वीर सावरकर की 140 वीं जन्म जयंती पर, 28 मई 2023 को रायपुर में, वरिष्ठ अभिनेता, लेखक और निर्देशक योग मिश्र ने उनके जीवन पर केंद्रित एकल नाटक ‘मी तात्याराव बोलतो’ को प्रस्तुत किया। योग मिश्र के अनुसार, नाटक को दर्शकों ने बेहद कौतूहल से देखा। कुछ दर्शकों ने अपनी प्रतिक्रियाएं लिखीं और उसे सोशल मीडिया पर भी साझा किया। जबकि बहुत से लोगों ने उनके इस तरह के प्रयोग पर चुप्पी साध ली अथवा उनके प्रयोग की कटु आलोचना की। योग मिश्र यहां बता रहे हैं कि उन्होंने विनायक दामोदर सावरकर के जीवन को अपनी प्रस्तुति के लिये क्यों चुना? आपको बता दें योग मिश्र कभी हबीब तनवीर की मंडली से जुड़े रहे हैं, वे तीन करीब चार दशकों से निरंतर रंगमंच के लिये समर्पित काम कर रहे हैं। अभिनट फ़िल्म एवं नाट्य फाउंडेशन,छत्तीसगढ़ के प्रमुख हैं।
– संपादक,इंदौर स्टूडियो।
मैं हूँ एक सत्यअन्वेषी रंगकर्मी: मैं रंगकर्मी हूँ इसलिए सत्यअन्वेषी हूँ। सावरकर के पक्ष और विपक्ष में लिखी गई किताबों को पढ़ने के बाद तटस्थ भाव से मुझे जो सत्य नजर आया, उसकी ईमानदार झलक मैंने अपने नाटक -मी तात्याराव बोलतो’ में प्रस्तुत करने की कोशिश की है। यहां मैं बता दूँ, नाटक की प्रस्तुति के पीछे मेरा उद्देश्य बहुत स्पष्ट है। अंग्रेज़ों के खिलाफ़ जिन क्रांतिकारियों ने भी देश की आज़ादी के लिये अपना योगदान दिया या, सज़ा पाई। वे हमारी विरासत का हिस्सा हैं। उनके बारे में वैचारिक टकराव, पूर्वग्रह या किसी अन्य ग्रंथी से जुड़े रहने की जगह उनके बारे में सही ढंग से जानना ज़रूरी है। मेरा यह भी मानना है कि हमें क्रांतिवीरों को राजनैतिक आग्रहों से उठकर, उनके योगदान की दृष्टि से समझने की ज़रूरत है। ऐसे मामलों में राजनीतिक प्रतिद्वन्दिता अपने निहित उद्देश्यों के लिये सच को नज़रअंदाज़ करने के साथ अपने काम की अलग परत चढ़ा देती है।
नाटक से पहले सीमित था मेरा ज्ञान: यह नाटक करने के पहले सावरकर के विषय में मेरा ज्ञान केवल इतना ही था कि सावरकर को कालापानी की सजा हुई थी और वे महात्मा गाँधी की हत्या के मामले में एक आरोपी रह चुके हैं। सावरकर के बारे में इससे ज्यादा मेरी कोई जानकारी नहीं थी। विगत दिनों अचानक वृहत् रूप से सावरकर के बारे में बहुत सी बातें होने लगी थीं। कोई उन्हें महान वीर और कोई देशभक्त बता रहा था तो कोई उन्हें माफीवीर और न जाने क्या-क्या कहकर अपने तर्क देने लगा था। बस यहीं से मुझे सावरकर के विषय में और अधिक जानने की इच्छा जागृत होने लगी थी। मैंने सावरकर की आत्मकथा “मेरा आजीवन कारावास” मंगाकर पढ़ डाली। फिर उनके विरोधियों की लिखी कुछ किताबें भी मैंने मंगाकर पढ़ी।
किताबों ने दिखाई मुझे राह: मुझे लगा,जो बातें किताबों में है और जो बातें विरोधी कह रहे हैं दोनों में कुछ भी साम्य नहीं हैं। दोनों अपनी-अपनी ठोस मान्यताओं के वशीभूत, अपने-अपने तर्क दे रहे हैं और आधी-अधूरी बातें कह रहे हैं। लेकिन सावरकर के समर्थकों और विरोधियों की किताबों में भी सावरकर की देशभक्ति और देश के प्रति निष्ठा कुछ और बयान करती मुझे दिखने लगी थी। विरोधी भी सावरकर की युवावस्था के विषय में भी आलोचना करते मुझे नहीं दिखाई पड़ते। आलोचना भी तर्क संगत कम और पूर्वाग्रह से ग्रसित मुझे ज्यादा दिख रही थी। तब मुझे लगा सावरकर को सही अर्थों में लोगों के सामने तटस्थ भाव से मुझे प्रस्तुत करना ही चाहिए।
