Saturday, October 17, 2026
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प्रांजल श्रोत्रिय.. टेरेस थियेटर के ज़रिये रंगमंच को नई ज़िदंगी देता कलाकार

शकील अख़्तर,इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। इंदौर में वरिष्ठ रंगकर्मी और निर्देशक प्राजंल क्षोत्रिय बीते सात वर्षों से अपने टेरेस थियेटर पर नाट्य गतिविधियां चला रहे हैं। उनका टेरेस थिएटर मध्यप्रदेश के इंदौर के सुख-शांति नगर में है। यहां निरंतर वे नाटकों के मंचन करते हैं। इंदौर के वे एक ऐसे जुनूनी कलाकार हैं जो तीन दशकों से रंगमंच के लिये ही समर्पित जीवन जी रहे हैं। लगातार नये कलाकार तैयार कर रहे हैं, निरंतर नाटकों का मंचन कर रहे हैं। प्रांजल पुराने कलाकार दोस्त भी हैं। हाल ही में  इंदौर में उनसे बातचीत का मौका मिला।

घर की छत पर बनाया थिएटर : 2013 में प्रांजल ने घर की छत पर टीन का शेड डालकर अपने टेरेस थिटेयर की शुरूआत की थी। पहले वे अकेले ही इस शौक को लेकर आगे बढ़ रहे थे, मगर धीरे-धीरे उनके इस जुनून में परिवार और मित्रों का साथ मिला। अब पत्नी के साथ बेटा प्रगल्भ का भी उन्हें सहयोग मिल रहा है। यहां पर अब रंगमंच की नियमित क्लासेस चल रही है। प्रगल्भ खुद ऐसी कक्षाओं का संचालन कर रहे हैं। प्रांजल बताते हैं, ‘मेरे रंगमंच के काम में मेरे साहित्यकार पिता और मालवी कवि अनंत श्रोत्रिय का भी हमेशा सहयोग मिला। सबसे बढ़कर उन्होंने मुझे हमेशा छूट दी और कभी रंगमंच के काम से रोका नहीं।‘ ( नीचे चित्र: आर्ट डायरेक्टर जयंत देशमुख टेरेस थिएटर देखते हुए )1982 से शुरू हुआ रंगमंच का सफ़र : प्राजंल ने अपने रंगमंच के सफ़र की 1982 में शुरूआत की थी। उस वक्त ही मेरी उनसे मुलाकात हुई थी। तब हमने एक साथ इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज के ब्रॉन्सन हॉल में आयोजित रंग शिविर में हिस्सा लिया था। उस दौर में हमें वरिष्ठ रंग र्निदेशक और अभिनेता राजेंद्र गुप्त और स्व. संजीव दीक्षित के साथ रंगमंच के बारे में जानने समझने का मौका मिला था। दोनों ने इंदौर के कई जाने-पहचाने रंगमंच अभिनेताओं के साथ नाटक- ‘सड़क गूंगी है’ ( विनोद डेविड) और भोला शंकर बम ( वुड भी जेंटलमैन,मौलियर) और बाद में ‘बांझ रात’ (विनोद डेविड) जैसे लंबी कविता वाले नाटक में काम किया था। दोनों ने साथ-साथ आखिरी सवाल जैसे कुछ और नाटकों में काम किया। वक्त बदला और मेरे पिता स्व. अब्दुल हफीज़ का इंदौर हाईकोर्ट से ग्वालियर की खंडपीठ में ट्रांसफर हो गया। इस वजह से हमारा साथ छूट गया। 1985 में ग्वालियर आकर मैं वहां के रंगमंच से जुड़ गया।

1987 से पत्रकारिता में पूरी तौर पर आ जाने के बाद से मेरा नाटकों में अभिनय से नाता टूट गया लेकिन प्राजंल ने नाटक को ही जीवन बना लिया। वे तमाम विपरीत धाराओं के बीच नाटकों को ही जीने लगे। इंदौर के बाद भोपाल में भी उन्होंने कई नाटकों में भूमिकाएं की। नुक्कड़ नाटकों के सैकड़ों प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। कई रचनात्मक कार्यक्रमों को आवाज़ दी। मंच पर खामोशी से अपना काम करते रहे। ( नीचे चित्र: टेरेस थिएटर में नाटकों का मंचन जारी रहता है )टेरेस थियेटर बनाना आसान नहीं था : प्राजंल बताते हैं- ‘छत पर टेरेस थियेटर बनाना आसान नहीं था। मगर टीन शेड से छत और चार दीवारी बनाने के बाद हर छोटे-बड़े काम को करता रहा। मिसाल के लिये लाइट्स के लिये स्कूटर की लाइट, पंखे के रेगुलेटर के डीमर जैसे जुगाड़ से काम चलाना पड़ा। एलईडी की व्यवस्था की। परदे लटकाने और मंच लगाने, दरिया लाने और कुर्सियां खरीदने का काम करता रहा। धीरे-धीरे मैं करीब 100 लोगों के थिएटर को बनाने में कामयाब हो गया। इस सबके साथ नाटकों को तैयार करने और उनके मंचन का भी काम चलता रहा। अब भी बहुत से काम बाकी है। जैसे आसपास के शोर को कम करने का काम करना है। नये परदे फिर से बदलने का काम जारी है। इसके साथ ही पहली मंज़िल में एक स्टुडियो का भी निमार्ण चल रहा है। ( नीचे चित्र: प्रांजल नये कलाकारों को प्रशिक्षण देते रहते हैं ) 100 कलाकारों के साथ 18 नाटकों का मंचन : प्रांजल ने बताया, ‘अनंत टेरेस थियेटर के लिये हमने बीते 2013 से अब तक करीब 18 नाटकों के मंचन किये हैं। इनमें कंजूस,बिच्छू,काफी हाऊस के इंतज़ार में, आज़ाद घर, हवालात जैसे नाटकों के साथ कई कहानियों, किस्सों और कविताओं के मंचन शामिल हैं। वे कहते हैं, नाटकों को तैयार करने के लिये भी हमें करीब-करीब हर बार नई टीम के साथ काम करना पड़ा। बहुत से नये कलाकारों को मंच के हिसाब से शिक्षित और संस्कारित करना पड़ा। कलाकार आते और जाते रहे। अब तक हम ऐसे सौ से ज़्यादा नये कलाकारों को लेकर काम कर चुके हैं। यह अब भी चल रहा है। सिर्फ थियेटर ही नहीं प्रांजल कई और कला और साहित्यिक गतिविधियों के लिये टेरेस थियेटर उपलब्ध कराते हैं। आप यह जानकर हैरान रह जायेंगे, प्रांजल यह सब जीविका चलाने के लिये नहीं बल्कि अपने जुनून और शौक के लिये कर रहे हैं। मगर इस तरह से वे इंदौर के रंगजगत के लिये अपने स्तर पर बहुत बड़ा योगदान दे रहे हैं।

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