मालवी व्यंग्य गीत-पंकज क्षीरसागर और चैतन्य कर्डिले
तुम्हारे हुस्न के आड़ा बाजार में आकर अड़कर,
इश्क अपना यशवंत सागर के सायफन में बह जाता था।
दिल धड़धड़ाता था कभी टेशन के छुक छुक इंजिन सा,
अब रामबाग की गलियों में यादों का चक्कर लगाता है।
तुम लगती थी झन्नाट करारी कचौड़ी मूंग दाल की,
अपन तो राजवाड़े पर गुटका मसलते देखते रहते थे !
कभी तेरी सूरत को पेड़ के पीछे रालामंडल में टापकर,
मेरा मन मेघदूत गार्डन की झाड़ी में मचल जाता है।
पानी पतासे चाटती इतराती तुम छप्पन की शाम सी,
मुझे श्रीकृष्ण टॉकीज की घमंडी लस्सी में नजर आती थी।
तुम्हारी कमर जैसे सन्नाट दौड़ती सुखलिया की गलियां,
उस पर मेरा दिल जवाहर मार्ग सा जाम हो जाता है।
तन-मन तेरा तराशा है किशनपुरा की छत्रियों सा,
हम चोर बदन तो यादों को ट्रेंचिंग ग्राउंड तक खोज आते हैं।
तुम तो ठहरी पलासिया की भयंकर सुंदर छोरी,
अपन खाकी पेंट में नूतन स्कूल में सिलीपर खाते थे।
अपन तुम्हारे पीछे भटके राजवाड़ा से खजराना,
अब यादों का शहर तुम्हारे घर के सामने से गुजरता है।

