कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। “निकाल फेंकना चाहिए उन आँखों को जो जिस्म में धंसी हैं और केवल जिस्म को ही देख पाती हैं। ये आँखें जो न तो रिश्ते देखती हैं और न ही उम्र, उनका क्या मायने? मैं केवल मांस का लोथड़ा नहीं, एक इंसान भी हूं आप ही की तरह।”
यह मार्मिक संवाद सत्य घटना पर आधारित नाटक ‘उसके बाद’ का है, जिसका हाल ही में इंदौर के जाल सभागृह में मंचन हुआ। प्रासंगिक रंग समूह की इस प्रस्तुति का आयोजन सूत्रधार संस्था ने किया। नाटक का लेखन और निर्देशन आलोक शुक्ला ने किया और वे स्वयं नाटक की एक भूमिका में भी नज़र आए।
करीब एक घंटे की इस प्रस्तुति में 1997 की एक घटना को आधार बनाया गया, जिसमें एक मासूम बच्ची के साथ हुई दरिंदगी को दिखाया गया। कलाकारों ने अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों को झकझोरते हुए यह संदेश दिया कि आज भी महिला, बच्ची और युवती सुरक्षित नहीं हैं। धर्म और संस्कृति के नाम पर हो रहे पाखंड को नाटक ने उजागर किया।
मुख्य भूमिका में कविता के साथ टेकचन्द, विजय लक्ष्मी, प्रताप सिंह, विनय शर्मा और आलोक शुक्ला ने भावपूर्ण संवादों और अभिनय से दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। संगीत अभ्युदय मिश्रा का था, जबकि ध्वनि संचालन और प्रकाश व्यवस्था विनय शर्मा ने संभाली। मंच सज्जा टेकचन्द और प्रताप सिंह द्वारा की गई, जो नाटक की पृष्ठभूमि के अनुरूप रही। आगे पढ़िये – नाटक जब ख़त्म हुआ तब कोई कुछ कह पाने की हालत में नहीं था https://indorestudio.com/vasaansi-jirnani-play-review-indore-studio-swati-dubey/

