इंदौर स्टूडियो डॉट कॉम। मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन की इंदौर इकाई की साहित्यिक गोष्ठी में वागीश्वरी पुरस्कार एवं रवींद्र कालिया पुरस्कार से सम्मानित उपन्यासकार सुनील चतुर्वेदी के चर्चित उपन्यास गाफ़िल पर महत्त्वपूर्ण विमर्श हुआ। इसमें कई लेखक, आलोचक और सुधि पाठक उपस्थित थे। कार्यक्रम की शुरुआत में सुनील चतुर्वेदी ने अपने उपन्यास गाफ़िल का एक अंश पढ़ा जिसे उपन्यास का टर्निंग प्वाइंट कहा गया।
रोचक, पठनीय और हमारे समय का ज़रूरी उपन्यास : चर्चा का आगाज मुंबई की चित्रा देसाई की एक टिप्पणी से हुआ जिसे सोनल शर्मा ने पढ़ा। उन्होंने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि उपन्यास एक बैठक में पढ़ लिया। ऐसी रोचक पठनीयता से भेंट कम ही होती है। यह उपन्यास अतीत और वर्तमान को बहुत करीने से उठाता है। उपन्यास में हमारे समय के ज़रूरी सवालों को उठाया गया है वहीं अस्पताल जैसे सार्वजनिक संस्थानों पर भी कड़ी टिप्पणी है।
उपन्यास पढ़ते समय जीवंत हो जाते हैं दृश्य : सुनील चतुर्वेदी के इससे पहले आए उपन्यास काली चाट पर फ़िल्म बनाने वाले सुधांशु शर्मा ने इस उपन्यास में भी दृश्य बनाने की विशेषता वाले लेखक के शिल्प को प्रभावी बताया। उपन्यास में इसका अच्छा प्रयोग हुआ है और फ़िल्मकार के नाते उन्हें इस उपन्यास में फ़िल्म बनाने की प्रबल संभावना दिखती है।

चतुर फोटोग्राफर की तरह अपने डार्करूम में लिखना होता है उपन्यास : वरिष्ठ कथाकार राज बोहरे ने उपन्यास पर चर्चा करते हुए कहा कि सुनील जी का यह तीसरा उपन्यास है। उनके उपन्यास के विषय एकदम अलग होते हैं और उनका ट्रीटमेंट भी बिल्कुल निराला होता है। आप अपने आप को साहित्य का विद्यार्थी मानते हैं। जब आप कुछ नया रचते हैं तो एक चतुर फोटोग्राफर की तरह डार्क रूम में बैठकर चुपचाप अपना काम करते हैं। यह एक साधना है, तपस्या है। गाफ़िल सन साठ-सत्तर के कस्बों के उस माहौल को रचता है जो इनके लिए मालवा का अंचल है तो मेरे लिए बुंदेलखंड का तो किसी और के लिए निमाड़ी भोजपुरी या पूर्वांचल का अंचल हो सकता है। उपन्यास के नायक की मानसिकता बदलने का कारण वह सारा रसायन है जो उसके भीतर बैठी हीन ग्रंथि में है। वह इस ग्रंथि से मुक्त हो जाना चाहता है। उन्होंने आज के दौर में आने वाले छोटे उपन्यासों के बारे में भी बात की।
तीन अलग-अलग दुनियाओं के छोर पकड़ता है ‘गाफ़िल’ : वरिष्ठ उपन्यासकार कहानीकार प्रकाशकांत ने कहा कि सुनील अपने उपन्यास के विषय ना जाने कहाँ से लाते हैं क्या करते हैं कि हर उपन्यास एक दूसरे से बिल्कुल अलग है। जिनके कोई सूत्र एक दूसरे से नहीं जुड़ते। गाफ़िल में जो कंटेंट है इसमें तीन दुनिया एक साथ छोटे कैनवास पर अपने विराट रूप में दिखती हैं। एक मेहनतकश लोगों की दुनिया है जिसमें दूध वाले हैं सब्जी वाले छोटे काम करने वाले हैं। दूसरी दुनिया अभिजात्य वर्ग की संपन्न दुनिया है और तीसरी दुनिया अस्पताल की है। यह तीनों दुनिया इस तरह से आई हैं कि एक दूसरे से अलग-अलग नहीं दिखती लेकिन इस दुनिया से दूसरे में आवाजाही बनी रहती है। सबसे बड़ी बात जो इसमें है कोमा में रहते हुए एक दूसरी दुनिया को देखना। मैंने जितना पढ़ा है उसमें अभी तक कभी ऐसा पढ़ने में नहीं आया कि कोमा का व्यक्ति एक दुनिया से दूसरी में जा रहा है वह ही नहीं उसके पाठक को भी ले जा रहा है।
