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सिने संगीत के सुनहरे दौर का आख़िरी सुर भी ख़ामोश हो गया।
सुमन कल्याणपुर हमारे बीच नहीं रहीं।
उनका नवासी साल की उम्र में निधन हो गया।
लता मंगेशकर और आशा भोंसले जैसी गायिकाओं के दौर में भी
उन्होंने अपने गायन की स्वर्ण रेखा को ज़िंदा रखा-
बिना किसी शिकवे या शिकायत के।
हिंदी सिनेमा में उनका सफर
फिल्म ‘नसीब’ के गीत ‘जिंदगी इम्तिहान लेती है’ के साथ थम चुका था
लेकिन संगीत जगत में उनकी गरिमा हमेशा कायम रही।
इस बेहतरीन गायिका को याद कर रहे हैं जाने-माने लेखक और सीनियर जर्नलिस्ट अजय बोकिल।
अजय बोकिल ने लिखा है –
सुमन कल्याणपुर की आवाज़
लता मंगेशकर से बहुत ज़्यादा मेल खाती थी।
ये उनकी ख़ूबी भी थी और चुनौती भी…
उनकी नाज़ुक, हवा के मंद झोंके जैसी मीठी आवाज़ सुनकर
लोग अक्सर धोखा खा जाते थे।
वे उनकी आवाज़ को लताजी की आवाज़ समझने की भूल कर बैठते थे।
इस चुनौती के बावजूद उन्होंने सुमन जी ने अपनी ख़ास पहचान बनाई।
फिल्म ‘शगुन’ का गीत
‘बुझा दिए हैं खुद अपने हाथों…,
फिल्म ‘नूर महल’ का गीत
मेरे महबूब ना जा,
फिल्म ‘रेशम की डोरी’ का गीत
‘बहना ने भाई की कलाई से… और
फिल्म ‘दिल एक मंदिर’ का गीत
‘नन्हीं सी परी मेरी लाड़ली…’
उनकी गायिकी और अंदाज़ के बारे में बताने के लिये काफ़ी हैं।
लता मंगेशकर के दौर में अपनी मौलिक आवाज़ को बचाए रखना
उनके लिये एक बड़ी चुनौती थी।
बहुत से समीक्षकों ने तो उन्हें दूसरी लता तक कहा!
लेकिन सुमन जी ने कभी खुद को
लता जी जैसा या उनका कॉम्पटीटर नहीं माना।
कॉलेज के दिनों में मंच पर लता जी के गीत गाने वालीं सुमन
बड़ी सहजता से अपनी कला साधना में लीन रहीं।
साठ के दशक में जब लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी के बीच
रॉयल्टी के मुद्दे को लेकर विवाद हुआ।
तब संगीतकारों के लिए सुमन कल्याणपुर
एक वरदान साबित हुईं।
इस दौरान रफ़ी साहब के साथ उनकी जोड़ी ने
एक नया इतिहास रचा।
उन्होंने रफ़ी साहब के साथ सबसे अधिक
एक सौ सैंतीस युगल गीत गाए।
इनमें ‘दिल एक मंदिर है…’,
‘आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे…’ और
‘तुमने पुकारा और हम चले आए…’
जैसे गीत आज भी बड़े लोकप्रिय हैं।
सुमन जी ने अपने दौर के सभी नामी गायकों के साथ यादगार नग़मों में आवाज़ दी…
मुकेश के साथ ‘मेरा प्यार भी तू है…’
मन्ना डे के साथ ‘तुम जो आ जाओ…’ और
किशोर कुमार के साथ
‘तेरा मेरा, मेरा तेरा मिल गया दिल…’ जैसे गीतों से
सुनने वालों को मंत्र मुग्ध कर दिया।
मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा फिल्म ‘गंगा की लहरें’ का अमर भजन
‘जय जय हे जगदम्बे माता’ भी
उन्हीं की आवाज़ की देन है।
सुमन जी ने मराठी सुगम संगीत (भावगीत),
बंगाली और दूसरी भाषाओं में भी एक से बढ़कर एक गीत गाये।
सुमन कल्याणपुर अपने जीवन में चकाचौंध से दूर रहीं।
भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मभूषण’ और
महाराष्ट्र सरकार ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘महाराष्ट्र भूषण’ से विभूषित किया।
जीवन के आख़िरी पड़ाव में, उनका गाया गीत—
‘क्या बताएं तुम्हें हम,
शम्मा की क़िस्मत क्या है’—
उनकी इस बात को बयान करता है
कि उन्होंने अपनी हद को ही
अपनी सबसे बड़ी ताक़त बना लिया।
इंदौर स्टूडियो की तरफ़ से उनकी याद को सलाम…उनके ही इस गीत के साथ…