दल विशेष से जुड़ने का खामियाजा: मुझे यह तो दिख रहा था कि सावरकर का हिन्दुत्व जब से एक राजनैतिक दल प्रमुखता से अपने प्रचार में लेने लगा था तभी से सावरकर एक पक्ष के लिए अप्रिय होने लगे थे। इससे पहले तक सावरकर की देशभक्ति और निष्ठा के प्रति कभी इतने प्रश्न नहीं उठाये गये थे। उन्हें माफीवीर और अंग्रेजों का मातहत कर्मचारी, और न जाने राजनैतिक द्वेष की वजह से क्या-क्या नहीं कहा जाने लगा। मेरे मन में सावरकर को जानने की जागृति उठने लगी थी कि सावरकर असल में थे क्या? उनकी क्या विचारधारा थी? देश की आजादी के विषय में वे क्या सोच रखते थे? बिना किसी को जाने समझे पहचाने पढ़े बिना, किसी पर ऐसे आरोप मढ़ देना तो ठीक नहीं है। फिर उन पर डाक टिकट क्यों जारी किया गया। संसद भवन में उनकी फोटो क्यों है। यह सब होते कोई कैसे किसी पर भी अनर्गल आरोप लगा सकता है। ऐसे अर्ध ज्ञान में तो लोग महात्मा गाँधी से लेकर भगवान राम तक की आलोचना कर जाते हैं। लेकिन तथ्यात्मक बातें हमेशा बिल्कुल अलग ही निकलती है।
20 वीं सदी के महत्वपूर्ण क्रांतिकारी: सावरकर को पढ़ते हुए मुझे यह लगने लगा था कि सावरकर 20 वीं सदी के शुरूआती दिनों के क्रान्तिकारियों में से सबसे महत्त्वपूर्ण क्रांतिकारी थे। उन्होंने लंदन में क्रांतिकारी संगठनों की स्थापना की थी। उससे भी अधिक 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम की विफलता के कारण नैराश्य में डूबे इस महान राष्ट्र को उसके शौर्य का अहसास दिलाने की उन्होंने पहली कोशिश की थी और सर् प्रथम अंग्रेजी शासन को उसके ही घर में घुसकर चुनौती दी थी।
कालापानी में सज़ा के वो 11 साल: सावरकर के आजीवन कारावास को पढ़ते हुए मुझे लगा कि हम कुछ दिन के लॉक डाऊन में घर की सुख सुविधाओं के बीच रहकर भी कितने कष्ट का अनुभव करने लगे थे। जबकि सावरकर ने तो सेल्युलर जेल में साढ़े सात फीट की काल कोठरी में लगभग 11 साल कैसे व्यतीत किये होंगे। उनकी पीड़ा को अनुभूत करने पर ही समझा जा सकता है कि कैसे कोई लंदन का पढ़ा लिखा नवयुवक सेल्युलर जेल में कालापानी की यातनाओं के बीच महीना भर भी कैसे गुजार पाया होगा? सावरकर ने कालापानी की यातना के बीच 11 साल कैसे निकाले होंगे। यह अनुभव करना भी किसी के लिए आसान नहीं होगा। कालापानी के कष्ट से मुक्ति के लिए यदि कोई राजनैतिक कैदी अपने बंदी कानून के अधिकार का उपयोग करते हुए माफीनामा लिखता है तो क्या वाह कुछ गलत करता है? जबकि राजनैतिक बंदी के लिए दयायाचिका ही एक मात्र कारावास की सजा से छूट का रास्ता बचता था। फिर सावरकर की माफीनामे की तुलना, भगत सिंह के माफी न माँगने से करना, बेतुका सा लगा।
