शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। डर, ख़ौफ़, नफ़रत और अविश्वास… उस पर सोची-समझी साज़िश…! भीष्म साहनी के कालजयी उपन्यास पर आधारित और चित्तरंजन त्रिपाठी द्वारा निर्देशित नाटक ‘विभाजन की विभीषिका : तमस’ देखते वक्त दर्शक सिर्फ 1947 के दुःखद दौर से ही नहीं गुज़रते, बल्कि उस त्रासदी की जड़ों को समझने की कोशिश भी करते हैं। सोचते हैं कि क्या इस ज़ख्म से हम अब भी उबर सके हैं?
यह नाटक और भी कई गंभीर सवाल उठाता है—
यह पूछता है कि क्या अविश्वास का अँधेरा मिट गया है?
क्या इंसान से इंसान को बाँटने की साज़िशें ख़त्म हो गई हैं?
क्या सच में हमने इंसानियत के क़ातिलों से कोई सबक सीखा है?
एनएसडी रंगमंडल की भावपूर्ण और यादगार प्रस्तुति:
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी), दिल्ली के समर थिएटर फेस्टिवल में ‘तमस’ को एनएसडी, रेपर्टरी के कलाकारों ने प्रस्तुत किया। 50 से अधिक कलाकारों ने इस नाटक में भावपूर्ण अभिनय किया। भावावेश से भरी भूमिकाएं की। नाटक में सांप्रदायिक वैमनस्य (communal disharmony) और विघटन (Disintegration) के बीच पात्रों का ख़ौफ़ सीधे दर्शकों के ज़हनो-दिल में उतरने लगता है।
सियासी साज़िश और आज के सवाल:
भीष्म साहनी की कही बात कि—”दंगे अचानक नहीं होते, उन्हें बनाया जाता है”—नाटक के मूल में है। सूअर फेंकने की घटना, अफ़वाहें और फिरंगी प्रशासन की निष्क्रियता (Inactivity) साफ़ करती है कि हिंसा के पीछे राजनीतिक हित और संगठित ताक़तें काम करती हैं। इसके साथ ही समाज में मौजूद आर्थिक असमानता और असुरक्षा (Economic Inequality and Insecurity) भी इस आग को हवा देती है। हमारे देश के सामने आज भी यही संकट है। सवाल है कि क्या इस बात को समझने और इससे उबरने की हमने कभी कोई गंभीर कोशिश की है? अगर नहीं, तो मान लीजिए कि हम फिर ‘तमस’ जैसे हालात को जन्म दे रहे हैं। सोचिये, क्या आज ऐसा नहीं है? अगर ऐसा है तो आज हर इंसान को नफ़रत और बंटवारे की भाषा बोलने वालों के खिलाफ़ खड़े होने की ज़रुरत है।
एक शहर, जो धीरे-धीरे अँधेरे में उतरता है:
कहानी की शुरुआत रावलपिंडी के एक गरीब चर्मकार (Leather worker) नाथू से होती है, जो चंद पैसों के लालच में एक सूअर मारता है और अनजाने में एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा बन जाता है अगले दिन वही मरा हुआ सूअर मस्जिद के बाहर पाया जाता है और देखते ही देखते शहर सांप्रदायिक हिंसा (communal violence) की आग में जल उठता है। हिन्दू, मुस्लिम और सिख समुदायों के भीतर असुरक्षा बढ़ती जाती है और पड़ोसी भी एक-दूसरे पर शक करने लगते हैं।
विस्थापन (Displacement) और गुरुद्वारे का मार्मिक प्रसंग:
इसी बीच बख्शी जी जैसे स्थानीय कांग्रेसी नेता बिगड़ते हालात के बीच विवेक और सौहार्द बनाए रखने की कोशिश करते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर राजनीति, भावनाओं के सामने कमजोर पड़ती दिखाई देती है। हर्नाम सिंह और बंतो के माध्यम से नाटक विभाजन (Partition) के भय और विस्थापन की त्रासदी को सामने लाता है। वहीं, गुरुद्वारे का प्रसंग दर्शकों को हिलाकर रख देता है, जहाँ पुरुष हथियार उठाकर लड़ने निकलते हैं और महिलाएँ अपमान और हिंसा के डर से एक के बाद एक कुएँ में कूदकर अपनी जानें दे देती हैं।
