Wednesday, May 13, 2026
Homeटॉप स्टोरीज़उनकी धमनियों में बहता था नृत्य और देह में बसती थीं बिजलियाँ

उनकी धमनियों में बहता था नृत्य और देह में बसती थीं बिजलियाँ

( वरिष्ठ लेखक, पत्रकार राकेश अचल)
इंदौर स्टुडियो। बिरजू महाराज की धमनियों में नृत्य बहता था। उनकी देह में बिजलियाँ बसती थीं। उन्हें मंच पर नाचता देखकर किसी भी दर्शक का मन मयूर नाचने के लिए विवश हो जाता था लेकिन अब बिरजू महाराज कभी नहीं नाचेंगे। वे चिर निंद्रा में लीन हो गए हैं। उनका जाना एक युग का अवसान है। जबकि कथक शैली के लिये अपूरणीय क्षति है। सच तो यह है कि हर नृत्य इनसान की नैसर्गिक जरूरत है और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम भी, लेकिन हर कोई नृत्य नहीं कर सकता। नाचना एक शास्त्रीयता है। देह को नियंत्रित कर अपने इशारों पर संचालित करना जितना महिलाओं के लिए आसान है उतना शायद पुरुषों के लिए नहीं,लेकिन बिरजू महाराज ने इस मिथक को तोड़ा और अंतत: वे नृत्य की कथक शैली के पर्याय बन गए। धमनियों में बहता था कथक नृत्य : कथक बिरजू महाराज की धमनियों में बहता था। वे खानदानी नर्तक थे, ‘कथक में बिरजू महाराज के घराने को कालिका बिंदादीन घराना कहा जाता था । उनके पितामह और पिता अच्छन महाराज भी सिद्धहस्त ‘कथक’गुरु थे। आप कह सकते हैं कि बिरजू महाराज को कथक घुट्टी में मिला था । बिरजू महाराज का पूरा घर नर्तक था,चाचा,ताऊ सब एक से बढ़कर एक नर्तक थे । बिरजू महाराज न केवल अच्छे नर्तक थे बल्कि एक उच्चकोटि के गायक भी थे। मैंने उन्हें पहली बार खजुराहो के एक समारोह में नाचते हुए देखा था । मेरे पिता उन दिनों खजुराहो के निकट बिजावर में राजस्व निरीक्षक थे । उनके साथ मैंने बिरजू महाराज को नाचते देखा तो उनका मुरीद हो गया था लेकिन उनसे मिल नहीं पाया।देह में बसती थी बिजलियाँ : बिरजू महाराज से पहली भेंट कब हुई मुझे ठीक से याद नहीं ,लेकिन इतना याद है कि जब उनसे मिला तो वे एकदम युवा थे और उनकी देह में बिजलियाँ बसती थीं। मुंह में पान चबाते हुए बिरजू महाराज में जो सहजता थी वो भी उनके नृत्य की ही तरह लाजबाब थी। बिरजू महाराज से अंतिम भेंट कई वर्ष पहले ग्वालियर में उद्भव के एक समारोह के सिलसिले में ग्वालियर में ही हुई थी । इतने वर्षों में कुछ भी नहीं बदला था,सिवाय उनकी काया में आयी झुर्रियों के। पूरी दुनिया में ‘ कथक’ का ध्वज फहराने वाले बिरजू महाराज नृत्य के महाराजा ही थे । उन्होंने आजीवन ‘कथक’ को समृद्ध करने में ही काम किया । पहले भारतीय कलाकेंद्र के जरिये और बाद में अपनी संस्था कलाकेंद्र के जरिये , बिरजू महाराज ने विवादों की फ़िक्र नहीं की । आरोप-प्रत्यारोप से बचते रहे लेकिन जहां जरूरत पड़ी वे बोले भी , उन्होंने गुरु-शिष्य परम्परा को खूब समृद्ध किया । कथक तो वाजिद अली शाह खुद करते थे लेकिन बिरजू महाराज की तरह वे खुद कथक गुरु नहीं थे। बिरजू महाराज ने कथक में नयी संभावनाओं को तलाशा।