संगीत सीखे बिना एक स्ट्रगलर कैसे बना फ़िल्मों का स्टार सिंगर?

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शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। क्लासिकल म्यूज़िक की तालीम लिये बिना, एक स्ट्रगलर फिल्मी दुनिया का स्टार सिंगर कैसे बन गया? …दुनिया में इंसान का वजूद क्या है?… और मिर्ज़ा ग़ालिब की ज़िदंगी आज़माइशों से भरे किन हालात में गुज़री? दिल्ली में श्रीराम सेंटर के उर्दू ड्रामा फेस्टिवल में इन्हीं सवालों के 3 ड्रामे पेश किये गये। नाम हैं ‘तेरा रहगुज़र याद आया (के.एल.सहगल), शब-ए-तर (अँधेरी रात), और ‘क़ैद-ए-हयात’। तीनों ही ड्रामे अपनी पेशकश में एक-दूसरे से बेहद जुदा थे। स्टेज पर के. एल. सहगल की ज़िदंगी: हिदायतकार डॉ.एम.सईद आलम का लिखा और यशराज मलिक की अदाकारी से सजा ‘तेरा रहगुज़र याद आया’ एक बेहतरीन ड्रामा रहा। इस ड्रामे में यशराज मलिक ने, सहगल साहब के बेहतरीन अभिनय के साथ, उनके यादगार नग़मों को आवाज़ भी दी। इस ड्रामे में सहगल साहब के गीतों की रिकॉडिंग का इस्तेमाल नहीं किया गया है। जिस एक जगह पर रिकॉर्डिंग इस्तेमाल हुआ – वहां पर बजाया जाने वाला गीत ‘जब दिल ही टूट गया’ तकनीकी गड़बड़ी की वजह से नहीं चल सका। हालांकि उससे ड्रामे पर कोई असर नहीं पड़ सका। बहरहाल सहगल के नगमों को यशराज मलिक ने हारमोनियम बजाते हुए LIVE पेश किया। यह शो एक तरह से सहगल की ज़िदंगी को ख़िराज़े अक़ीदत था।24 किरदार, हरीश छाबड़ा ने किये 5 रोल: ड्रामे में मुख्य किरदार निभाने वाले यशराज मलिक के साथ ही बाक़ी कलाकारों ने भी अपनी अदाकारी से कहानी में जान पैदा दी। डॉ. आलम की इस स्क्रिप्ट में कोई 24 किरदार है। कुछ कलाकारों ने कई रोल अदा किये। इनमें हरीश छाबड़ा, तनुल भारती, अयमान अंसारी और हिमांशु श्रीवास्तव जैसे  कलाकार रहे। हरीश छाबड़ा जैसे मंजे और सीनियर एक्टर ने इस ड्रामे में एक-दूसरे से एकदम अलग 5 किरदार किये।  जूनियर सहगल का रोल अदा करने वाले कलाकार रिस्तिन ज़ुल्फ़ीकार की भी तारीफ़ करना होगा, इस बच्चे ने स्टेज पर कमाल का अभिनय किया। मासूम ज़ुल्फीकार के साथ आरिफ़ा नूरी ने उनके माँ की भूमिका अदा की।  उम्दा उर्दू बोलने वाले कलाकार: यहां यह बताना ज़रूरी है कि डॉ.सईद के थियेटर ग्रुप Pierrot’s Troupe में ज़्यादातर कलाकारों की मादरी ज़बान उर्दू नहीं है लेकिन वे अच्छी उर्दू बोलते हैं, उर्दू के थियेटर को आगे बढ़ाने में अपनी अहम भूमिका निभाते हैं। इस बात की डॉ.एम.सईद आलम तकरीबन हर शो में तारीफ़ करते हैं।सेंचुरी के करीब सहगल का ड्रामा प्रॉडक्शन: इस ड्रामे में, राइटर-डायरेक्टर डॉ. एम. सईद आलम, नरेटर का रोल अदा करते हैं। वे ड्रामे की कहानी को एक बढ़िया स्टोरी टेलर के रूप में रफ्तार देते हैं और दर्शक उसी दिलचस्पी से सीन दर सीन ड्रामे का सफ़र तय करते हैं। सहगल वाले इस ड्रामे का यह 92 वां शो था, यानी सईद साहब के प्रॉडक्शन में जल्द ही एक और सेंचुरी लगने जा रही है। यह Pierrot’s Troupe की एक और माइल स्टोन कामयाबी होगी।