मौत से ज़्यादा कठिन थी जेल की ज़िंदगी: जैसे सावरकर द्वारा कालापानी की सजा में बिताये गये दिनों का अपमान की नज़र से देखा जा रहा हो। मैंने अपने नाटक के माध्यम से यह बताने की कोशिश की है कि मौत से, सेल्युलर जेल की जिन्दगी ज्यादा कठिन थी। प्रेम में असफल होने पर भी कोई निराश प्रेमी खामख्वाह फाँसी लगा लेता है। मरना किसी के लिए मुश्किल नहीं है। देश के लिए जीना मुझे ज्यादा मुश्किल प्रतीत होता है। मेरे कहने का मतलब है कि देश के लिए मरकर अपनी जान देने से कहीं ज्यादा जरूरी है किसी देशभक्त का अपने देश के जीवित रहना। सावरकर कालापानी की यातनाओं के बीच जीवित रहने का यही प्रयत्न कर रहे थे।
फाँसी मिली होती तो माफ़ी न माँगते: मुझे लगता है कि सावरकर को भी यदि फाँसी की सजा मिली होती तो हो सकता था वे भी कभी माफी न माँगते। आखिरकार उन्होंने अपना जीवन, खाना-पीना त्याग कर समाप्त किया था। यह वह जेल में भी कर सकते थे। लेकिन उस समय उन्हें देश के लिए अपना जीवन ज्यादा महत्वपूर्ण लगा था। सावरकर एक बैरिस्टर भी थे केवल भावुक क्रांतिकारी नहीं थे वे और कानून के जानकार होने के कारण वे कानूनी रूप से भी अपने राजनैतिक बंदी जीवन का सारा अधिकार ब्रिटिश हुकूमत से चाहते थे तो इसमें गलत क्या था?
वीर के माफ़ी माँगने पर सवाल क्यों:
कुछ लोग वीर सावरकर की माफी पर प्रश्न उठाते हैं और यह कहते हैं कि सावरकर सेल्युलर जेल पहुँचते ही माफी माँगने लगे थे। इस पर भी मुझे अब आश्चर्य होता है कि उन्होंने अपनी बंदी जीवन के अधिकारों का केवल उपयोग ही तो किया था। यदि शुद्ध रूप से वे अपने लिए माफी ही माँग रहे होते तो 20 मार्च 1920 में उनकी याचिका पर उनके विचारों की असलियत की टोह लेने तात्कालिक गृह मंत्री कैडाक उनसे मिलने अंडमान नहीं पहुँचता। कैडाक ने अंडमान से लौटकर अपनी जो रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार को सौंपी थी; उसमें उसने साफ लिखा था कि “सावरकर की याचिका दया के लिए थी यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता कि उसने कोई खेद या पछतावा प्रगट किया है।” इसलिए मुझे लगता है कि सावरकर यदि ब्रिटिश सरकार के हितैषी होते तो उन्हें अपने जीवन के महत्वपूर्ण 14 वर्ष जेल में न बिताये होते।
सावरकर से ज़्यादा कष्ट में कौन था: उस दौर के किसी भी नेता को जो अंग्रेज़ों के विरूद्ध आन्दोलन कर रहे थे मुझे सावरकर से ज्यादा कष्ट में कहीं दिखाई नहीं पड़ते। तब भी उन्हें अंग्रेजो का हितैषी या माफीवीर कहा जाता है तब मुझे लगता है कि उस व्यक्ति को सप्ताह भर कालापानी के सेल्युलर जेल में रखकर नारियल की जटा से रस्सियाँ बंटवाई जाएं और कोल्हू में जोतकर तेल पिरवाया जाए। सावरकर निहायत भावुक व्यक्ति थे। वे पेरिस में रहते हुए अपने साथियों की भारत में गिरफ्तारी और लंदन में फाँसी से बहुत व्यथित रहने लगे थे और भावुकता में बहकर अंग्रेजों से बदला लेने इंग्लैण्ड पहुँच गये थे और 13 मार्च 1910 में लंदन में गिरफ्तार कर लिए गये थे।
