Wednesday, May 13, 2026
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कवि श्रीनरेश मेहता की याद और ‘चौथा संसार’ अख़बार के वो दिन!

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शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। निंदक नियरे राखिये, ऑंगन कुटी छवाय / बिन पानी,साबुन बिना,निर्मल करे सुभाय।
यह पहली पंक्तियां थी, जिसे हमने श्रद्धेय श्री नरेश मेहता जी से पहली बार सुना था। यह वर्ष 1992 की बात है। तब वे इंदौर से प्रकाशित समाचार पत्र ‘चौथा संसार’ के संपादक बनकर पहली बार कार्यालय में आये थे। एक कवि के रूप में उनसे हमारा यह पहला परिचय था। वे सफ़ेद धोती और कुरता पहने हुये थे। उनके केश पीछे की तरफ करीने से जमे हुये थे। चश्मे से उनकी गहरी, अनुभवी आँखें किसी कैमरे की तरह झांक रही थीं। तब ‘चौथा संसार’ का कार्यालय सांवेर रोड स्थित एक फैक्ट्री के परिसर में था। नीचे प्रिटिंग मशीनें, प्रोसेसिंग और डीटीपी सेक्शन थे। जबकि पहले तल पर संपादकीय कार्यालय था। उनकी पुण्यतिथि 22 नवंबर पर पढ़िये यह स्मृति लेख।  श्रीनरेश मेहता का वह पहला दिन: सीढ़ियों से चढ़ते हुये जैसे वे पहले तल पर पहुँचे, उनका सहर्ष स्वागत हुआ। सीढ़ियों के ठीक सामने उन्हें उनका केबिन दिखाया गया। सभी ने उनसे औपचारिक मुलाक़ात की। बाद में उन्हें मुख्य संपादकीय हॉल दिखाया गया। कुछ साथियों से परिचय हुआ। उसके बाद वे लायब्रेरी देखने के लिये पीछे की तरफ़ मुड़े। लायब्रेरी से पहले एक मीटिंग रूम और फिर चित्रकार साथी सफ़दर शामी का कक्ष था। तब मैं और रवींद्र व्यास फीचर विभाग का प्रभार संभालते थे। सफ़दर हमारे रविवारीय और प्रतिदिन चार पेज के दूसरे फीचर पेजेस के लेआउट और कलर स्कीम का दायित्व संभालते थे। उनके छोटे से कक्ष में कार्टून बनाने वाले साथी सुरेश पंवार और हरीश काम किया करते थे।साहित्य सृजन की प्रारंभ हुई चर्चा: जब श्री नरेश जी के साथ हम भाई सफ़दर के उस कला कक्ष में पहुंचे, तब उनसे रचनाकर्म और साहित्य सृजन को लेकर चर्चा चल पड़ी। उस समय उन्होंने हमें कबीर के उर्पुयक्त दोहे का स्मरण कराया। अख़बार और सृजन के काम में हम सभी को अपने काम की आलोचना सहने का पहला पाठ पढ़ाया। उन्होंने कहा, हमें हमारे निंदकों या आलोचकों को किसी दूसरे भाव नहीं देखना चाहिये, अपितु उनको अपना मानकर, उनकी आलोचना से सीखना और अपने काम को और बेहतर करना चाहिये। इसके बाद उन्होंने जो किया, वो सब हमारे दिलो-दिमाग़ में हमेशा के लिये अंकित हो गया। उन्होंने सफ़दर से दीवार पर लिखने लायक एक पेन माँगा। फिर दीवार पर अपनी एक छोटी कविता लिख दी। हम साथियों के आग्रह पर हस्ताक्षर भी कर दिये। यह कविता थी-
