कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। सख्त राजनैतिक माहौल और अभिव्यक्ति की बंदिशों के बीच जब सीधे सच पर बात करना मुश्किल हो, तब हास्य और व्यंग्य हीनता और डर को तोड़ने का सबसे सशक्त जरिया बन जाते हैं। दिल्ली के एल.टी.जी. ऑडिटोरियम में चल रहे ‘पंचानन पाठक स्मृति सप्ताहांत हास्य नाट्य समारोह’ में यही धार देखने को मिल रही है। आयोजक दिनेश अहलावत के नेतृत्व में आयोजित इस महोत्सव का मुख्य उद्देश्य सिर्फ हंसाना नहीं, बल्कि उस सामाजिक यथार्थ और उपेक्षित दर्द को सामने लाना है जो अक्सर रंगमंच के नेपथ्य में छुप जाता है।
इसी कड़ी में महोत्सव के दौरान आलोक शुक्ला द्वारा लिखित, निर्देशित और अभिनीत नाटक ‘टुइयाँ गाँव के लोग’ का सफल मंचन किया गया। महानगरीय चमक-धमक से कोसों दूर एक ऐसे गाँव की कहानी जहाँ शहरी संस्कार अभी नहीं पहुंचे हैं, दर्शकों के लिए एक अनूठा अनुभव साबित हुई। नाटक के केंद्र में रहे ‘दूरबीन चाचा’ यानी आलोक शुक्ला, जिन्होंने कभी गंभीर बीमारी के चलते चलने में असमर्थ होने के बावजूद मंच पर अद्भुत ऊर्जा और जीवंत अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। सवा घंटे की इस प्रस्तुति में गाँव की मौलिकता और जिंदादिली के छोटे-छोटे रूपों को ऐसे हास्य-व्यंग्य के साथ पेश किया गया कि पूरा प्रेक्षागृह ठहाकों से गूंज उठा।
नाटक की सफलता के पीछे पूरी टीम की एक महीने की कड़ी मेहनत रही। शिब्बू गाजीपुरी के मधुर संगीत और ‘बाबा’ की भूमिका ने नाटक में जान फूंक दी, वहीं एडवोकेट टेकचंद राजपूत ने ढोलक की थाप के साथ मंच सज्जा और ‘कमजोर सिंह’ के किरदार को बखूबी निभाया। निरुपमा बढ़ेरा, कविता, जीतेंद्र सिंह, संजय सिंह और मृदुल कुमार समेत अन्य कलाकारों का अभिनय भी बेहद सशक्त रहा। लकी मल्होत्रा की प्रकाश सज्जा और तुषार चमोली के ध्वनि संचालन ने प्रस्तुति को और प्रभावशाली बना दिया।
आज भी देश में टुइयाँ जैसे कई गाँव मौजूद हैं जो सत्ता और समाज की नजरों में उपेक्षित हैं। इस नाटक ने मनोरंजन के साथ-साथ इन उपेक्षित बस्तियों को मुख्यधारा से जोड़ने का गंभीर संदेश भी बखूबी दिया है। आगे पढ़िये – जबलपुर में समागम का ‘मध्यम व्यायोम’ https://indorestudio.com/madhyam-vyayog-samagam-theatre-jabalpur/
LTG ऑडिटोरियम में गूंजा ‘टुइयाँ गाँव के लोग’ का ठहाका
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