शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। ‘आर्टिस्ट कंबाइन अपने संस्थापक स्व. वाय सदाशिव भागवत की स्मृति में इस साल नाट्य आयोजनों का अमृत महोत्सव मना रहा है। 75 साल पहले संस्था के इस पुरोधा अभिनेता ने दुनिया के रंगमंच को अलविदा कहा था। उनकी स्मृति को नाट्य आयोजनों के माध्यम से न सिर्फ श्रद्दांजलि दी जा रही है बल्कि हिन्दी और मराठी नाटकों की रंगभूमि को नये तरीके से सींचने की कोशिशें की जा रही हैं। यही वजह है कि इस साल कई विशिष्ट कार्यक्रमों का सिलसिला जारी है’। यह बात मध्य भारत की इस सबसे पुरानी संस्था के सचिव डॉ. संजय लघाटे ने कही। आपको बता दें कि आर्टिस्ट कंबाइन ने अपनी स्थापना के 85 गौरवशाली साल भी पूरे कर लिये हैं। (तस्वीर में आर्टिस्ट कंबाइन, ग्वालियर के सचिव डॉ. संजय लघाटे एक आयोजन के दौरान अपने विचार रखते हुये।)
कई विशिष्ट आयोजन होना अभी बाकी: श्री लघाटे ने कहा, ‘अमृत महोत्सव वर्ष की वजह से ही हम बहुत से विशिष्ट कार्यक्रम लगातार कर रहे हैं। इनमें हर महीने हिन्दी और मराठी नाटकों का मंचन, नाट्य प्रस्तुति के लिये स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर के नाट्य दलों को आमंत्रण, अलग-अलग तरह की ड्रामा वर्कशॉप्स, व्याख्यान और संवाद के कार्यक्रमों आदि शामिल हैं। आगे कुछ और विशिष्ट कार्यक्रम होना बाकी हैं। (नीचे करीब 40 साल पहले एक मराठी नाटक की प्रस्तुति के बाद खींची गई तस्वीर। इसमें आर्टिस्ट कंबाइन के पुरानी पीढ़ी के कलाकारों में सर्वश्री भालचंद्र पेंढारकर, श्रीनिवास कोचकर, शशि ओदक,शरद नाईक,सुमन भागवत, बसंत परांजपे आदि दिखाई दे रहे हैं।)
एक प्रस्तुति परक कार्यशाला की परिकल्पना: श्री लघाटे ने बताया- ‘इस साल हम राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली के साथ मिलकर एक प्रस्तुति परक नाट्य कार्यशाला करना चाहते हैं। इसी तरह 75 साल के समग्र इतिहास पर केंद्रित एक स्मारिका के प्रकाशन की तैयारी है। यह सब 12 अगस्त 2023 तक चलने वाला है। इसकी शुरूआत बीते साल 12 अगस्त से शुरू हुई थी। उसी वक्त हमारे पुरोधा सदाशिव जी के स्वर्गवास को 75 बरस पूरे हुये थे। उन्होंने कहा, हम दाल बाज़ार में मौजूद अपने नाट्य मंदिर को भी और बेहतर बनाने की दिशा में कदम उठाना चाहते हैं। इसमें हम समय-समय पर सुधार भी करते रहे हैं। बेहतर नाट्य मंदिर का लाभ निश्तित ही भविष्य में नाटकों के प्रदर्शनों के साथ नये कलाकारों को मिल सकेगा। योजना के मुताबिक, आगे चित्रकला और नृत्य कक्षाओं का विस्तार भी हो सकेगा’। (नीचे चित्र में मराठी नाटक के एक दृश्य में ग्वालियर रंगमंच के पुराने ख्यात कलाकार भालचंद्र पेंढारकर के साथ श्रीनिवास कोचकर।)
गौरवशाली है आर्टिस्ट कंबाइन का इतिहास: संजय लघाटे ने कहा, ‘आर्टिस्ट कंबाइन नाट्य संस्था का 85 साल पुराना इतिहास रहा है। इस संस्था की स्थापना 30 अक्टूबर 1937 को हुई थी। इसकी स्थापना स्व. वाय सदाशिव भागवत ने अपने कुछ सहयोगियों के साथ मिलकर की थी। प्रारंभ में संस्था ने मराठी नाटकों से अपने शौकिया रंगमंच की शुरूआत की। परंतु 1952 के आते-आते संस्था में हिन्दी नाटक होने लगे। इसके साथ ही संस्था का नया संविधान भी बनाया गया। इसमें हिन्दी के साथ ही अन्य कलाओं को भी जगह दी गई’। (आर्टिस्ट कंबाइन, ग्वालियर के दाल बाज़ार स्थित नाट्यगृह में दर्शकों की एक पुरानी तस्वीर। आर्टिस्ट कंबाइन की प्रस्तुतियों में यहाँ के दर्शकों में प्रारंभ से ज़बरदस्त रूचि रही है।)