जब तुम मुझे अपमानित करते हो
तब तुम मेरे निकष होते हो
प्रभु से प्रार्थना है
वह तुम्हें निकष ही रहने दे।
यह कविता मेरे अंदर इसलिये अटकी, क्योंकि तब मुझे ‘निकष’ शब्द का अर्थ नहीं मालूम था। अपने घुमावदार अक्षरों में कविता लिखने के बाद नरेश जी ने कविता पढ़ी। वे धीमे और रूक-रुककर संवाद करते थे। वह भी काफी हल्के स्वर में। उन्होंने कविता पढ़ते हुये, हमारी आँखों में देखा और कहा – ‘इसलिये यह बात मैं कहता हूँ, निकष को निकष ही रहने दो। निकष यानी कसौटी। कसौटी वो पत्थर है, जिससे सोने को भी परखा जाता है’। (इंदौर में सांवेर रोड स्थित चौथा संसार के संपादकीय विभाग। 1991 में लेखक ने अपनी डेस्क पर काम करते हुये यह चित्र खींचा था।)बढ़ने लगी मेहता जी की बातों में रुचि: सबक का यह पहला पाठ पढ़ने के साथ ही श्रद्धेय नरेश जी की बातों के प्रति हमारी अभिरुचि और भी बढ़ने लगी। हम तब पत्रकारिता में नये-नये आये थे। युवा थे, बहुत कुछ सीखने के साथ जमकर काम कर रहे थे। उस दौर में हमारे लिये आदरणीय देवप्रिय अवस्थी से लेकर स्व. बापू परमार, रमण रावल या जीवन सिंह ठाकुर आदि सभी गुरूजनों की तरह थे। हमारे लिये तब प्रतीक श्रीवास्तव की कॉपी, गोपाल जोशी या कैलाश नागर जी की आँचलिक ख़बरों की समझ, सुशीम पगारे, महेश कजोड़िया जी का खेल डेस्क संभालना, सतीश जोशी और आशुतोष वाजपेयी का सिटी डेस्क के लिये काम करना, सब सीखने और जिज्ञासा की बातें थे। उस दौर में स्टेट प्रेस क्लब के वर्तमान अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल और आलोक वाजपेयी जैसे साथी भी सेवारत रहे। बाद में साहित्य के प्रति सजग प्रिय आलोक ने उनका यादगार इंटरव्यू भी रिकॉर्ड किया था। (इस तस्वीर में श्रीनरेश मेहता जी पत्नी महिमा जी के साथ दिखाई दे रहे हैं। मैं उनके पास ही बैठा हूँ। श्रीनरेश जी के पास प्रख्यात चित्रकार विष्णु चिंचालकर, उनके आगे बालकवि बैरागी जी और इंदौर के कुछ पत्रकार और संस्कृति कर्मी दिखाई दे रहे हैं। इनमें प्रतीक श्रीवास्तव, पीछे की पंक्ति में दीपा तनवीर, शाहिद मिर्ज़ा और अतुल पटेल और श्रीमती सुमित्रा जोशी दिखाई दे रही हैं।)