कुछ सवालों के नहीं मिल सके जवाब: इस ड्रामे में कुंदन लाल सहगल की ज़िदंगी से जुड़े बहुत से सवालों के जवाब तो मिलते हैं। कुदरती तौर पर इस हुनरमंद के सिंगर बनने की कहानी का पता चलता है। मगर कुछ सवालों के जवाब मिलना बाक़ी रह जाते हैं। ये ऐसे सवाल भी हैं जो ड्रामे में नये सीन्स या एडिशन की माँग करते हैं। हो सकता है अगले शोज़ में इनको लेकर कोई काम हो। मन में कौंधने वाले कुछ सवाल: माँ से ‘हीर’ सीखने वाले सहगल, कामयाब सिंगर बनने के बाद, क्या उन्हें बॉम्बे लेकर आते हैं? दोनों बरसों बाद जब मिलते हैं, तब क्या कुछ होता है? उनके पिता चाहते थे कि बेटा-मजिस्ट्रेट, वकील या डॉक्टर बने। मगर बेटे के सिंगर बन जाने पर वे क्या सोचते हैं? या उनके माँ-बाप सहगल के कामयाब होने से पहले ही चल बसते हैं? ड्रामा देखते हुए एक और अहम सवाल उठता है। बॉम्बे में सहगल किन लोगों की संगत में शराबी बन गये थे? हालांकि दिखाया गया है कि वे एक नेकदिल और सादी ज़िदंगी वाले इंसान थे। फिर वे नशे के आदी कैसे हो गये? अँधेरी रात और 14 अँधे इंसान: ‘शब-ए-तर’ (अँधेरी रात) बेल्जियन के प्लेराइट और पोएट मौरिस मेटरलिंक के मशहूर प्ले “The Blind” (Les Aveugles) पर आधारित है। प्रेमचंद ने इसका हिन्दुस्तानी समाज के मुताबिक ट्रांसक्रिप्शन किया है। यह कहानी उन नाबीना यानी नेत्रहीन लोगों की है जो एक जंगल में खो गये हैं। उन्हें रास्ता दिखाने वाला मुहाफ़िज़ या गाइड अचानक गायब हो गया है। ऐसे में नाबीना- गहरी उदासी, बेबसी और अनजाने डर से घिर गये हैं।सिर्फ जिस्मानी नहीं होता अँधापन: ये कहानी बताती है कि अँधा पन सिर्फ ज़िस्मानी नहीं होता! ये आपके वजूद और यहां तक की आपकी पहचान को भी धुंधला कर देता है। इसी की तर्जुमानी करता, ड्रामे में एक डायलॉग भी है-“हम में से किसी ने एक-दूसरे को कभी नहीं देखा, हम ख़ुद नहीं जानते कि हम कौन हैं”। जिस्मानी हलचल के बिना डायलॉग: इस ड्रामे में एक्टर डायलॉग तो बोलते हैं मगर जिस्मानी तौर पर कोई हलचल नहीं करते। ऐसे में उनकी ज़हनी हालत का अंदाज़ा होता है। क़दमों की आहट, किसी बच्चे का रोना, कुत्तों का भौंकना, परिंदों का चहचहाना, समंदर का शोर या फिर ओलों का गिरना भी गहरा असर छोड़ता है और हालात को बयान करता है।  ‘शब-ए-तर’ एक यादगार तजुरबा: हिदायतकार फ़हाद ख़ान ने कहानी को इस तरह से पेश किया है कि उनका ये ड्रामा देखने वालों के लिये एक यादगार तजुरबा बन जाता है। इसमें मगरिबी राइटर मेटरलिंक की फिलॉसफ़ी और मशरिकी ट्रांसलेटर प्रेमचंद का अच्छा तालमेल नज़र आता है। कलाकारों ने अदाकारी से ही नहीं और आवाज़ों के उतार-चढ़ाव से भी ड्रामे को कामयाब बनाया है। ड्रामा ख़त्म होने पर आडिटोरियम में सवालों का गहरा सन्नाटा छा जाता है।