नफ़रत के बीच उम्मीद और इंसानियत:
इन भीषण त्रासदियों के बीच ‘तमस’ मनुष्यता की ‘लौ’ भी जलाये रखता है। ‘राजो’ जैसी मुस्लिम महिला अपनी जान जोखिम में डालकर एक सिख दंपत्ति को शरण देती है और फिर उसे उसके लूटे हुए गहने लौटा देती है। इसी तरह कांग्रेसी कार्यकर्ता ‘जरनैल सिंह’ का दंगों की आग के बीच भी एकता की कोशिश करते रहता है। हिन्दुस्तान की आज़ादी की बात करता रहता है। इस तरह इन किरदारों से यह साबित होता है कि विभाजन की हिंसा के बीच भी इंसानियत पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई थी, अक्सर होता भी यही है।
साज़िश के पीछे के वो चेहरे जिनसे हटता है परदा:
नाटक के अंत में सुअर काटकर फेंकने से लेकर शहर को आग में झोंकने के पीछे मौजूद वो छिपा चेहरा सामने आता है जो रावलपिंडी की कहानी के पीछे का षडयंत्रकारी है। नाम है मुराद अली। असल में मुराद सांप्रदायिक राजनीति का एक “ऑपरेटिव” है। वो नाथू को कहता है कि उसे एक वेटनरी डॉक्टर के काम के लिये लिये सुअर को मारना है। इस तरह नाथू दंगों की साज़िश रचने के उसके जाल में फँस जाता है। उधर शहर में जो कुछ हो रहा है। उस पर प्रशासन आँख मूंद लेता है। नफ़रत की आग को रोकने के लिये अंग्रेज़ अफ़सर रिचर्ड जान बूझकर कोई कदम नहीं उठाता। न वह बल प्रयोग करता है न ही कर्फ्यू का ऐलान करता है। वो कहता है कि यह सब उसके अधिकार में नहीं है। इस तरह यह नाटक हर उन चेहरों का सच भी सामने लाता है, जिनकी वजह से लोग लड़ते और मरते हैं, विभीषिका का शिकार बन जाते हैं।
बड़े दृश्यों और समूहन का नाटक:
निर्देशक चित्तरंजन त्रिपाठी ने इस नाटक को एक बड़े दृश्यात्मक कैनवास, रंगमंच की सामूहिक और सिनेमाई विस्तार के साथ प्रस्तुत किया है। यथार्थवादी पुनर्निर्माण की बजाय प्रतीकात्मक शैली का उपयोग किया है। 50 से अधिक कलाकारों की मौजूदगी मंच को एक जीवित, खौफज़दा शहर में तब्दील कर देती है। चित्तरंजन त्रिपाठी ख़ुद संगीत की गहरी समझ रखते हैं, इसलिए ध्वनियाँ और संगीत केवल पृष्ठभूमि नहीं, नाटकीय तनाव का उपकरण बनती हैं। परछाइयों, धुंधलेपन और प्रकाश के विरोधाभासों का प्रयोग ‘तमस’ के मूल विषय—अंधकार—को मनो वैज्ञानिक स्तर पर दृश्य रूप देता है।
उपन्यास के 90 प्रतिशत पाठ का उपयोग संवाद में:
भीष्म साहनी के उपन्यास का नाटकीय रूपांतरण चित्तरंजन त्रिपाठी और आसिफ़ अली ने मिलकर किया है। नाटक उपन्यास के 90 प्रतिशत पाठ का उपयोग संवाद के रूप में करता है। नाटक के कल्पनाकार एनएसडी रंगमंडल के प्रभारी राजेश सिंह हैं। प्रकाश योजना सौती चक्रवर्ती की है। कॉस्ट्यूम डिजाइन कृति वी. शर्मा ने किया है। कोरियोग्राफी संतोष नायर की है, जबकि साउंड डिज़ाइन संतोष कुमार सिंह ने किया है। सुंदर लाल छाबड़ा और राजेश रेड्डी नाटक के सहयोगी निर्देशक हैं। नाटक में संत कबीर दास के दोहे, पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी, स्वानंद किरकिरे और फैज़ अहमद फैज़ के गीतों को शामिल किया गया है।
इतिहास के आईने में समाज के लिए सजग चेतावनी:
