शकील अख़्तर,इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। ‘पचास साल में मैंने ऐसा कोई शे’र नहीं कहा, जिसपर मैं फख़्र कर सकूं लेकिन यह दुआ ज़रुर मांगता हूं कि खुदा मुझसे ऐसी कोई दो लाइनें लिखवा दे ताकि मैं मरने के बाद भी ज़िंदा रह सकूं ।‘अपनी शायरी से लोगों के दिलों पर राज करने वाले मशहूर शायर प्रो. राहत इंदौरी ने यह बात कही। राहत साहब की शायरी का यह गोल्डन जुबली वर्ष है । इंदौर, मध्यप्रदेश में उनकी शायरी की स्वर्ण जयंति पर 4 दिसंबर की शाम एक बड़ा आयोजन होने जा रहा है। स्थानीय अभय प्रशाल में– ‘जश्न-ए-राहत’ नाम से यह अभिनंदन समारोह होगा। शहर में बड़े मुशायरे आयोजित करने वाली दो संस्थाएं- ‘अदबी कुनबा और निनाद’ मिलकर यह आयोजन कर रही हैं।
1969 में हुई सुनहरे सफ़र की शुरुआत : 1950 में जन्मे राहत इंदौरी ने 1969 में इंदौर के रानीपुरा की अदबी लायब्रेरी में पहली बार रचनाएं सुनाकर शायरी की दुनिया में कदम रखा था । उस वक्त नौजवान राहत की उम्र महज़ 18 साल की थी। मगर उनकी ग़ज़लों के तेवर और उन्हें पेश करने का अंदाज़ ऐसा था कि देखते-ही-देखते उनका नाम लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया। 80 के दशक के आते-आते राहत देश के हर शहर और कस्बे में पहचाने जाने लगे ।
लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द में
यहां पर सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है…
जो आज साहिब -ए-मसनद हैं कल नहीं होंगे
किरायेदार हैं, ज़ाती मकान थोड़ी है…
लोग उनकी ग़ज़लों के उम्दा शे’र बात-बात में दोहराने और उनके मुशायरों के क़िस्से और रिकॉर्डिंग्स एक-दूसरे तक पहुंचाने लगे। आज दुनिया भर में लोग उनकी शायरी के दीवाने हैं। मंचों से लेकर यू ट्यूब तक वे छाये हुए हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि राहत साहब ने हर दौर पर अपनी बात बड़ी बेबाकी से कही। हालात का तप्सरा किया।, तल्ख़ हक़ीक़त बयान की और अवाम के दिल को आवाज़ दी।
जहां हिंदुस्तानी वहां राहत साहब के फ़ैन : अपनी शायरी के इस सुनहरे मोड़ पर राहत साहब बताते हैं – ‘यह तो याद नहीं कि मुझे कितने मुशायरों में पढ़ने का मौका मिला है लेकिन दुनिया के जिस भी मुल्क में मेरे हमवतन (हिंदुस्तानी) रहते हैं, उनके बीच मुझे अपनी रचनाएं सुनाने का मौका ज़रुर मिला है। ख़ासकर वहां जहां हिंदुस्तानियों की आबादी ज़्यादा है। जहां इस ज़बान को लोग समझते हैं। इनमें बड़ी तादाद में पाकिस्तान ,बांग्लादेश, दुबई और उर्दू अदब के चाहने वाले भी शामिल है।‘ राहत साहब ने बताया-’ कार्यक्रमों की संख्यां का मैंने कभी कोई हिसाब याद नहीं रखा । मगर जवानी के दिनों में मैं एक ही रात में मुशायरों के 3-3 कार्यक्रमों में पढ़ने जाता था। मिसाल के लिये उन्नाव में कार्यक्रम है तो उसके बाद कानपुर और फिर मोहान में भी शिरकत करता था । सेहत अब साथ नहीं देती लेकिन अब भी हर दो-तीन में एक ना एक मुशायरे में शिरकत करता हूं। आज भी मेरा एक क़दम घर के बाहर ही रहता है।‘