लेखक ने इस उपन्यास में इसमें एक बड़ी बात उठाई है क्लास माइग्रेशन या वर्गांतरण की। इस उपन्यास में चुपचाप उस पर उंगली रखने की कोशिश है। एक आदमी ऊपर जाकर नीचे वर्ग से घृणा करता है यहाँ वह आदमी शुरू से अपने वर्ग से घृणा करता है। वह अपने सब्जी बेचने वाले पिता को पसंद नहीं करता अपने दोस्त को घर ले जाना नहीं चाहता और उपन्यास के टर्निंग पॉइंट पर वह नायिका गायत्री से संवाद करते हुए कहता है कि मैं इस वर्ग को पसंद नहीं करता और जितनी जल्दी होगा मैं इसे छोड़ दूँगा। यह उसकी वह घोषणा है कि वह उस वर्ग को जिसमें आप रहते हैं उस से घृणा करके उसे छोड़कर पलायन करना चाहता है और करता भी है। जब वह कोमा में है तब उन्हीं चीजों को अलग तरह से देख रहा है। अपनी ही उस यात्रा के लिए उसे हल्का-सा पछतावा है लेकिन साबित कुछ नहीं है लेकिन जो दृश्य उसके पास आ रहे हैं वह कह रहे हैं कि यह चीजें उसके लिए तकलीफ देह हैं। लेखक यह व्यक्त कर पाए और वे इसमें सफल रहे। अस्पताल की तीसरी दुनिया का वीभत्स सत्य इसमें उभरा है। इसमें भी ऐसे लोग हैं जो प्रयोग की तरह आए हैं दो वार्ड बाॅय हैं जिनके संवाद बताते हैं कि यहाँ हो क्या रहा है? अस्पताल में पत्रकार आता है उसके स्वार्थ हैं गरीब मरीजों को देखने का पाखंड भी है। उन्होंने कहा सुनील जी उपन्यास का क्राफ्ट कैसे साधते हैं कभी बताते नहीं हैं वे एक व्यंग्यकार भी हैं लेकिन व्यंग कभी सीधे-सीधे नहीं आता जिस तरह से मालवा के अंचल का रंग भाषा में आया दृश्यों में आया उपन्यास को एक खास गहराई देता है।

दुनिया की दौड़ में हम सब गाफ़िल हैं : सुनील चतुर्वेदी जी ने अपने उपन्यास के बारे में बताते हुए कहा कि इस दुनिया की दौड़ में हम सब कोमा में हैं। हम सब गाफ़िल हैं। इसमें फ्लैशबैक को कोमा के रूप में उपयोग किया गया है। जितना हम पैसे की दौड़ में जा रहे हैं स्मार्ट सिटी बना रहे हैं लेकिन जो समाज हम खोते जा रहे हैं उसका क्या? विकास सिर्फ़ पैसा ही है या समाज भी उस विकास के दायरे में आता है?
क्या जीडीपी और एफडीआई असली विकास है या असली विकास वह था जब हमारे पास पैसा नहीं था? यह द्वंद की तरह दिमाग में था जिसके लिए एक शिल्प चाहिए था कि कैसे आप पात्र को यहाँ से वहाँ लेकर जाएंगे ताकि ऐसा भी ना लगे कि अचानक वहाँ चला गया। एक लिंक चाहिए इसके लिए यहाँ एक घटना हो जिससे वह वहाँ जा सकें। फिलॉसफी दिमाग में थी कि अंततः हम क्या चाहते हैं? एक पॉइंट पर लड़की कहती है पैसा कमा लोगे फिर? वह उस फिर को नहीं सुन पाता क्योंकि वह उस समय भी कोमा में है। हम सभी कहीं ना कहीं इस ‘फिर’ को नहीं सुन पाते और यही इस उपन्यास को लिखने का मूल उद्देश्य रहा है।
अंधी दौड़ से बाहर आते-आते हमें बहुत देर हो जाती है : मुंबई से आई मंजुला देसाई ने पूछा कि क्या लोग जीवन में कभी इस अंधी विकास यात्रा का खेद करते हैं क्या वे लौट कर आते हैं? जिसका जवाब देते हुए सुनील जी ने कहा कि आते हैं, जीवन के उत्तरार्ध में आते हैं लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है सब कुछ खो चुके होते हैं।