एनएसडी रंगमंडल की यह एक और प्रभावशाली प्रस्तुति है। इसमें राजेश सिंह के प्रभार और चित्तरंजन त्रिपाठी के नेतृत्व में कलाकारों, संगीत मंडली और तकनीकी टीम का अद्भुत सामंजस्य देखने को मिलता है। हालांकि यह कहना होगा कि अक्सर ऐसे संवेदनशील प्रसंगों के मंचन पर विवाद होते हैं। इस नाटक को लेकर भी कुछ आलोचनाएँ पहले सामने आ चुकी हैं। कुछ समीक्षकों का मानना रहा कि मूल उपन्यास की मानवीय संतुलित दृष्टि के कुछ आयाम मंचन में बदले गये। हालांकि नाटक की ताज़ा प्रस्तुति में ऐसा नहीं लगा। ऐसे कोई दृश्य भी नज़र नहीं आये जिन्हें नाटक में जोड़े जाने का आरोप था। हां, यह सवाल हमेशा रहेगा, कि आप किस मंशा से कला को दिखाते हैं और इसमें क्या खोजते हैं। इस दृष्टि से भीष्म साहनी जैसे कम्युनिस्ट साहित्यकार की इस कृति को एनएसडी रेपर्टरी द्वारा इसके मूल स्वरूप को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत करना, अपने आप में एक बड़ी बात है।
रेपेर्टरी के वो कलाकार जिन्होंने तमस में निभाई भूमिकाएं:
नाटक ‘तमस’ में अजय कुमार ने मुराद अली की भूमिका निभाई है, जबकि आलोक ने नत्थू और शिल्पा भारती ने नत्थू की पत्नी का किरदार अदा किया है। इनके साथ ही शिव प्रसाद ने शंकर, अन्नत ने जरनैल और प्रतीक ने सूत्रधार और मज़िबूर रहमान ने मेहता और रमज़ान के रूप में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन विशिष्ट किरदारों के अलावा सुमन वैद्य, सुमन कुमार, अंकुर, सत्येंद्र, अनामिका, नवीन, पूनम, हीरालाल, प्रसून, आशुतोष, अमन और अनीता जैसे अन्य कई बेहतरीन कलाकारों ने भी इस नाटक में अपना शानदार अभिनय और योगदान दिया है।
‘तमस’ समाज के लिए एक सजग चेतावनी:
एक दर्शक के रूप में यह प्रस्तुति आपको अपने समय के बारे में सोचने के लिए मजबूर करती है। यह एहसास कराती है कि अविश्वास, अफ़वाह और नफ़रत का ज़हर केवल इतिहास का हिस्सा नहीं—यह हर दौर में यह पैदा किया जा सकता है, बर्शते हम सजग न रहे। ‘तमस’ इतिहास का एक पन्ना भर नहीं, बल्कि समाज के लिए एक सजग चेतावनी है, यह हर देशवासी के लिये सोचने का विषय है- क्योंकि धर्म, मज़हब, जाति, तबके या समुदाय से पहले हम एक देश हैं, ज़िम्मेदार नागरिक हैं और सबसे बढ़कर एक इंसान। नफ़रत, संकीर्णता, अलगाव की नीति आत्मघाती बारूद है।
विभाजन की विभीषिका के प्रत्यक्षदर्शी थे भीष्म साहनी
अविभाजित पंजाब के रावलपिंडी में जन्मे भीष्म साहनी (1915–2003) ने विभाजन की विभीषिका को अपनी आँखों से देखा था। वर्षों बाद भिवंडी दंगों ने उनके भीतर रावलपिंडी की स्मृतियों को फिर से जीवित कर दिया था, जिसकी वजह से ‘तमस’ जैसी कृति का सृजन हुआ। इप्टा और प्रगतिशील लेखक आंदोलन से जुड़े रहे साहनी जी को, साहित्य में उनके विशिष्ट योगदान के लिए ‘पद्म भूषण’ और ‘साहित्य अकादमी फेलोशिप’ से सम्मानित किया गया था। (इस समीक्षा के लेखक शकील अख़्तर, ‘इंदौर स्टू़डियो’ के संस्थापक संपादक हैं। थियेटर जर्नलिज़्म में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।) आगे पढ़िये – संझा, समाज और सवाल…वो न तो लड़का है और न लड़की https://indorestudio.com/sanjha-vivah-shikhandi-ka-theatre-review-rajesh-tiwari/


सच लिखा तमाशा इतिहास का एक पन्ना भर नहीं है यह सजग चेतावनी भी है। भीष्म साहनी जी की इस कालजई रचना पर दूरदर्शन प्रसारित एक धारावाहिक देखा था। यह नाटक भी देखना होगा।