Wednesday, September 9, 2026
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मेरे पिता साहित्य के उजाले से बने थे-आचार्य शून्या

कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। “मेरे पिता साहित्य जगत के उसी उजाले से बने थे, जिसकी लौ आज इस आयोजन में प्रज्वलित है। उनका नाट्य लेखन केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि इतिहास, संस्कृति और मानवीय गहराइयों का सजीव संवाद था।” यह बात ख्यात नाटककार और रंगकर्मी दया प्रकाश सिन्हा की बेटी आचार्या शून्या ने कही। वे अपने पिता की स्मृति में साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित श्रद्धाजंलि सभा में अपने भाव व्यक्त कर रही थीं। स्व. सिन्हा का लेखन समाज का दर्पण: भावभीनी श्रद्धाजंलि के इस कार्यक्रम में संगीत नाटक अकादेमी की अध्यक्ष संध्या पुरेचा ने उन्हें समाज का दर्पण बताया। उन्होंने कहा, सिन्हा जी का लेखन और जीवन दर्शन एक ही था। उन्होंने उनकी उपस्थिति को आशीर्वाद के रूप में याद किया। नाटक और साहित्य के बीच अद्भुत संतुलन: साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि सिन्हा जी ने नाटक और साहित्य के बीच अद्भुत संतुलन तैयार किया और वे भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े राजदूत थे। उपाध्यक्ष कुमुद शर्मा ने उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को रेखांकित करते हुए कहा कि वे जीवन भर मनुष्यता के लिए लड़े और भारतीयता के बोध को संस्कृति से जोड़ा। अनिल जोशी ने स्व. सिन्हा को दुर्लभ सांस्कृतिक प्रशासक बताया, जिन्होंने मिथक, पुराण और इतिहास की पुनर्व्याख्या की। सुमन कुमार ने उनके स्वभाव में बच्चे जैसी ललक को याद किया। संजीव सिन्हा ने उन्हें साहसिक विचारक कहा, जिनकी सोच भारतीयता से ओत-प्रोत थी। शैलेश श्रीवास्तव ने उनके स्नेहपूर्ण व्यवहार को रेखांकित किया।
प्रताप सिंह ने उनके यात्रा संस्मरणों के उत्कृष्ट गद्य की चर्चा की। कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थितजनों ने एक मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। सभा में उनके दामाद सोमेश रंजन,  भांजी ज्योति,  नाती सारंग सहित लेखक और नाट्यकर्मी उपस्थित थे। संचालन अकादेमी के उपसचिव देवेंद्र कुमार देवेश ने किया। आगे पढ़िये – विवेचना के कला महोत्सव को जिसने देखा,देखता ही रह गया! https://indorestudio.com/vivechna-ka-kala-mahotsav/

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