अनेक पौराणिक नृत्य नाटिकाओं को कथक की विषय वस्तु बनाया ,इसी वजह से कथक की लोकप्रियता लगातार बनी रही।प्यार का नाम था बिरजू : जगन्नाथ महाराज के कुलदीपक बिरजू महाराज का नाम बृज मोहन था लेकिन घर वाले प्यार से उन्हें बिरजू कहते थे और बाद में वे इसी नाम से स्थापित भी हुए। सचमुच बिरजू महाराज की नृत्य मुद्रा मन मोहक थी। उनके नृत्य में इतना लास्य था कि उसका वर्ण नहीं किया जा सकता। मात्र 7 साल की उम्र से मंचों पर थिरकने, बिखेरने वाले बिरजू महाराज को उनके अपने चाचाओं ने निखारा क्योंकि उनके पिता का निधन जब हुआ तब वे 9 साल के थे। बिरजू महाराज बताते थे कि वे नृत्य के लिए ही धरती पर आये थे। उन्होंने अपने जमाने के मूर्धन्य फिल्म निर्माता निर्देशक सत्यजीत रे के कहने पर ‘शतरंज के खिलाड़ी’ फिल्म के लिए न केवल नृत्य संयोजन किया बल्कि खुद नाचे भी। बाद में उनकी इस कला का इस्तेमाल ‘देवदास’,’डेढ़ इश्किया’,’उमराव जान’ और ‘बाजी राव मस्तानी’ के निर्माताओं ने भी किया,लेकिन बिरजू महाराज मंच से कभी विमुख नहीं हुए। मंच उनकी पहली प्राथमिकता बनी रही।कथक का बढ़ाया मान,मिला सम्मान :जैसे बिरजू महाराज ने कथक को अपना सब कुछ दिया उसी तरह कथक ने भी बिरजू महाराज को तमाम मान-सम्मान दिया.भारत सरकार ने उन्हें पदम् विभूषण से सम्मानित किया,इसके अलावा संगीत नाटक अकादमी सम्मान,कालिदास सम्मान,लता मांगेशकर सम्मान,फिल्म फेयर सम्मान उनके पास खुद चलकर आये,उन्हें डॉक्टरेट की मांड उपाधि से भी सम्मानित किया गया । बिरजू महाराज ने ताल की थापों और घुँघुरूओं की रुनझुन को महारास के माधुर्य में तब्दील करने में महारत हासिल की थी।पांच बच्चों के पिता बिरजू महाराज जितने कथक के प्रति समर्पित थे उतना ही प्यार वे अपने परिवार से भी करते थे। उन्होंने अपना नृत्य कौशल अपने बच्चों के जरिये अक्षुण्ण रखने की पूरी कोशिश की। (लेखक राकेश अचल के साथ बिरजू महाराज)लखनऊ घराने को दिलाई मान-प्रतिष्ठा: कथक के लखनऊ घराने को जो मान-प्रतिष्ठा दिलाई उसके लिए ये घराना उनका हमेशा ऋणी रहेगा। एक जमाने में कथक राज्याश्र प्राप्त नृत्य था । कथक के तीन प्रमुख घराने थे, इनमें जयपुर,लखनऊ और बनारस घराना प्रसिद्ध था लेकिन एक रायगढ़ घराना भी पहचान बना चुका था । बिरजू महाराज कथक के लिए तबले के अलावा पखावज पर जब 108 घुंघरुओं का वजन अपने पांवों में बांधकर थिरकते थे तब ऐसा लगता था जैसे पूरा मंच थिरक रहा हो। कथक में ठाठ,आमद,सलामी,परन,गत,लड़ी और तिहाई का विशेष स्थान है ।  बिरजू महाराज एक-एक चीज को अपने दर्शकों को समझाते हुए नाचते थे। उन्होंने नृत्य के इस आधुनिक देवता को कल की पीढ़ी एक किंवदंती मानेगी लेकिन हमारी पीढ़ी गर्व से कह सकेगी कि हमने बिरजू महाराज को देखा है । उनका नृत्य अभिनय,भाव भंगिमाओं और अंग संचालन के लिए सबसे अलग था। वे सचमुच ब्रज के मोहन की तरह नाचते थे।

 

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments

जावेद अहमद शाह ख़ान "अल-हिंदी" on रंगमंच की नई उड़ान…सौम्या व्यास