उर्दू ड्रामा फेस्टिवल में ‘बुद्ध और ग़ालिब’,‘पहले आप’ और ‘जेब क़तरा’

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कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। दिल्ली में 10 नवंबर 2025 से उर्दू ड्रामा फेस्टिवल जारी है। अब तक 3 नाटकों का मंचन हो चुका है। इनके नाम हैं- ‘बुद्ध और ग़ालिब से मुलाक़ात’, ‘पहले आप’ और ‘जेब क़तरा’। मंडी हाऊस में मौजूद श्रीराम सेंटर में यह ड्रामा फेस्टिवल चल रहा है। हर दिन शाम को साढ़े छह बजे से नाटक दिखाये जा रहे हैं। दर्शकों के लिये यह आयोजन नि:शुल्क है। उर्दू ड्रामों का यह 35 वां फेस्टिवल: उर्दू ड्रामों का यह 35 वां फेस्टिवल है जो 15 नवंबर 2025 तक जारी रहेगा। फेस्टिवल का शुभारंभ जनाब अथहर सईद ने किया। उन्होंने उर्दू और फारसी थियेटर के इतिहास पर प्रकाश डाला। स्वागत भाषण डॉ.रमेश एस.लाल ने दिया। उन्होंने कहा – ‘ये फेस्टिवल थियेटर आर्टिस्ट के लिये एक सकारात्मक और उद्देश्यपूर्ण मंच प्रदान करने का अवसर है’। दिल्ली सरकार के सहयोग से फेस्टिवल: यह फेस्टिवल दिल्ली सरकार के कला, संस्कृति और भाषा विभाग के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। इसका मकसद उर्दू थिएटर को बढ़ावा देना और नई पीढ़ी को उर्दू भाषा से जोड़ना है। नौजवान शायर की अजब तलाश: फेस्टिवल के पहले दिन नाटक ‘बुद्ध और ग़ालिब से मुलाक़ात’ ने अपने अनूठे विषय, संवादों और अभिनय से दर्शकों को मंत्र मुग्ध कर दिया। यह नाटक एक नौजवान शायर की आत्म-खोज की कहानी है। जिसे मिर्ज़ा ग़ालिब के शब्दों और गौतम बुद्ध के विचारों से गहरा लगाव है। एक ओर वह ग़ालिब की शायरी के माध्यम से जीवन को समझने की कोशिश करता है, तो दूसरी ओर बुद्ध की शिक्षाएँ उसे आध्यात्मिक अंतर दृष्टि देती हैं। फिलासफ़ी के साथ अदबी तालमेल: नाटक में फिलासफ़ी और अदबी दोनों ही पहलुओं का इतना अच्छा तालमेल किया गया है कि दर्शक ख़ुद को किरदारों के साथ अपना जुड़ाव महसूस करते हैं। अशोक लाल के लेखन और आशीष शर्मा के निर्देशन ने इस प्रस्तुति को और भी आकर्षक बना दिया। धर्मेंद्र, अदिति, प्रेरणा कश्यप और बाकी कलाकारों ने भी अपने किरदारों को बखूबी निभाया, जबकि संवाद, पटकथा और दृश्य बेहद सार्थक और प्रभावी थे। ‘पहले आप’ वाली लखनवी तहज़ीब : दूसरे दिन 11 नवंबर को लखनऊ के कल्चर पर आधारित नाटक ‘पहले आप’ प्रस्तुत किया गया। यह नाटक लखनऊ के पारंपरिक तौर-तरीकों, सभ्यता और सांस्कृतिक पहलुओं को दर्शाता है। नाटक के लेखक इफ़्तिख़ार आलम ने ‘पहले आप’ कहने के तौर-तरीके़ को कहानी के मुख्य विचार से जोड़ते हुए लखनऊ की उस परंपरा को प्रस्तुत किया है जहाँ लोग हमेशा से एक-दूसरे को सम्मान और मौका देने के लिए जाने जाते हैं।नाटक ने दर्शकों को ख़ूब हँसाया: अमन अहमद ने इस नाटक का निर्देशन किया है। लखनवी तहज़ीब और नज़ाकत वाले इस नाटक ने दर्शकों को खूब हँसाया। नाटक लखनऊ की गंगा-जमुनी तहज़ीब और सामाजिक एकता को ख़त्म करने की साज़िश का पर्दाफ़ाश करता है।राय और नवाब साहब की कहानी: कहानी लखनऊ के दो दोस्तों, राय साहब और नवाब साहब के इर्द-गिर्द घूमती है। दोनों की दोस्ती, दो शरारती तत्वों की साजिश की वजह से गलतफहमी में बदल जाती है। दोनों दोस्त एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं, लेकिन वे अपनी लखनवी तहज़ीब से इस लड़ाई को दिलचस्प और मज़ाहिया रंग दे देते हैं।शतरंज खेलते हुए लड़ाई के अदब-क़ायदे: दोनों सुकून से शतरंज खेलते हुए पहले लड़ाई अदब-क़ायदे तय करते हैं और फिर लड़ाई शुरू होती है। बाद में, नाटक में हास्य और लालित्य का ऐसा मनमोहक तड़का घुलता है कि सभागार ठहाकों से गूंज उठता है। अंत में, दोनों दोस्त “पहले आप” के सभ्य अंदाज में लड़ाई ख़त्म कर देते हैं, जबकि शरारती लोग अपनी नाकामी के साथ लौट जाते हैं।