जेल में लिखीं 6 हज़ार कविताएं: सेल्युलर जेल में सजा काटने वाले सावरकर ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने अपने नाखूनों से, कोयले, पत्थरों और कीलों से जेल की दीवारों पर छह हजार से अधिक कविताएं लिखीं थी। उन्हें वे रोज़ पढ़-पढ़कर याद करते थे। सावरकर ने ही 1857 की क्रांति को सर्वप्रथम भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम सिद्ध कर, अंग्रेजों की हताशा को और बढ़ा दिया था। इसलिए भी अंग्रेज उनसे सर्वाधिक रूष्ट थे और उन्हें जेल से मुक्ति के बाद भी, अंग्रेज़ी हुकूमत ने नज़र बंद रखा था। जहाँ गाँधी अपने अहिंसा के प्रयोग के विषय में सावरकर से विमर्श करने पहुँचते हैं और सावरकर उन्हें राष्ट्र के साथ यह प्रयोग न करने के लिए गाँधी को समझाते हैं कि आपके इस प्रयोग की कीमत राष्ट्र को चुकानी पड़ेगी। और बाद में होता भी यही है आजादी के नाम पर लाखों भारतीयों को अपनी जान और जमीन गंवानी पड़ती है। सावरकर अंग्रेजों की नस-नस पहचानते थे।
पहचान गये थे बंटवारे की नीति: अंग्रेजों की ‘फूट डालो राज करो’ नीति को सावरकर, इंग्लैंड में रहते हुए अपने दौर के सभी नेताओं से पहले पहचान गये थे। इसलिए वे अपनी युवावस्था में हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात करते थे लेकिन जब उन्हें देश का बंटवारा धर्म के नाम पर होना निश्चित दिखने लगा। तब सावरकर ने हिन्दुत्व की अपनी अलग अवधारणा बनाई और धर्म के नाम से बंटे देश में हिन्दुत्व पर विश्वास करने वाले लोगों को ही भारत में रहने का अधिकार देने की बात कहने लगे थे। भ्रम फैलाने वालों ने उन्हें मुस्लिम विरोधी बताकर, उनकी अवधारणा को साम्प्रदायिक कहना शुरू कर दिया था। उनकी स्पष्ट सोच यह थी कि भाईयों के बंटवारे के बाद सभी भाई अपनी-अपनी जगह में जाकर रहते हैं। धर्म के नाम से बंटे इस देश में एक बार धर्म के अनुसार, पूरी तरह से अदला-बदली हो जाती तो यह देश आज सुकून में होता या जो यहाँ रहना चाहते थे वे हिन्दुत्व की अवधारणा में विश्वास करने वाले लोग होते। वही इस देश में रह पाते तभी इस देश में स्थाई शांति बनी रह सकती थी। भले उनकी अवधारणा पर सवाल हों और वह प्रासंगिक न हो, परंतु उन्होंने यह बात तत्कालीन परिस्थितियों में कही थी।
हरेक भारतीय को जानना ज़रूरी: यह सब पढ़ने के बाद मुझे यह महसूस हुआ कि सावरकर के जीवन और उनके विचारों के बारे में हरेक भारतीय को जानना अवश्य चाहिये। इस संदर्भ मेरा नाटक “मी तात्याराव बोलतो” देश की आजादी के लिए की गई सावरकर की कोशिशों के पहलूओं को सामने लाने का प्रयास करता है। ये बात और है कि युवा दिनों में उनके किये गये राजनैतिक प्रयासों को नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है। इसलिए मैंने यह नाटक मंच पर प्रस्तुत करने का संकल्प लिया। लोगों ने इस नाटक को बेहद कौतुक के साथ देखा। नाटक खत्म होने के बाद पाँच मिनट दर्शकों ने तालियाँ बजाईं। नाटक देखने आए दर्शकों को इससे पहले सावरकर के बारे में सुनी-सुनाई बातें ही पता थीं। बहुत से लोगों ने नाटक देखने के बाद सावरकर को बकायदा पढ़ा। कुछ लोग जो सावरकर को पढ़कर नाटक देखने पहुँचे थे, उन्हें ताज्जुब लगा कि सावरकर के पूरे जीवन को कैसे कोई सवा घंटे के एकल अभिनय में दिखाया जा सकता है। बहुत से लोगों ने नाटक देखने के बाद सोशल मीडिया पर अपनी स्वप्रेरित प्रतिक्रियाएं लिखी। आगे पढ़िये –
इंदौर के अभिनव कला समाज में दो प्रेक्षागृहों का बदल रहा रंग-रूप