साहित्यकारों के सान्निध्य का सुखद संयोग: यह ईश्वरीय कृपा और हमारे प्रबंध संपादक श्री सुरेंद्र संघवी जी खोज थी, जिसकी वजह से हमें विद्वान साहित्यकार डॉ.प्रभाकर माचवे के बाद एक और दिग्गज साहित्यकार और कवि श्रीनरेश मेहता जी का बतौर संपादक सान्निध्य मिल रहा था। एक संपादक के रूप में यह हमारी एक बेहद संवेदनशील कवि के सामीप्य के दिन थे। एक ऐसा कवि जिसका भाषा सौंदर्य, शब्दों का रख-रखाव अपने समकालीन रचनाकारों से एकदम भिन्न था। उनके खजाने में संस्कृति निष्ठ और खांटी देशज शब्द थे। खड़ी भाषा का प्रवाह था। वे एक सृजक थे, जिनके व्यक्तित्व में हमारी संस्कृति की महक आती थी। श्रषि और मुनियों सा चिंतन और दर्शन मिलता था। अब लगता है जैसे यह सबकुछ एक गुरूकुल जैसा था। चेतना में गहरे दर्शन का अमृत: धीरे-धीरे श्रद्धेय नरेश जी के कवि व्यक्तित्व से हम गहराई से जुड़ने लगे। बहुत बार हम अचंभित होते थे, उनकी सृजन दृष्टि से अपनी चेतना को गहरे दर्शन से भरते थे। उनके कवि मन का भाव अनूठा था।
जब हमारे स्वत्व का चंदन वृक्ष
पीपल के पत्रों-सा प्रार्थनामय हो जाता है
तब कोई और नहीं
यह मानवीय स्वंय ही कल्पतरू हो जाता है
उन्होंने अपने लेखन और अनुभव में प्रकृति को अंगीकार कर लिया था। उनकी कविता और प्रकृति में अंतर ढूंढना मुश्किल था। उनकी कविताएं वन जीवन और हमारे पुरातन ज्ञान से एकाकार हो गई थीं। ‘किरण-धेनुएं’ कविता जैसा काम उनके लेखन में बिखरा पड़ा था।
बरस रहा आलोक-दूध है
खेतों और खलिहानों में
जीवन की नव किरन फूटती
मकई औ’ धानों में
सरिताओं में सोम दुह रहा था वह अहीर मतवाला
उदयाचल से किरन-धेनुएं
हाँक ला रहा था वह प्रभात का ग्वाला।
उनके चरित्र और प्रतिबिंब सब हमारे सहस्त्रों वर्षों की गहनता और खाक़ छानकर आये थे। कविताओं में गहरा चिंतन और दर्शन था। ‘वृक्षत्व’ उनकी एक ऐसी ही कविता है।
माधवी के नीचे बैठा था
कि हठात् विशाखा हवा आई
और फूलों का एक गुच्छ
मुझ पर झर उठा
माधवी का यह वृक्षत्व
मुझे आकण्ठ सुगंधित कर गया
उस दिन
एक भिखारी ने भीख के लिये ही तो गुहारा था
और मैंने द्वाराचार में उसे क्या दिया
उपेक्षा, तिरस्कार
और शायद अपशब्द
मेरे वृक्षत्व के इन फूलों ने
निश्चय ही उसे कुछ तो किया होगा
पर सुंगधित तो नहीं
सबका अपना-अपना वृक्षत्व है!
श्रीनरेश जी ने माँ को नहीं देखा था:
मुझे याद पड़ता है, उन्होंने अपनी माँ को नहीं देखा था, उनका बचपन मां के ममता भरे साये के बिना ही बीता था। उन्होंने ‘चौथा संसार’ में एक बार मां को लेकर एक-दो कविताएं सुनाईं थीं। तब मन दु:ख से भरा था। हमें महसूस हुआ था कि कवि होना क्या होता है, उसका विस्तार किस तरह से हो जाता है।
मैं नहीं जानता
क्यों नहीं देखा है कभी
पर जो भी
जहाँ भी लीपता होता है
गोबर के घर-आँगन
जहाँ प्रतिदिन दुआरे बनाता होता है
आटे-कुंकुम से अल्पना
जो भी
जहाँ भी लोहे की कढ़ाही में छौंकता होता है
मेथी की भाजी
जो भी
जहाँ भी चिंता भरी आँखे लिये निहारता होता है
दूर तक का पथ
वही,
हाँ, वही है माँ !!