एनजीओ की तरह संस्था का प्रबंधन: संस्था के प्रबंधन के बारे में डॉ. लघाटे ने कहा, ‘हमारी संस्था एक एनजीओ की तरह काम करती है। हमारी सोसाइटी की एक 12 सदस्यों वाली कमेटी है। इस कमेटी के गठन के लिये हर तीन साल में चुनाव होते हैं। सभी सदस्य निर्वाचित होते हैं। एक बार कमेटी बन जाने पर अगले तीन सालों तक संस्था को चलाने का उनपर दायित्व होता है। हर साल का वर्किंग एजेंडा इन्हीं सदस्यों के निर्वहन पर निर्भर करता है। सभी का अपने-अपने स्तर पर बराबरी का उत्तरदायित्व होता है। संस्था में शुरू से ही इस तरह की परंपरा रही है। शौकिया रंगमंच के सफ़र को आगे बढ़ाने के काम में ऐसा ही होता आया है। इस सफर में महिलाओं का भी समान रूप से योगदान रहा है। संस्था ने दाल बाज़ार स्थित अपने नाट्य गृह की स्थापना इसी तरह सभी के सहयोग और बचत से की है। 12 अप्रैल 1956 को वर्तमान नाट्य मंदिर का भूमि पूजन और फिर 30 अक्टूबर 1956 को खुला नाट्यगृह बनकर तैयार हुआ था। (बीते दिनों की यादें: हिंदी नाटक की एक प्रस्तुति में अभिनेत्री सुमन भागवत और दो साथी महिला कलाकार।)
अब तक 850 से अधिक नाटकों का मंचन: आर्टिस्ट कंबाइन सचिव ने बताया – ’85 साल की इस दीर्घावधि में आर्टिस्ट कंबाइन ने कई नाटकों का मंचन किया है। संस्था ने मराठी के साढ़े पाँच सौ से अधिक और हिन्दी के तीन के करीब नाटकों का एकाधिक बार मंचन किया है। इनमें बहुत से प्रसिद्ध नाटक रहे हैं। आज भी दर्शकों को सालों पहले मंचित राणीचा बाग, मुद्दई लाख चाहे, आनंदी गोपाल, हानुश, हमीदाबाई ची कोठी, घासीराम कोतवाल के अलावा मालविकाअग्निमित्रम्, कन्यादान, आखेर चा सवाल, संध्या छाया जैसे नाटक याद हैं। (चित्र में बीते वर्ष 14 अगस्त 2022 को मुंबई के कलाकारों द्वारा मंचित नाटक ‘साम्राज्यम्’ का एक दृश्य)
नाट्य हस्तियों का संस्था में होता रहा आगमन: संस्था में राष्ट्रीय स्तर के निर्देशकों ने भी नाटकों का निर्देशन किया है। कई बड़ी नाट्य हस्तियों का आना-जाना रहा है। उनके नाटकों का यहाँ पर मंचन हुआ है। इनमें सईं परांजपे, डॉ.श्रीराम लागू, पु.ल.देशपांडे, हबीब तनवीर, जयदेव हट्टगंड़ी जैसी रंग विभूतियाँ शामिल रही हैं। इतना ही नहीं संस्था ने दर्जनों कार्यशालाओं का संचालन किया है। ऐसी कार्यशालाओं के ज़रिये बहुत से रंगकर्मियों को प्रशिक्षण भी मिला है। संस्था के लिये यह उपलब्धि की बात है कि इसके 350 से अधिक कलाकार सदस्य रहे हैं। (नीचे दिये गये चित्र में संस्था के नये कलाकारों द्वारा हाल ही में मंचित नाटक ‘एक था गधा उर्फ अलाहदाद खाँ’ का एक दृश्य। निर्देशक:सुधीर वैश्मपायन।)
