ताई का निवास ना जाने कितनों की स्मृतियों में बसा है। बीच शहर में होने से भी और सविता ताई के आदर-आतिथ्य के कारण भी जो वहाँ से गुज़रता उस ड्योढ़ी पर सज़दा करने से नहीं चूकता था। दूजा भाव उनके व्यक्तित्व में दूर-दूर तक नहीं था इसलिए जो ड्योढ़ी तक आता वह बड़ी सहजता से उनकी रसोई तक भी पहुँच जाता, उनके मन के भीतरी दालानों में भी अपनी जगह बना लेता…इतनी कि किसी के भी आने पर तुरंत वे आस्था या आदित्य (पुत्री-पुत्र) को बाज़ार की दौड़ लगवा देतीं कि ‘ज़रा एक किलो मावा तो ले आना,गुलाब जामुन बनाते हैं’, ‘चक्का तो ले आना श्रीखंड बनाते हैं’। उनके यहाँ कोई भी आए वे उसका स्वागत उतने ही खुले मन से करती थीं…फिर वह आला दर्जे के गायक-वादक हों या बिल्कुल काम करने वाली महरी ही।
अम्मा से बर्तन ले लो: पुराने बाड़े के पिछले हिस्से की जर्जर सीढ़ियों से एक बूढ़ी देह धुले बर्तनों की बर्तनदानी लिए ऊपर चढ़ती और सविता ताई अपनी किसी भी शिष्या को कह देती ‘अम्मा से बर्तन ले लो’। वे बूढ़ी थीं ज़रा-से बर्तन माँजने में भी ढेर समय लगता लेकिन ताई न उन्हें टोकती, न रोकती क्योंकि उनके अपने उन्हें नहीं पूछते थे और ताई बूढ़ी अम्मा के स्वाभिमान को ठेस भी नहीं पहुँचाना चाहती थीं इसलिए भले ही दो-चार ही बर्तन हों, मँजवा लेती और चाय भी पिला देती, मराठी पकवान पुरण पोली (चने के दाल की रोटी) भी खिला देती।
ऐसा गुरू मिलना दुरूह : यह उदारता उनके मन की फ़कीरी से जुड़ी थी, कथक सिखाने के दौरान भी यदि उनका मूड हो गया तो वे बड़ी महीन बातें भी बतातीं कि इस आमद में यह हस्तक लेने का असली मकसद क्या है, या किसी खास हस्तक से क्या खास बताया जा रहा है…शर्त इतनी थी कि जब वे मूड में हों, तो उनसे बैठकर सब सुन लो…फिर वे बड़ी गहराई से बातें करतीं और हाथों से इशारा कर कहती लिख लो…ऐसा गुरू मिलना बहुत दुरूह है जो शिष्य के मन को जान ले। उन्हें पता था मुझे कथक करने से ज़्यादा उस पर लिखना पसंद है तो वे उस तरीके से चीज़ों को समझाती भी थीं जो मेरे पास थाती बनती जा रही थी।
दूसरी कला विधाओं का भी मान : एक कला से दूसरी कला को समझ पाने की चाह भी उनके मन में थी। आड़े बाज़ार के उनके घर में एक खूबसूरत पेटिंग थीं फूलों से लदे वृक्ष के गुच्छों को एक यौवना तोड़ने की हसरत से छू भर रही है..और वे उसकी भाव-भंगिमाओं को भी समझातीं कि देखो इस चित्र में कैसी लय है, उस देह में कैसी गति है। उनकी बेटी आस्था (कार्लेकर) और मैं हमउम्र…आस्था का रुझान तेजी-तैयारी में, मेरा भावपक्ष में, दोनों को सिखाते हुए वे इस संतुलन को स्थापित करतीं, उनकी इच्छा थी आस्था और मैं एक साथ लास्य और तांडव को रखें, जो कथक के लखनऊ घराने की विरासत है।
परंपरा के साथ अपने रंग भरना: लखनऊ घराने के पंडित लच्छू महाराज जी से उन्हें कथक सीखने का अवसर मिला था और जितना उन्हें मिला था, वे उसे बाँट देना चाहती थीं। परंपरा को सहेजते हुए भी कैसे अपना अक्स उसमें भरना, इस पर वे बल देतीं। वे हमेशा कहतीं कथक में ज्यामितीय रचनाएँ नहीं दिखनी चाहिए बल्कि एक लोच होना चाहिए। भारी देहयष्टि के बावज़ूद उनकी अंग निकासी में लाजवाब लोच थी। वे प्रायोगिक स्तर पर करके दिखाती थीं कि नृत्य कैसे किया जाता है, इसके लिए जो सब्र और इत्मीनान चाहिए वह उनके पास था। लखनऊ से सांगली होते हुए जब वे इंदौर आईं, तो उनकी प्रारंभिक शिष्याओं को उन्होंने इसी इत्मीनान से सिखाया।
नृत्य की व्यावहारिक तालीम: घूँघट की गत निकास सिखाते हुए वे विविधता से ओढ़नी लेकर बताती और वैसा ही करवाती, पहले उस ओढ़नी के साथ और फिर बिना ओढ़नी केवल अभिनय। प्रॉपर्टी मतलब यहाँ ओढ़नी लेकर नृत्य करते हुए ओढ़नी से देखने पर नज़र किस ओट से देख सकेगी यह जान लेने पर बिना ओढ़नी के करते हुए भी उसे ध्यान में रखना आसान हो जाता। राधा भरी मटकी लिए चलेगी तो उसकी देह में कहाँ-कहाँ तनाव होगा यह समझाने के लिए वे छोटी गगरी सिर पर रखवाती, राधा-कृष्ण की छेड़छाड़ में यदि शब्द है ‘कान्हा बाँह पकड़ रहा है’ तो बाँह पकड़ी दिखाओ, कलाई नहीं, जैसी छोटी-छोटी बातों को वे समझातीं। इसके लिए वे खुद कलाई पकड़, छुड़वाने को कहती कि अब छुड़वाकर देखो, साक्षी भाव से अपने आपको देखो, देखो हाथ पर कहाँ-कहाँ तनाव महसूस हो रहा है, चेहरे की माँसपेशियों में कहाँ खिंचाव हो रहा है।
क्या यह उनके जाने की उम्र थी?: शुद्ध नर्तन करते हुए बोरों पर नृत्य करो ताकि तलुवे, टखने और पैर मज़बूत होंगे या कलाई को पकड़कर खुद ही कसक-मसक का अभ्यास करो। यह बड़ी कक्षाओं में सिखाया जाता है या शायद तब भी नहीं लेकिन वे बिल्कुल शुरू से इसे सिखातीं…सबको सिखातीं या मुझे ही, पता नहीं…वे मेरी लिखने की इच्छा के लिए उस दृष्टि को विकसित कर रही थीं, यह तब समझ में नहीं आया…तब उतना सब समझ पाने की उम्र नहीं थी, अब समझ आने लगा और वे चली गईं…क्या यह उनके जाने की उम्र थी? (स्वरांगी साने जाने पहचानी लेखिका और कवियित्री हैं। उनका इंदौर से पुराना नाता है।)