अब हर क़दम पर शायर बेटे का साथ : राहत साहब पिछले करीब 4 साल से अपने बेटे सतलज राहत के साथ ही कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं। सतलज राहत इस अज़ीम शायर की विरासत को अपनी तरह की शायरी से आगे बढ़ा रहे हैं। वे अपने वालिद की सेहत का खयाल रखने के साथ ही मंच पर अपनी शायरी से लोगों का दिल जीतने लगे हैं।
अब नहीं हेर फेर से होगा,
काम बस मेरे शे‘र से होगा…
सतलज के साथ रहने की बड़ी वजह राहत साहब की लंबे वक्त डायबिटीज़ की बीमारी है। सतलज सफ़र में इस नज़रिये से भी उनका खयाल रखते हैं।
जब राहत साहब के घर पहुंचे स्वास्थ मंत्री : हाल ही में राहत साहब की बायीं आंख के मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ था लेकिन डॉक्टरों की ग़लती की वजह से वो ऑपरेशन नाकाम रहा। इसके बाद राहत साहब को दूर की चीज़ें देखने में दिक्कत आने लगी। यह बात जब मध्यप्रदेश के स्वास्थ मंत्री तुलसी सिलावट को लगी, तब वे उनके घर पहुंचे। उन्होंने राहत साहब के इलाज के लिये हर मुमकिन मदद देने का भरोसा दिया। आंख के अस्पताल और विशेषज्ञ सर्जनों से बात की। राहत साहब स्वास्थ मंत्री की इस सदाशयता पर कहते हैं – ‘ राज्य सरकार की इस मेहरबानी के लिये मैं आभारी हूं। शुक्रिया अदा करता हूं।‘ उन्होंने बताया-‘ फिलहाल इंदौर के विजय नगर में एक ‘आई सेंटर’ चलाने वाले सर्जन अरूण भार्गव उनकी आँख का इलाज कर रहे हैं। डॉ. भार्गव ने कहा है, कुछ वक्त ज़रुर लगेगा लेकिन मेडिसीन के ज़रिये ही रोशनी काफी हद तक ठीक हो जायेगी। ऐसा हो भी रहा है।‘ विज़न कमज़ोर होने के बावजूद राहत साहब ने हंसते हुए कहा – ‘ मैं अल्लाह का अदा करता हूं, कि ऐसा हुआ…वैसे भी दुनिया इतने करीब से देखने की चीज़ नहीं है।‘
काव्य संग्रह – ‘नाराज़’ दो साल से बेस्ट सेलर : राहत इंदौरी के बड़े बेटे फैसल राहत अपने पिता के प्रकाशनों और दूसरे प्रबंधनों का काम संभालते हैं। फैसल बताते हैं – ‘राहत साहब के देवनागरी और उर्दू में अब तक 8 संग्रह आ चुके हैं। मंजुल पब्लिकेशन से प्रकाशित संग्रह ‘नाराज़’ पिछले दो साल से बेस्ट सेलर बुक रही है। ‘दैनिक जागरण’ के सर्वेक्षण में यह किताब पिछले दो साल से पहले नंबर पर बनी हुई है। इसके अलावा वाणी से राहत साहब की दो किताबें प्रकाशित हुई हैं। पहली किताब है- ‘चांद पागल है’ और दूसरी किताब का नाम ‘रूत’ है। राजकमल से भी दो किताबें प्रकाशित हुई हैं। पहली है- ‘मेरे बाद’ और दूसरी ‘मौजूद।‘ देवनागरी के अलावा उर्दू में उनकी तीन क़िताबें हैं। पहली है – ‘धूप-धूप।‘ यह 1979 में आई थी। उसके बाद ‘पांचवा दरवेश’ और एक सारी किताबों को लेकर है, उसका नाम है – ‘कलाम।‘ इन सब से अलग राहत साहब की शायरी, गीतों और उनकी शख़्सियत पर ‘लम्हे-लम्हे’ नाम से एक किताब पब्लिश हुई है। इसमें देश के 150 समालोचकों और उर्दू लेखकों के लेख और इंटरव्यूज़ शामिल हैं।’

