Wednesday, April 15, 2026
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सुरों का स्वर्णिम सफ़र: लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत से सजी जादुई शाम

कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। ताल और लय का ऐसा अनूठा संगम, जिसने न केवल मन को थिरकाया बल्कि श्रोताओं को भावनाओं के उस संसार में ले गया जहाँ हर धुन एक जीती-जागती कहानी बन गई। संस्था ‘अभिरुचि’ (संस्थापक: विवेक गौड़) द्वारा 20 मार्च 2026 को स्थानीय जाल सभागृह में आयोजित संगीत संध्या “सुरों का स्वर्णिम सफ़र” वास्तव में हिंदी सिनेमा के उस दौर का पुनर्जन्म था, जिसे हम ‘गोल्डन एरा’ कहते हैं। महान संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के कालजयी संगीत को समर्पित यह शाम श्रोताओं के लिए किसी रूहानी यात्रा से कम नहीं थी।A photograph from a program based on the melodious music of Laxmikant-Pyarelal. A report from Indore Studio.हर धुन में रवानगी, हर गीत में ताजगी: कार्यक्रम की शुरुआत से ही वातावरण में एक विशेष रूमानी ताज़गी और आत्मीयता महसूस की जा रही थी। जैसा कि कहा जाता है—“रोज शाम आती थी मगर ऐसी नहीं थी”—यह शाम सचमुच कुछ अलग और बेहद खास थी। मंच पर जब सुरों की लहरियाँ गूंजीं, तो ऐसा लगा मानो वक्त ठहर गया हो।A photograph from a program based on the melodious music of Laxmikant-Pyarelal. A report from Indore Studio.कलाकारों ने बांधा समां: खलघाट से आए सुप्रसिद्ध गायक भूपेंद्र डोंगरे, कुशल शर्मा और अजीता जी ने अपनी सधी हुई आवाज़ और भावपूर्ण प्रस्तुति से महफिल लूट ली। उनकी गायकी में जहाँ एक ओर पुराने दौर की सौंधी महक थी, वहीं सुरों के प्रति उनका समर्पण श्रोताओं को अंत तक बांधे रखने में सफल रहा। रिमझिम के गीत सावन गाए…” और “तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है… जैसे गीतों ने सभागार में मौजूद हर शख्स को भावुक कर दिया।A photograph from a program based on the melodious music of Laxmikant-Pyarelal. A report from Indore Studio. A photograph from a program based on the melodious music of Laxmikant-Pyarelal. A report from Indore Studio.स्थानीय प्रतिभाओं ने लगा दिये चार चाँद: शहर की प्रतिभाओं क्रमश: सुधीर वासवानी, डॉ. मनीष सिद्ध, दीपाली मोहरिल, डॉ. अल्पना आर्य और रचना वैद्य ने भी अपनी बेहतरीन प्रस्तुतियों से कार्यक्रम में चार चाँद लगा दिए। उनकी गायकी ने यह साबित कर दिया कि संगीत केवल सुरों का मेल नहीं, बल्कि आत्मा का संवाद है।A photograph from a program based on the melodious music of Laxmikant-Pyarelal. A report from Indore Studio. कुशल संचालन में अनछुए प्रसंग: कार्यक्रम की सूत्रधार और जानी-मानी आकाशवाणी उद्घोषिका मोना ठाकुर ने अपने सहज और प्रभावशाली अंदाज़ से पूरी शाम को एक सूत्र में पिरोए रखा। उन्होंने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के जीवन से जुड़े रोचक और अनछुए प्रसंगों को इस ख़ूबसूरती से साझा किया कि श्रोता न केवल गीतों का आनंद लेते रहे, बल्कि उनके पीछे छिपे संघर्ष और सृजन की कहानियों से भी जुड़ते चले गए।A photograph from a program based on the melodious music of Laxmikant-Pyarelal. A report from Indore Studio.एक अविस्मरणीय और सुरीली संध्या: पूरी संध्या के दौरान ऐसा महसूस हुआ मानो घुंघरुओं की धड़कन और दिल की रुनझुन” एक साथ गूंज रही हो। यह आयोजन महज़ मनोरंजन नहीं, बल्कि उन अमर गीतों को एक सादर नमन था जिन्होंने पीढ़ियों के दिलों पर अपनी छाप छोड़ी है। A photograph from a program based on the melodious music of Laxmikant-Pyarelal. A report from Indore Studio.गौड़ जी की टीम बधाई की पात्र: विवेक गौड़ जी और उनकी टीम इस शानदार और सफल आयोजन के लिए बधाई के पात्र हैं। “सुरों का स्वर्णिम सफ़र” लंबे समय तक एक ऐसी मधुर प्रतिध्वनि बनकर याद रखा जाएगा, जो हर बार याद आने पर दिल को सुकून से भर देगी।Composers Laxmikant–Pyarelal. Bollywood's famous duo.संगीत के पर्याय लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल: भारतीय संगीत जगत में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल (L-P) की जोड़ी एक ऐसी अमर गाथा है, जिसने तीन दशकों से भी अधिक समय तक बॉलीवुड पर एकछत्र राज किया। 1963 में फिल्म ‘पारसमणि’ से अपने सफर की शुरुआत करने वाली इस जोड़ी ने लगभग 635 फिल्मों में संगीत देकर एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया जिसे छू पाना नामुमकिन है। उनकी खूबी यह थी कि वे लोक संगीत (Folk) से लेकर भव्य ऑर्केस्ट्रा और शास्त्रीय रागों से लेकर डिस्को बीट्स तक, हर मिज़ाज में माहिर थे।Composers Laxmikant–Pyarelal. Bollywood's famous duo. ‘दोस्ती’ (1964) की सफलता ने उन्हें रातों-रात बुलंदियों पर पहुँचा दिया, जिसके बाद ‘मिलन’, ‘बॉबी’, ‘सत्यम शिवम सुंदरम’, ‘सरगम’, ‘कर्ज़’, ‘उत्सव’, ‘तेज़ाब’ और ‘खलनायक’ जैसी फिल्मों ने उनके संगीत को कालजयी बना दिया। इस जोड़ी की प्रतिभा का लोहा पूरी दुनिया ने माना, जिसके फलस्वरूप उन्हें रिकॉर्ड 7 बार ‘फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार’ के पुरस्कार से नवाजा गया। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत महज़ धुनें नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय सिनेमा की आत्मा हैं, जो आज भी हर महफिल और हर धड़कन में ज़िंदा हैं। आगे पढ़िये – दिल्ली में मेटा 2026 का शुभारंभ, पहले दिन अम्बा का मंचन क्यों?  https://indorestudio.com/meta-2026-shubharambh-amba/

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