(1993 में श्रीनरेश मेहता जी को ज्ञानपीठ पुरुस्कार के अंतर्गत वाग्देवी की काष्ठ प्रतिमा प्रदान करते हुए देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री पीवी. नरसिम्हाराव। समीप हैं ज्ञानपीठ प्रकाशन के साहू श्री अशोक जैन जी।)
गुरूकुल की तरह ज्ञान बढ़ता रहा: हमारे शिष्यत्व भाव की उपस्थिति से वे प्रसन्न रहते थे। मैं उनके कार्यालीन काम में सहयोग करता, प्रकाशित होने वाली सामग्री और लेखन के बारे में समझता। भाई रविंद्र उनसे साहित्य से जुड़े जिज्ञासा भरे प्रश्न पूछते। एक गुरूकुल की तरह हमारा ज्ञान बढ़ता रहता। श्री नरेश जी मुझे पंडित और रविंद्र को मौलाना कहकर संबोधित करते। वे वर्षों आकाशवाणी के अधिकारी रहे थे। युवा दिनों में वामपंथी राजनीति से जुड़े रहे थे। साहित्य से जुड़ी अनेक संस्थाओं से नाता था। उन्हें साहित्य अकादमी और मध्यप्रदेश का शिखर सम्मान मिल चुका था। वे दिल्ली, लखनऊ, इलाहाबाद, उज्जैन जैसे शहरों से गहरा नाता रखते थे। नईम साहब, मुक्तिबोध से लेकर भीष्म साहनी, निर्मल वर्मा, मनोहर श्याम जोशी, उपेंद्र नाथ अश्क, शैलैश मिटयानी जैसे कई नामी साहित्यकारों से जुड़े थे। इन नातों से हमारा भी उनकी बातों से नाता जुड़ जाता था। अक्सर उनके कविता संग्रह ‘अरण्या’ की बात भी छिड़ती, कभी ‘उत्सवा’, ‘देखना एक दिन’ या ‘तुम मेरा मौन हो’ के लेखन की बातें होती। (ज्ञानपीठ पुरुस्कार दिये जाने के समय लिया गया एक और चित्र।) जब हुई ज्ञानपीठ अवार्ड दिये जाने की घोषणा: जब उन्हें ज्ञानपीठ अवार्ड प्रदान किये जाने की घोषणा हुई। हमें जैसे ही यह बड़ी ख़बर मिली, हम उनके निवास पर पहुंच गये। (या शायद तब हम उनके निवास पर ही थे।) इस समाचार से हमारे कार्यालय और पूरे साहित्यिक जगत में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। हमने इस अवसर पर उनका एक लंबा साक्षात्कार लिया। यह दिल्ली से प्रक्राशित ‘नवभारत टाइम्स’ में प्रकाशित हुआ। इसमें हमारी स्व.शाहिद मिर्ज़ा ने मदद की थी। हमारा यह विस्तृत साक्षात्कार ‘चौथा संसार’ में पहले पेज पर छपा और शेष सामग्री पेज नंबर 2 पर। दु:ख की बात यह है कि आज हमारे पास नवभारत टाइम्स के उस इंटरव्यू की एक भी प्रति नहीं। इसी तरह हमने डॉ. प्रभाकर माचवे के कृतित्व पर भी एक विशेषांक निकाला था। आज वह भी मेरे पास नहीं। यशस्वी संपादक के साथ होने का गर्व: तब हमारे साथ ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले यशस्वी संपादक का होना बड़े गर्व की बात थी। आज भी हम यही महसूस करते हैं। नीचे दी गई यह तस्वीर ‘चौथा संसार’ में उनके केबिन में खींची गई थी। अच्छे दिनों का चक्र तेज़ी से घूमा: इन अच्छे दिनों का चक्र तेज़ी से घूमा और श्रीनरेश मेहता के जीवन में एक ऐसा प्रसंग आया जिसने हम सभी को झकझोर दिया। श्रीयुत मेहता जी के इकलौते पुत्र ईशान का विवाह के बाद एक सड़क दुर्घटना में दु:खद निधन हो गया। वो दिन आज भी किसी वज्रपात की तरह आँखों में घूमता है। श्रद्धेय