Wednesday, August 19, 2026
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सुख में सुख,दुःख में दुःख देखना भूल है,सुख में दुःख, दुःख में सुख निर्द्वन्द का मूल है

अरविन्द शर्मा (इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम)। सुनील मिश्र द्वारा लिखित और के.जी.त्रिवेदी निर्देशित नाटक-निर्द्वन्द के विषय में लिखते समय मैं सच में पूर्ण निर्द्वन्द अवस्था में हूँ। यह इस नाटक का ही प्रभाव है कि मैं समीक्षक होने के नाते कम से कम इस नाटक की चर्चा के समय नकारात्मक और सकारात्मक पहलुओं के जंजाल से मुक्त हूँ।

सकारात्मकता से साक्षात्कार : अधिकांशत: किसी भी नाटक को लिखते समय लेखक उसके सकारात्मक पहलू को दिखाने के लिए नकारात्मक पहलू को समानान्तर रूप से रचता है। कहा भी गया है कि यदि प्रकाश को जानना है तो अंधेरे को समझना होगा। बुरा देखना है तो अच्छे को महसूस करना होगा। मनुष्य का जीवन ध्वनि की तरंगों के मानिन्द होता है; भरपूर उतार-चढ़ाव के साथ लेकिन ‘निर्द्वन्द’ नाटक को देखना ऐसी सकारात्मकता से साक्षात्कार होना था, जिसे प्रदर्शित करने के लिए कुछ भी नकारात्मक नहीं रचा गया। यह नाट्य रूपान्तरण था भगवान बुद्ध की एक जातक कथा का, जिसे त्रिकर्षि नाट्य संस्था के रंगकर्मियों द्वारा वरिष्ठ रंगकर्मी और निर्देशक के.जी. त्रिवेदी के निर्देशन में प्रस्तुत किया गया।सच्चा संकल्प कभी खाली नहीं जाता : नाटक में बताया गया कि कैसे एक गरीब अपनी सामर्थ्य से बढ़कर एक बौद्ध भिक्षु को घर पर भोजन कराने का संकल्प लेता है और कैसे उसके संकल्प को पूर्ण कराने में देवता भी उसकी सहायता करते हैं। पूरे नाटक का एक ही सार था कि यदि सच्चे और पवित्र मन से यदि कोई संकल्प किया जाए तो उसे पूर्ण करने में प्रकृति भी सहायक हो जाती है। नाटक में ग्रामीण परिवेश होने के कारण संवादों में बुंदेली भाषा का प्रयोग अद्भुत रहा। अद्भुत इस मायने में क्योंकि भगवान बुद्ध के समय पाली भाषा का प्रचलन था, अतः इसके संवादों को क्लिष्ट हिन्दी में रखा जा सकता था, लेकिन निर्देशक ने इसके संवादों को बुंदेली में रखकर इसे जनमानस का नाटक बना दिया। वातावरण के निमार्ण में लाइट्स का बढ़िया उपयोग: गीत-संगीत से सजे हुए इस नाटक में मंच पर प्रकाश के प्रभाव ने एक गहन वातावरण का निर्माण किया। मंच पर लगी हुई एलईडी स्क्रीन पर चल रहे दृष्यों ने नाटक को भव्यता प्रदान की। इन सभी के बीच नाटक के पात्रों ने स्वाभाविक अभिनय से निर्द्वन्द को पूर्णता प्रदान की। अंत में दो पंक्तियों के साथ इतना ही कहना चाहता हूँ – ‘सुख में सुख, दुःख में दुःख देखना ही भूल है। सुख में दुःख, दुःख में सुख ही निर्द्वंद्व का मूल है।‘ आपको बता दें यह नाटक बीते 25 नवम्बर 2018  को संस्कृति विभाग, मध्य प्रदेश शासन व्दारा आयोजित महाबोधि उत्सव में मंचित हुआ है।

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