Wednesday, May 13, 2026
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तानसेन सम्मान ‘गुरू ज्ञान’ का मान है – पंडित नित्यानंद हल्दीपुर  

विनय उपाध्याय, इंदौर स्टूडियो डॉट कॉम। ‘गुरू जीवन में न होते, तो मुझ अनगढ़ को भला कौन सँवारता! यह सम्मान मेरे गुरूओं का गौरव है, उनके ज्ञान का मान है’। यह बात प्रसिद्ध बाँसुरी वादक पंडित नित्यानंद हल्दीपुर ने कही। ग्वालियर में राष्ट्रीय तानसेन सम्मान से विभूषित किये जाने के बाद वे अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे। पंडित नित्यानंद जी को संगीत नाटक अकादमी सम्मान, बारह बरस पहले ही मिल चुका है। परंतु उन्होंने तानसेन सम्मान दिये जाने पर ख़ुशी जताते हुये कहा -‘मेरे लिए यह पद्म से भी बड़ा सम्मान है क्योंकि तानसेन सम्मान के लिए कलाकार का चयन स्वयं विशेषज्ञ कलाकारों की ज्यूरी करती है, यह इस सम्मान की बड़ी बात है’।बहते दरिया की लहर पंडित नित्यानंद : पंडित नित्यानंद हल्दीपुर का मुंबई में जन्म हुआ। उनकी परवरिश रामपुर मैहर संगीत घराने में हुई। जहाँ स्वरों की शुद्धता और आध्यात्मिक सौन्दर्य भाव – रस में गहरे डूबने की साधना की राह दिखाते हैं। बाबा उस्ताद अलाउद्दीन खाँ से चलकर उनकी बेटी अन्नपूर्णा देवी और सैकड़ों शिष्यों तक बहता स्वर- संस्कार आज भी संगीत के मर्म को थामता हुआ समंदर पार तक छलक रहा है। नित्यानंद इसी बहते हुए दरिया की लहर हैं जो अनंत से टकराने और उसी में विलीन हो जाने की आकांक्षा से भरी हैं। पंडित नित्यानंद हल्दीपुर के मन पर माँ अन्नपूर्णा देवी की गहरी छाप है। पंडित रविशंकर से बिछोह के बाद गुरू माँ की सेवा अंतिम साँस तक नित्यानंद ने ही की। इस दौरान संगीत ही नहीं, जीवन के कीमती सबक भी उनसे हासिल किये।
सीखने की ललक ने पहुँचाया गुरू माँ के पास: नित्यानंद जी गुरू माँ अन्नपूर्णा देवी जी से अपनी पहली मुलाक़ात को याद करते हुये बताने लगे – ‘माँ से जब मैं मिला, तब आकाशवाणी का टॉपग्रेड आर्टिस्ट था, मंचीय प्रस्तुतियाँ भी देता था। उस समय मैं अपने गुरु देवेन्द्र मुर्डेश्वर जी से सीख रहा था। गुरु को लेकर द्वन्द में था, कि जिनसे अब तक सीखा उनके अलावा, किसी दूसरी तरफ़ रुख़ कैसे करूँ! गुरु के प्रति श्रद्धा और आत्मीयता मुझे बार-बार रोक रही थी और दूसरी तरफ़ सीखने की ललक भी थी। किसी तरह खुद को समझाने के बाद मैं गुरु माँ के पास जा पहुँचा। उनसे अपनी बात कहने। निवेदन करने।
बड़ी मुश्किल से गुरू माँ ने मेरी बात मानी पंडित जी आगे बताने लगे, ‘मुझे याद है कि मेरे भीतर बहुत घबराहट थी, बहुत नर्वस था मैं। मैंने अपना परिचय दिया, और कहा- मैं आपसे सीखना चाहता हूँ। तो गुरु माँ ने कहा – ‘तुम तो ख़ुद एक स्थापित कलाकार हो, आकाशवाणी से जुड़े हो, मैं तुम्हें क्या सिखा सकूँगी? बहुत बड़े-बड़े कलाकार हैं। बहुत जानकार, गुणी लोग हैं। उनसे सीखो। मैं लगातार कहता रहा, नहीं। मुझे आपसे ही सीखना है। बहुत मुश्किल से वो मानीं। कहा – अच्छा, कुछ सुनाओ! मैंने राग- ‘यमन’ बजाया। माँ ने कहा- अच्छा है। अब इसे ऐसे बजाओ और उन्होंने यमन बजाना शुरू किया। मैं सच कहूँ, उस क्षण मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अपने जीवन में ‘यमन’ पहली बार सुन रहा हूँ।
(माँ अन्नपूर्णा देवी की सितार वादन करते हुये युवा दिनों की एक यादगार तस्वीर)
राग और स्वर की शुद्धता पर ज़ोर: नित्यानंद कहते हैं कि वो राग और स्वर की शुद्धता पर बहुत जोर देती थीं। वो कहतीं – ‘जो बजाना है उसे पहले गाना चाहिये। वोकल पर ज़ोर दो’। सटीक स्वर लगते ही कह उठती- ‘बहुत अच्छा इसको कान में बिठाओ।’ वे बताते हैं कि सुबह 4 बजे उठकर गुरू माँ रियाज़ करतीं। उस समय सारी आवाज़ें सो रही होती हैं। हमारा मन शांत और एकाग्र होता है। उस समय मन स्वर से ठीक तरह से जुड़ता है। पढ़ाई भी हम इसीलिए ब्रह्म मुहूर्त में करते थे जब छोटे थे। गुरू माँ सुबह के रियाज़ को ही अच्छा मानती थीं।रियाज़ का कोई शॉर्टकट ही नहीं: नित्यानंद आज की नई पीढ़ी की प्रसिद्धि लालसा पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि रियाज़ का तो कोई शॉर्टकट हो नहीं सकता। जो लोग प्रसिद्धि के लिए संगीत सीखते हैं वो लोग अलग हैं। मुझे फिर माँ का कहा याद आता है कि आप बचपन से संगीत सीखना शुरू करें, तो भी एक जीवन में आप तीन या चार से अधिक राग नहीं सीख सकते। संगीत साधना है और साधना, समय से जुड़ी है। जीवन औसतन 70 से 80 साल की अवधि ही आपको देता है। इस सचाई को हमें समझना चाहिए।
(साक्षात्कारकर्ता विनय उपाध्याय वरिष्ठ पत्रकार, कला समीक्षक और उदघोषक हैं। कला, साहित्य और सांस्कृतिक आयोजनों पर  निरंतर अपने लेखन और रिपोर्ट्स के लिये पहचाने जाते हैं।)

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