कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। रामायण की कथा में शूर्पणखा को अक्सर एक ‘राक्षसी’, ‘कामुक’ और ‘खलनायिका’ के रूप में पेश किया जाता रहा है। लेकिन जब META 2026 के मंच पर मलयालम नाटक ‘धौमी किथा किथा धौमी’ का पर्दा उठा, तो दर्शकों ने एक ऐसी शूर्पणखा को देखा जो पितृसत्तात्मक इतिहास के पन्नों से बाहर निकलकर अपने हक और अपनी पहचान के लिए चीख रही है। निर्देशक ओ.टी. शाजहान की यह प्रस्तुति ‘रामायण’ का एक अत्यंत साहसी और समकालीन पुनर्पाठ है। बता दें कि इस साल नाटक को बेस्ट ओरिजन स्क्रिप्ट और बेस्ट कोरियोग्राफ़ी का अवॉर्ड मिला है।
कहानी: हाशिए से केंद्र की ओर: नाटक की कहानी शूर्पणखा के उस अंग-भंग (नाक और कान काटना) की घटना को केंद्र में रखती है, जिसे सदियों से ‘मर्यादा’ के नाम पर सही ठहराया गया। यहाँ शूर्पणखा कोई डरावनी राक्षसी नहीं, बल्कि एक ऐसी स्त्री है जिसकी अपनी इच्छाएँ हैं और जिसकी देह पर केवल उसका अधिकार है। नाटक यह सवाल उठाता है कि क्या किसी स्त्री की मुखरता और उसकी सुंदरता का विनाश करना ही न्याय है? यह कहानी पौराणिक काल से शुरू होकर आज की आधुनिक स्त्री के दमन तक का सफ़र तय करती है, जहाँ पुरुष सत्ता हर उस आवाज़ को दबा देना चाहती है जो ‘मर्यादा’ के दायरे से बाहर जाती है।
मंच प्रस्तुति और डिज़ाइन: एक विजुअल ट्रीट: नाटक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी ‘फिजिकल थिएटर’ (शारीरिक रंगमंच) शैली है। निर्देशक ने इसमें श्रीलंका के पारंपरिक ‘कंड्यान नृत्य’ (Kandyan Dance) का अद्भुत उपयोग किया है। मंच पर कलाकारों की शारीरिक गतिशीलता (Physicality) इतनी तीव्र है कि बिना शब्दों के भी दर्शकों को उनके भीतर का क्रोध और पीड़ा महसूस होती है। मंच पर लाल और काले रंगों का प्रयोग, धुएँ का प्रभाव और न्यूनतम लेकिन प्रभावी सेट डिज़ाइन एक आदिम और रहस्यमयी माहौल बनाता है। संगीत और ध्वनि: ‘धौमी’ की गूँज: नाटक का शीर्षक ‘धौमी किथा किथा धौमी’ एक लयबद्ध ताल (Rhythm) है, जो पूरी प्रस्तुति के दौरान पार्श्व में गूँजती रहती है। यह ताल केवल संगीत नहीं, बल्कि उस समय के बीतने और बदलती चेतना का प्रतीक है। पारंपरिक वाद्य यंत्रों और समकालीन ध्वनि प्रभावों का मेल दर्शकों को एक समाधि (Trance) जैसी स्थिति में ले जाता है, जहाँ शब्द गौण हो जाते हैं और केवल संवेदनाएँ बचती हैं।
लोककथाओं और महाकाव्यों के बीच तलाश: नाटक का लेखन मौलिक शोध पर आधारित है, जो लोककथाओं और महाकाव्यों के बीच के धुंधलके को तलाशता है। मुख्य भूमिकाओं में रज़ाक और फातिमा ने अपने शरीर को एक माध्यम की तरह इस्तेमाल किया है। उनके अभिनय में जो लचक और शक्ति दिखी, वह भारतीय रंगमंच में विरल है। विशेष रूप से शूर्पणखा के अपमान और उसके बाद के रूपांतरण को फातिमा ने जिस तीव्रता से निभाया, उसने दर्शकों को भीतर तक झकझोर दिया। देह की राजनीति का एक दस्तावेज: निर्देशक ओ.टी. शाजहान के अनुसार, यह नाटक केवल एक पौराणिक पात्र की वकालत नहीं है। वे कहते हैं: “मेरे लिए ‘धौमी किथा किथा धौमी’ देह की राजनीति का एक दस्तावेज है। शूर्पणखा की नाक काटना, दरअसल हर उस स्त्री की पहचान को मिटाना है जो सवाल करती है। हमने इस नाटक के जरिए उस ‘म्यूट’ (मौन) कर दी गई आवाज़ को एक स्वर देने की कोशिश की है।”
समकालीन कहानी और रामायण की गाथा: शाजहान के मुताबिक, यह एक ऐसा नाटक है जो दो कथाओं को आपस में जोड़ता है। एक समकालीन काल्पनिक द्वीप-गाँव की कहानी और ‘रामायण’ की शूर्पणखा की गाथा। रज़ाक, फ़ातिमा और उनके दोस्त इस प्राचीन कथा को नए सिरे से सुनाते हैं, जिसमें शूर्पणखा पितृसत्ता द्वारा हाशिए पर धकेली गई महिलाओं का प्रतीक हैं। भाई द्वारा त्यागी गई, पति द्वारा गुमराह की गई और देवताओं द्वारा ठुकराई गई, उनकी कहानी सामाजिक अपेक्षाओं और लैंगिक भूमिकाओं के बारे में मार्मिक प्रश्न उठाती है। यह नाटक धार्मिक असहिष्णुता और पूर्वाग्रह पर आधारित भेदभाव को उजागर करता है। आगे पढ़िये -अलविदा आशा ताई: वो आवाज़ जिसने जगाया गायिकी का एक अलग जादू! https://indorestudio.com/alvida-asha-tai-tribute-asha-bhosle/
शूर्पणखा का दमित स्वर और देह का विद्रोह: ‘धौमी किथा किथा धौमी’
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