रंगसाज़ की पेशकश ‘क़ैद-ए-हयात’: उर्दू ड्रामा फेस्टिवल में ‘रंगसाज़’ थियेटर ग्रुप ने मिर्ज़ा ग़ालिब की ज़िंदगी पर  ‘क़ैद-ए-हयात’ ड्रामा पेश किया। इसे मशहूर राइटर सुरेंद्र वर्मा ने लिखा है, ये एक सिम्बालिक प्ले है। इसमें ग़ालिब की ज़िंदगी के ज़रिए एक क्रियेटिव और सेंसेटिव राइटर की जद्दोजहद को दिखाया गया है। इसमें शामिल है- उनकी तंगहाल ज़िदंगी, मुआशरे के साथ-साथ अपनों की अनदेखी और कुछ नया लिखने की बेचैनी। ग़ालिब अपने वक्त से बहुत आगे की सोचते हैं, लेकिन अपने समय की बंदिशों में कै़द होकर रह जाते हैं।हर राइटर की अंदरूनी क़ैद की कहानी: ये ड्रामा महज़ ग़ालिब ही नहीं, हर उस राइटर का अफ़साना भी है जो  लिखने की आज़ादी के लिए हालात और ख़ुद अपने आप से जंग लड़ता रहता है। इसे एक्टर-डायरेक्टर डॉ. दानिश इकबाल ने असरदार ढंग से स्टेज पर पेश किया है। तीन हिस्सों वाले इस नाटक के अहम किरदार हैं — ग़ालिब, उनकी बीवी उमराव बेगम, उमराव की बहन आपा, गालिब की माशूका कतबा और नौजवान शायर परवेज़।ग़ालिब, उनकी बीवी और माशूका: इस ड्रामे में ग़ालिब की बीवी उमराव बेगम एक मज़हबी और रिवाजों को मानने वाली ख़ातून हैं। उनके और ग़ालिब के बीच दिली तौर दूरियां है, वे ग़ालिब की तख़लीक़ी बेचैनी को समझ नहीं पातीं। दूसरी तरफ, कतबा नाम की वो मोहतरमा, ग़ालिब की माशूका है — हालांकि यह किरदार असली या ऐतिहासिक नहीं, है। कतबा, ग़ालिब की शायरी, सोच और उनकी रूह की आवाज़ को समझती है। ग़ालिब दोनों किरदारों के बीच एक अंदरूनी जद्दोजहद में जीते हैं, एक तरफ ज़िम्मेदारी और दूसरी तरफ लिखने की आज़ादी।मंचन के साथ ड्रामा फेस्टिवल का समापन: उम्दा अदाकारी, असरदार डायलॉग, बढ़िया कॉस्ट्यूम, म्यूज़िक और लाइट इस ड्रामे की ख़ासियतें रहीं। ड्रामे में हर किरदार ने अपने अंदाज़ को बनाये रखा। डॉ. दानिश इकबाल के साथ ही ड्रामे में अजय कुमार, डॉ. अनामिका सागर, आमिर खान, रोहित कुमार, सबिका अहमद, शादान अहमद, पूनम सोनी अहम किरदारों में नज़र आये। लाइट नवनीत भारद्वाज, संगीत अक्षय कुमार ने दिया। डॉ. दानिश जैसे सीनियर थियेटर आर्टिस्ट  की इस पेशकश के साथ ही उर्दू अकादमी का 35 वां ड्रामा फेस्टिवल भी ख़्तम हुआ। आख़िर में अकादमी की तरफ़ से मुहम्मद हारून और उज़ैर हसन कुद्दूसी ने निर्देशक डॉ. जावेद दानिश को मोमेंटो और गुलदस्ता पेश कर उनका इस्तकबाल किया। आगे पढ़िये – उर्दू ड्रामा फेस्टिवल के पहले तीन ड्रामों की रिपोर्ट। https://indorestudio.com/urdu-drama-festival-delhi-ghalib/

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