किस्सागोई में शिल्प में उपन्यास बेहतर बन पड़ा है : अपनी बात शुरू करते हुए मुंबई से आए समीक्षक गंगा शरण जी ने कहा मैंने तीनों उपन्यास पढ़े हैं और तीनों उपन्यास में लगातार ग्रोथ देखी है। किस्सागोई में शिल्प में हर अगला उपन्यास पहले से बेहतर बना है। इस उपन्यास का गांव के सह जीवन का वर्णन बहुत अच्छा लगा अब यह दृश्य दुर्लभ हो रहा है। जहाँ-जहाँ विकास न पहुँचा हो वहाँ शायद हो सकता है यह सहजीवन हो लेकिन शहरों में कस्बों में और बहुत हद तक गांव से भी यह सहजीवन लुप्त हो चुका है। अस्पताल में एक दृश्य है जिसमें पत्रकार गरीब बच्ची के लिए खड़ा होता है लेकिन अस्पताल मैनेजमेंट को उसकी भी कमजोर नस मिल जाती है और वह भी बिक जाता है। उपन्यास पठनीय है छोटा है लगातार बांध कर रखता है। उपन्यास में टर्निंग प्वाइंट था अगर नायक उस समय समझ जाता तो शायद यह उपन्यास ही नहीं बनता और हम सब कभी न कभी इस बात को नहीं समझते हैं। हमारी आम धारणा है कि जो संपन्न हैं अमीर हैं वह संवेदनहीन होते हैं लेकिन उपन्यास उसका अच्छे से खंडन करता है। उपन्यास इस स्थापित अवधारणा को तोड़ता है और अमीर नायिका या पत्नी कहीं निराश नहीं करती। इसका अंत बेहद अप्रत्याशित और बेहद संक्षिप्त है।
उपन्यास में पाठकों के लिए कई जगह सूत्र छोड़े गए हैं : वरिष्ठ कहानीकार मनीष वैद्य ने चर्चा करते हुए कहा कि सुनील जी अपने उपन्यासों में हमेशा ज़रूरी, समाज से मुठभेड़ करते महत्त्वपूर्ण विषय लेकर लिखते हैं और लिखते हुए कई जगह पाठक के लिए सूत्र छोड़ देते हैं। उस ज़रूरी बात को छोड़ देते हैं और जहाँ से वह छोड़ते हैं वहीं से कहानी पाठक के मन में शुरू हो जाती है। उन्होंने कार्यक्रम के स्वरूप की सराहना करते हुए कहा कि यह एक अनौपचारिक कार्यक्रम रहा जिसमें सभी की भागीदारी रही।
समाज के सह जीवन का दस्तावेजीकरण : कहानीकार कविता वर्मा ने कहा कि इस उपन्यास में जिस सहजीवन का दस्तावेजीकरण है, उसे अगली पीढ़ी सिर्फ़ साहित्य के माध्यम से ही जान पाएगी। उपन्यास में अस्पतालों के गोरखधंधे में कामकाजी लड़कियों के मानसिक शोषण की उस पुरुष मानसिकता को भी उजागर किया है जहाँ लड़कियाँ टाइमपास हैं। इस व्यवस्था में मानवीयता में विश्वास रखने वाले डॉक्टर का कोई स्थान नहीं है और अंततः उसे देश छोड़कर जाना पड़ता है।

नायक का प्रतिनायक बनना बड़ी विशेषता : कहानीकार उपन्यासकार अनुराग पाठक ने उपन्यास की लेखन प्रक्रिया के दौरान हुए मजेदार वाकयों का जिक्र करते हुए कहा कि हमें तो कई-कई बार इस उपन्यास को पढ़ना और सुनना पड़ा लेकिन अंततः जो बनकर यह निकला है उससे हम सभी को बहुत संतुष्टि है। कवयित्री सोनल शर्मा ने उपन्यास की विशेषता इसके नायक का प्रतिनायक होना बताया। हम पारम्परिक रूप से नायक के प्रति प्रेम श्रद्धा दया आदि भावों से भर जाते हैं लेकिन गाफ़िल के नायक के प्रति पाठक को ग़ुस्सा ही आता है। यह एक अलग प्रयोग है जो लेखक ने साहसिक रूप से किया है।
कार्यक्रम में देवास से ग़ज़लकार विक्रमसिंह गोहिल वरिष्ठ ग़ज़लकार अज़ीज अंसारी, कहानीकार नीहार गीते प्रकाश सोहनी डॉ मंगेश नेह, एस-एस वर्मा ,सुश्री रानी पाठक, कवयित्री रोशनी वर्मा रश्मि मालवीय, शिरीन भावसार और विभा दुबे आदि भी मौजूद थे।

