Tuesday, June 16, 2026
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कला सिर्फ मनोरंजन नहीं, मनुष्य को इंसान बनाने का दर्शन

मंजुल भारद्वाज, इंदौर स्टूडियो। कला केवल मनोरंजन या बौद्धिक विलास का साधन नहीं है, बल्कि यह सत्य से रूबरू कराने और मनुष्य को एक बेहतर इंसान बनाने की चैतन्य प्रक्रिया है। इसी वैचारिकी के साथ 12 अगस्त 1992 को ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस‘ नाट्य दर्शन का सूत्रपात हुआ था। पिछले 34 वर्षों से यह रंग आंदोलन बिना किसी सरकारी अनुदान या कॉर्पोरेट आश्रय के, केवल जन-सहभागिता के बल पर समाज में एक नई रंग-चेतना जगा रहा है। आज इसका अभ्यास न केवल भारत, बल्कि एशिया, अमेरिका और यूरोप के कई देशों में जीवन को बेहतर बनाने के माध्यम के रूप में किया जा रहा है।Manjul Sinha, Founder of The Experimental Theatre Foundation.नब्बे के दशक में जब औद्योगीकरण और भूमंडलीकरण ने दुनिया को एक शोषित ‘गांव’ में बदल दिया था, तब आम जनता को अपनी अभिव्यक्ति के लिए एक नए रंग-चिंतन की आवश्यकता थी। रंगमंच सिर्फ तमाशा या नुमाइश नहीं है, यह जीवन का आईना और सच्चा आलोचक है। जैसे भोजन शरीर को मजबूत बनाता है, वैसे ही रंगकर्म मन और मस्तिष्क को वैचारिक खुराक देता है। रंगकर्म का मूल उद्देश्य मनुष्य के भीतर के विकारों को खत्म कर उसमें विचार और विवेक जगाना है।A presentation based on Manjul Sinha's "Theatre of Relevance," by the founder of The Experimental Theatre Foundation. indorestudio.comदुर्भाग्य से आज रंगमंच सत्ता के वर्चस्व का माध्यम बनकर रह गया है। दुनिया भर की सत्ताओं ने कलाकारों को राज्याश्रय, अनुदान और फेलोशिप देकर उन्हें अपना चारण बना लिया है। सत्ता ने यह भ्रम फैलाया है कि कलाकार बिना सरकारी अनुदान के जीवित नहीं रह सकता। ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ ने इसी अवसरवादी चक्रव्यूह को तोड़ा है। हमने पाश्चात्य और निर्देशक-केंद्रित मॉडल को नकार कर ‘दर्शक और लेखक-केंद्रित’ रंगकर्म को स्थापित किया, जहाँ दर्शक महज उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक सरोकारी साथी है।A presentation based on Manjul Sinha's "Theatre of Relevance," by the founder of The Experimental Theatre Foundation. indorestudio.comइस नाट्य दर्शन ने समाज में ज़मीनी बदलाव किए हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जब मजदूरी की चक्की में पिसते बच्चों ने अपने शोषक मालिक के सामने नाटक किया, तो उस कला ने मालिक की दृष्टि बदल दी और उसने उन बच्चों को मज़दूरी से मुक्त कर उनकी पढ़ाई का जिम्मा उठाया। तकनीकी रूप से संपन्न यूरोप ने भी इस मानवीय रंग सिद्धांत को अपनाया। जर्मनी में हुई कार्यशालाओं में बच्चों और युवाओं ने इस सिद्धांत के ज़रिए अपने भीतर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक बोझ (जैसे नाज़ी जनसंहार की ग्लानि) से मुक्त होकर स्वयं को नए सिरे से गढ़ा।A presentation based on Manjul Sinha's "Theatre of Relevance," by the founder of The Experimental Theatre Foundation. indorestudio.comरंगकर्म मूलतः विद्रोह का सामूहिक कलाकर्म है और सृजन का बीज मंत्र ही ‘प्रतिरोध’ है। बिना प्रतिरोध के सृजन संभव नहीं है। जब तक रंगकर्म भोगवादी रहेगा, उसे संसाधन मिलते रहेंगे, लेकिन जब वह व्यवस्था पर सवाल उठाएगा, संसाधन गायब हो जाएंगे। आज विश्व को ऐसे ही उन्मुक्त रंगकर्मियों की दरकार है, जो अनुदान के षड्यंत्र से बाहर निकलकर ‘कला साधक’ बनें। रंगकर्म ही वह विधा है जो इंसान को आत्महीनता से निकालकर आत्मबल से भर सकती है। Senior Theatre Activist Manjul Sinha, Founder of The Experimental Theatre Foundation.मंजुल भारद्वाज भारतीय रंगमंच के हस्ताक्षर: हरियाणा के झज्जर ज़िले के दहकोरा गाँव से आने वाले मंजुल भारद्वाज ने 1992 में The Experimental Theatre Foundation की स्थापना की और “Theatre of Relevance” (प्रासंगिक रंगमंच) की अवधारणा विकसित की, जिसके माध्यम से उन्होंने स्त्री अस्मिता, बाल श्रम, लैंगिक भेदभाव, मानवाधिकार, किसान संकट और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर भारत और विदेशों में अनेक नाट्य प्रस्तुतियाँ व कार्यशालाएँ संचालित कीं। लेखक, निर्देशक, अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उनका रंगकर्म कला को समाज की ज़रूरतों और मानवीय संवेदनाओं से जोड़ने का एक सतत प्रयास माना जाता है। आगे पढ़िये – संझा, समाज और सवाल..वो न तो लड़का है और न ही लड़की! https://indorestudio.com/sanjha-vivah-shikhandi-ka-theatre-review-rajesh-tiwari/

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