श्रीनरेश जी से जुड़ी सारी स्मृतियों पर वह एक दिन आज भी भारी पड़ता है। यह लिखते समय भी मेरी आँखें नम है। दिल भर आया है। हमें जब निधन की ख़बर मिली, हम उनके घर के सामने वाले मैदान में सैकड़ों ग़मगीनों के बीच खड़े हो गये। श्रीनरेश मेहता जी ने पुत्र के विवाह के बारे में सोचकर ही संगम नगर के करीब एक बड़े घर में रहना प्रारंभ कर दिया था। सफ़ेद रंग से पुता उस घर पर रंग-बिरंगी रोशिनियों वाली झालर और कुछ सजावट के निशान अब भी शेष थे। (दिसंबर 2022 में श्रीनरेश मेहता के जन्मशताब्दी वर्ष में उनपर एकाग्र वीणा ने अपना विशिष्ट प्रकाशित किया है। इसी पत्रिका ने बाद में श्रीनरेश मेहता पर मेरा यह स्मृति लेख फरवरी 2023  के अंक में प्रकाशित किया।)व्यथित श्रीनरेश जी सिर झुकाये बैठे थे: उस घर के आंगन में बने गेट के करीब एक कुर्सी पर श्रीनरेश जी सिर झुकाये बैठे थे। बेटे का जब शव सामने आया, भाई रविंद्र उनके पास पहुंचे, श्री नरेश जी ने अपना एक कांपता हुआ हाथ रविंद्र के कांधे पर रख दिया। इस लेख के लिखने से पहले हुई बातचीत में भाई रविंद्र ने कहा, ‘उनके उस हाथ की कंपन को आज भी मैं महसूस कर सकता हूँ’। रविंद्र के लिये यह पल इसलिये और भी असहनीय था क्योंकि विवाह की बहुत सी तैयारियों में उनके ज्योतिषी चाचा श्री विश्वनाथ व्यास के उनकी मां और पिता ने सहयोग दिया था। कहते हैं कि ईशान विवाह नहीं करना चाहते थे, उनके बारे में किसी ज्योतिषी का आकलन था कि उनका वैवाहिक जीवन नहीं है। परंतु वयोवृद्ध माता-पिता चाहते थे कि उनकी आँखों के सामने बेटे का घर बस जाये। बेटी वान्या का विवाह पहले ही हो चुका था। (श्रीनरेश मेहता जी की पत्नी स्व. महिमा मेहता। श्रीमेहता के हर उतार-चढ़ाव में श्रीमती महिमा ने डटकर साथ निभाया था।)बड़ी कठिनाइयों के बीच गुज़रा जीवन: श्रीनरेश जी को लेखन में जो यश और सम्मान मिला। यह आज हम सभी को याद है। परंतु उनका व्यक्तिगत जीवन कितनी कठिनाइयों से गुज़रा इसके बारे में शायद कम ही लोगों को पता है। उनके वामपंथी विचारों की वजह से एक ज़माने में उनकी आकाशवाणी की नौकरी चली गई थी। उन्हें जीवन यापन के लिये कई पत्रिकाओं का संपादन और अपने प्रकाशित पुस्तकों से जीवन की गाड़ी को आगे चलाना पड़ा। महिमा जी ने टीचर के रूप में भी घर का भार संभाला। उन्होंने बहुत धीरज से एक कवि के साथ अपने जीवन का निर्वहन किया। एक साथी के रूप में उनका भी श्रीनरेश जी के जीवन में बड़ा योगदान रहा। हाल ही में वे भी श्रीनरेश जी के पास चली गईं। श्रीनरेश जी हमारे साथ नहीं, परंतु उनके विचार, उनका साहित्य हमारे साथ हैं। बरसों पहले लिखी रचनाएं आज भी नई मालूम पड़ती है। उनकी रचनाएं भारतीयता के दर्शन कराती हैं। भारत की चिंतन धारा और दर्शन से जोड़ती हैं। मध्यप्रदेश के शाजापुर में जन्मे, उज्जैन में पढ़े-लिखे इस विरल कवि और संपादक की स्मृति को मेरा नमन, प्रणाम। आगे पढ़िये –

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