कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। सिनेमा केवल परदे पर चलती कहानियों का नाम नहीं है—वह स्मृति है, विचार है और समय से संवाद करने की एक सशक्त कला भी। इसी भाव को केंद्र में रखकर मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा दिसंबर 2025 में छिंदवाड़ा में श्रीराम ताम्रकर–सुनील मिश्र स्मृति समारोह का आयोजन किया गया। इसमें फिल्म लेखक और समीक्षक स्व. श्रीराम ताम्रकार के नाम पर पुरस्कार स्थापित किये जाने की मांग उठी।
गुरु और शिष्य का सांस्कृतिक मेल: यह आयोजन प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक स्व. श्रीराम ताम्रकार की स्मृति में आरंभ हुआ था, जिसे बाद में सिने पत्रकार स्व. सुनील मिश्र को भी समर्पित किया गया। यह एक भावनात्मक संयोग है कि 13 दिसंबर श्रीराम ताम्रकार की पुण्यतिथि है और यही दिन सुनील मिश्र का जन्मदिन भी। गुरु और शिष्य के इस सांस्कृतिक मेल ने समारोह को आत्मीयता और गहराई प्रदान की।
सिनेमा को समझने की संस्कृति: संस्कृति विभाग की मंशा रही है कि सिनेमा पर गंभीर संवाद केवल महानगरों तक सीमित न रहे। हर वर्ष मध्यप्रदेश के किसी नए शहर में इस आयोजन को ले जाकर उन दर्शकों तक पहुँचना, जो सिनेमा से प्रेम तो करते हैं, लेकिन उसे समझने और उस पर विचार करने के अवसर कम ही पाते हैं। श्रीराम ताम्रकार और सुनील मिश्र ने अपने लेखन के माध्यम से यह सिखाया कि सिनेमा को पढ़ा भी जा सकता है, समझा भी और सवालों के आईने में देखा भी। यह आयोजन उसी परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश है।
आर.के.स्टूडियो की संगीतमय यात्रा:13 दिसंबर को वरिष्ठ लेखक–निर्माता डॉ. राजीव श्रीवास्तव ने आर.के. स्टूडियो की फिल्मों की संगीतमय यात्रा पर व्याख्यान दिया। उन्होंने हिंदी सिनेमा के उस दौर की याद दिलाई, जहाँ संगीत कहानी की आत्मा हुआ करता था। इसी सत्र में उन्होंने मध्यप्रदेश सरकार से यह सुझाव भी रखा कि स्व. श्रीराम ताम्रकार के नाम पर एक वार्षिक पुरस्कार स्थापित किया जाए, जो हिंदी सिनेमा पर उत्कृष्ट लेखन करने वालों को दिया जाए। यह प्रस्ताव सिने पत्रकारिता को सम्मान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बनकर सामने आया।
नासिर हुसैन की फिल्मों का संगीत: इसके बाद पंकज राग ने नासिर हुसैन की फिल्मों के संगीत पर गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया और फिल्म कारवां का प्रदर्शन हुआ। दिन का समापन नाटक गजमोक्ष से हुआ, जिसे सुनील मिश्र ने लिखा और विनोद कुमार मिश्रा ने निर्देशित किया।
एआई और सिनेमा का भविष्य: 14 दिसंबर को समय ताम्रकर ने ‘एआई और सिनेमा का भविष्य’ पर विचार रखे, जबकि अरुण ठाकरे ने धर्मेन्द्र की संवेदनशील भूमिकाओं पर प्रकाश डाला। इसके बाद फिल्म सत्यकाम और नाटक ऐसे रहो की धरती का मंचन हुआ। आमतौर पर ऐसे गंभीर सांस्कृतिक आयोजनों में सीमित दर्शक ही जुटते हैं, लेकिन छिंदवाड़ा ने इस धारणा को तोड़ दिया। दोनों दिन सभागार खचाखच भरा रहा, और बड़ी संख्या में युवा दर्शक मौजूद थे।
दर्शक गंभीर संवाद के लिए तत्पर: यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि यदि सिनेमा को सही संदर्भ और सम्मान के साथ प्रस्तुत किया जाए, तो दर्शक आज भी गंभीर संवाद के लिए तत्पर हैं। और अब समय आ गया है कि स्व. श्रीराम ताम्रकार के नाम पर एक पुरस्कार की स्थापना कर इस परंपरा को संस्थागत रूप दिया जाए।
फिल्म लेखक और समीक्षक स्व. श्रीराम ताम्रकार के नाम पर स्थापित हो पुरस्कार
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