परफॉरमिंग आर्ट इंस्टीट्यूट की स्थापना: डॉ. लघाटे ने बताया, ‘2017 में आर्टिस्ट कंबाइन इंस्टीट्यूट ऑफ परफॉरमिंग आर्ट्स की स्थापना की गई। असल में काफी समय से ग्वालियर में युवा कलाकारों के लिये सुव्यवस्थित रंगकर्म प्रशिक्षण की कमी महसूस की जा रही थी। इसी उद्देश्य इंस्टीट्यूट की स्थापना की गई। अब इस इंस्टीट्यूट के माधमय से हर वर्ष 10 से 15 विद्यार्थी प्रशिक्षण ले रहे हैं। इंस्टीट्यूट राजा मानसिंह तोमर एवं संगीत कला विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है। राजा मानसिंह तोमर द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार ही यहाँ विद्यार्थियों को पढ़ाया जाता है। अध्ययन के साथ विभिन्न स्तरों पर व्यवाहारिक प्रशिक्षण का सिलसिला भी जारी है। ताकि कलाकार रंगकर्म की बारीकियों को ज़्यादा गहराई से सीख सकें।(नीचे दिये गये चित्र में रोहित जैन द्वारा निर्देशित ‘रंग संगीत’ की प्रस्तुति। आर्टिस्ट कंबाइन इंस्टीट्यूट के नवोदित कलाकारों ने इसे फरवरी 2022 के वार्षिक में आयोजन में प्रस्तुत किया था।)
इंस्टीट्यूट का हर वर्ष फरवरी में वार्षिक प्रस्तुति उत्सव : हर साल इंस्टीट्यूट का एक वार्षिक उत्सव भी फरवरी के महीने में होता है। इसमें स्टूडेंट्स अपनी तैयार प्रस्तुतियाँ भी देते हैं। उनसे संवाद के लिये स्थानीय रंगकर्मियों के साथ ही मुंबई,औरंगाबाद,पुणे से भी प्रतिष्ठित,लेखक,निर्देशक कार्यशाला में आमंत्रित किये जाते हैं। (डॉ.संजय लघाटे निर्देशित हिन्दी नाटक ‘उसके बाद’ के एक दृश्य में बाएं से आनंद दानेकर, रेणु झंवर, कार्तिक बक्षी और केशवराव मजूमदार।)
मराठी रंगमंच समय से आगे क्यों?: इस सवाल के जवाब में डॉ.संजय लघाटे ने कहा, ‘असल में महाराष्ट्र में नाटक की एक सुदृढ़ परंपरा है। वहाँ पर अच्छे लेखक हैं, वे जानते हैं कि रंगमंच को क्या देना है। मराठी नाटकों के मंचन में कई तरह के प्रयोग होते हैं। महाराष्ट्र सरकार रंगमंच को समृद्ध बनाये रखने के लिये पूरा आर्थिक सहयोग भी देती है। वहाँ की एक खूबी स्कूल और कॉलेज स्तर पर होने वाली नाट्य प्रतिस्पर्धाएं हैं। जबकि हिन्दी में सुगठित और व्यवस्थित प्रयास अभी भी काफी कम है। इसके अलावा मराठी समूह अपनी तरह से अपने काम में निरंतर जुटे रहते हैं। यह भी एक विशेषता है।(आर्टिस्ट कंबाइन का दाल बाज़ार स्थित नाट्य मंदिर का बाहरी दृश्य।)
आर्थिक सहायता का सदुपयोग होना भी ज़रूरी: डॉ. लघाटे ने कहा, ‘सरकार रेपटरी या संस्थाओं को प्रॉडक्शन के नाम पर आर्थिक सहायता देती है। परंतु यह ध्यान रखने की भी ज़रूरत है कि कला और संस्कृति के नाम पर जा रहे अनुदान का सदुपयोग हो रहा है या नहीं? असल में सरकार को बेहतर लोगों और संस्थाओं को केंद्र में लाकर, नाट्य परंपरा के काम को आगे बढ़ाना चाहिये। यह काम स्कूल स्तर पर ही प्रारंभ हो जाना चाहिये’। इस विषय में हमने यह भी पूछा कि… ‘आर्टिस्ट कंबाइन 85 साल पुरानी संस्था है, क्या इस वजह से संस्था को सरकार से किसी तरह की प्राथमिकता या अतिरिक्त सहायता मिलती है? इस सवाल पर संजय जी ने कहा, ‘हमें भी जो भी सहायता मिलती है, सभी के समान नियमानुसार मिलती है। अलग से कोई अनुदान नहीं मिलता है’। नोट: इस रिपोर्ट के प्रांरभ में दिया गया चित्र आर्टिस्ट कंबाइन के संस्थापक स्व. वाय सदाशिव भागवत का है। वे एक मराठी नाटक में अभिनय करते नज़र आ रहे हैं।) आगे पढ़िये –
स्व.वाय सदाशिव भागवत की स्मृति में नाटकों का अमृत महोत्सव
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बहुत सुंदर लेख आभार एवं धन्यवाद