आपसी मेल-मिलाप और भाईचारे का नाटक: ज़ाहिर है कि नाटक न केवल मनोरंजन करता है, बल्कि सदभाव, मेल मिलाप और सम्मान का पाठ भी पढ़ाता है। इस नाटक में 13 कलाकारों ने अपने अभिनय और लखनऊ की शालीन भाषा और भाव-भंगिमाओं से प्रस्तुति को यादगार बना दिया। प्रस्तुति के बाद अकादमी के अधिकारी डॉ. रमेश एस. लाल, मुहम्मद हारून और उजैर हसन कुद्दूसी ने निर्देशक अमन अहमद को मोमेंटो और गुलदस्ता भेंट कर इस्तकबाल किया। मंटो की मशहूर कहानी “जेब कतरा”: फेस्टिवल के तीसरे दिन ‘एक्टर्स थिएटर सोसाइटी’ ने हिम्मत सिंह नेगी के निर्देशन में नाटक “जेब कतरा” का मंचन किया गया। ये नाटक उर्दू के कालजयी कथाकार सआदत हसन मंटो की लिखी कहानी पर आधारित था।उर्दू अदब के अनूठे राइटर ‘मंटो’: मंटो उर्दू कथा साहित्य के उन विरले रचनाकारों में से एक हैं जिन्होंने जीवन की कड़वी सच्चाइयों और सामाजिक बुराइयों को निर्भीकता और साहस के साथ कलमबद्ध किया है। जनाब मलिक ने रखे सारगर्भित विचार: नाटक की प्रस्तुति से पहले, मंच संचालक जनाब मलिक ने मंटो के विचारों, कला और रंगमंच पर सारगर्भित विचार रखे। इसके बाद ‘जेब कतरा’ की प्रस्तुति दी गई जिसने दर्शकों को प्रभावित किया।काशी नाम के एक चोर की कहानी: यह कहानी एक जेब कतरे “काशी” के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है, जो हालात की वजह से चोरी करने को मजबूर हो जाता है। एक दिन बाज़ार में, वह विमला नाम की एक महिला का पर्स चुरा लेता है, लेकिन पर्स में पैसों के साथ रखे ख़त को पढ़कर उसे अपनी करतूत पर बेहद पछतावा होता है।दिल में जाग उठती है इंसानियत: असल में विमला सुसाइड कर लेना चाहती है। यह बात जानकर काशी में इंसानियत जाग उठती है। वह अपने जुर्म के लिये विमला से माफी मांगता है। बदले में विमला काशी को एक बेहतर इंसान बनाने में मदद करने का वादा करती है। हाथ कटाकर चोरी से निजात: मगर सालों की चोरी ने काशी को “क्लेप्टोमेनिया” नाम की बीमारी से पीढ़ित कर दिया है और इस ज़हनी बीमारी का कोई इलाज नहीं है। कहानी तब कशमकश भरे मोड़ पर पहुँच जाती है जब विमला अपनी मजबूरियों की वजह से एक बार फिर काशी को चोरी करने के लिए कहती है, लेकिन काशी मना कर देता है। उसने एक नेक और ईमानदार इंसान की तरह जीने का इरादा कर लिया है। इसके लिये उसने अपने दोनों हाथ कटा लिये हैं। यह देखकर विमला को गहरा झटका लगता है। बढ़िया अभिनय और भावुक प्रस्तुति: नाटक में कलाकारों की भावनात्मक प्रस्तुति ने मंटो की कहानी को जीवंत रूप दे दिया। ख़ासकर काशी और विमला (समीर जावेद और निधि महावन) के अभिनय को दर्शकों ने बेहद पसंद किया। दोनों ही दिल्ली रंगमंच के सीनियर आर्टिस्ट भी हैं। बाकी कलाकारों ने भी अपने संवादों, भावों और अभिनय से प्रस्तुति में अपना योगदान दिया। यह नाटक सिर्फ़ अभिनय के नज़रिये से ही नहीं बल्कि अपनी पटकथा, संवादों और कल्पनाशील निर्देशन की वजह से भी यादगार बन गया। हिम्मत सिंह नेगी का अभिनंदन: आख़िर में, अकादमी के प्रमुख डॉ.रमेश एस.लाल, मुहम्मद हारून और उजैर हसन कुद्दूसी ने निर्देशक हिम्मत सिंह नेगी को स्मृति चिन्ह और गुलदस्ता भेंट कर स्वागत किया। इस मौके पर नाट्य प्रेमियों के अलावा बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स भी मौजूद थे। आगे पढ़िये – मैं जो कुछ हूँ उर्दू की वजह से हूँ – डॉ.एम.सईद आलम – https://indorestudio.com/dr-m-sayeed-alam-dubai-urdu-award/

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