होयसल कालीन नृत्य परंपरा जीवंत: कर्नाटक की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के पन्नों से लुप्त हो चुकी 12वीं-13वीं शताब्दी की होयसल कालीन नृत्य परंपरा एक बार फिर जीवंत हो उठी। इस परंपरा का विशिष्ट आयोजन हाल ही में बेंगलुरु के ‘गुरुकृपा नाट्यशाला’ द्वारा किया गया। ‘गीत सुंदरी नमन’ के शुभ अवसर पर यह आयोजन हुआ।
‘विचित्र चित्र नर्तन’ की अप्रतिम प्रस्तुति: इसमें प्रसिद्ध नृत्य इतिहासकार और शोधकर्ता डॉ. करुणा विजयेंद्र के गहन शोध पर आधारित ‘विचित्र चित्र नर्तन’ का नयनाभिराम मंचन किया गया। इस कार्यक्रम ने दर्शकों को मध्यकालीन कर्नाटक के वैभवशाली कला युग की सैर कराई। पढ़िये इस कार्यक्रम पर बेंगलुरू से रचनाश्री एम.एस. की सचित्र रिपोर्ट।-indorestudio.com
शोध और पुनर्रचना का संगम:यह कार्यक्रम केवल एक नृत्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि सदियों पुरानी विस्मृत परंपरा ‘सालगसूड प्रबंध नर्तन’ का एक ‘वैचारिक पुनर्निर्माण’ (Conceptual Reconstruction) था।
बेलूर के शिलालेख से हुई शोध की शुरूआत: डॉ. करुणा विजयेंद्र के शोध की शुरुआत 1998-99 में बेलूर के एक शिलालेख से हुई थी, जिसमें होयसल रानी शांतलादेवी को ‘विचित्र नर्तन’ में निपुण बताया गया था। उन्होंने प्राचीन शिलालेखों, मंदिर की मूर्तिकलाओं और शारंगदेव कृत ‘संगीत रत्नाकर’ जैसे ऐतिहासिक ग्रंथों को आधार बनाकर इस कला को पुनर्जीवित किया है। इस नृत्य शैली में प्राचीन कर्नाटक के गीत प्रबंध, वाद्य प्रबंध और नृत्य प्रबंध का अद्भुत समन्वय देखने को मिला।
तकनीकी बारीकियां और शिल्प: कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता इसका ‘आंगिकाभिनय’ रहा, जो पूरी तरह से शिलालेखों और होयसल मंदिरों की मूर्तिकला से डिकोड की गई गतिविधियों पर आधारित था।
शोध की गहराई का अंदाजा: डॉ. करुणा के शोध की गहराई का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें: # 216 प्रकार के ‘करणों’ (नृत्य की मूल इकाइयां) का प्रयोग किया गया। # 35-40 विशिष्ट ‘स्थानक’ (खड़े होने की मुद्राएं) प्रदर्शित की गईं। # 60-70 ‘चारी’ (पैरों की चाल) और 30 नृत्त हस्त के माध्यम से भावों को पिरोया गया। # प्रस्तुति को चार प्रमुख भागों-गीत गौंडली, मूक गौंडली, विचित्र नर्तन और चित्र नर्तन में विभाजित किया गया था।
शास्त्रीय संगीत और वेशभूषा (आहार्य): संगीत के पक्ष को सशक्त बनाने के लिए डॉ. रम्या सी.आर. के निर्देशन में दो मुख्य महिला गायिकाओं के साथ 10 विशेष वाद्य यंत्रों के समूह ने समां बांध दिया। कलाकारों की वेशभूषा और आभूषणों को स्वयं डॉ. करूणा विजयेंद्र ने ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर डिजाइन किया था, जिससे मंच पर साक्षात पाषाण प्रतिमाओं के जीवंत होने का भ्रम हो रहा था ।
प्रदीप कुमार ने किया शुभारंभ : कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि श्री परदीप कुमार (क्षेत्रीय निदेशक, ICCR) ने किया। अध्यक्षता प्रसिद्ध कुचिपुड़ी प्रतिपादक डॉ. वीणा मूर्ति विजय ने की। मंच पर मुख्य प्रस्तुति विदुषी, समुद्यता भट्ट और विदुषी समन्वित भट्ट के साथ उनके चित्र नर्तन कलाकारों ने दी। कार्यक्रम का संचालन श्रीमती शमा कृष्णा ने किया। श्रीमती कृष्ण प्रीथा रवि कुमार (क्यूरेटर) और श्रीमती रचनाश्री एम.एस. (ईवेंट कोऑर्डिनेटर) ने आयोजन की कमान संभाली।
नृत्य के विद्यार्थियों के लिए एक नई दृष्टि: विशेषज्ञों का मानना है कि ‘विचित्र चित्र नर्तन’ जैसा शोध आधारित प्रयास भारतीय शास्त्रीय नृत्य के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है। यह न केवल नृत्य के विद्यार्थियों के लिए एक नई दृष्टि प्रदान करता है, बल्कि कर्नाटक की खोई हुई पहचान को वैश्विक मंच पर पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। आप भी इस कार्यक्रम को ऑनलाइन देख सकते हैं – https://watch.rekard.com/
डॉ.करुणा विजयेंद्र शैक्षणिक और कला हस्ती: डॉ. करुणा विजयेन्द्र एक प्रतिष्ठित नृत्य इतिहासकार और शोधकर्ता हैं, जो वर्तमान में बेंगलुरु स्थित S-VYASA डीम्ड-टू-बी यूनिवर्सिटी में योग और मानविकी संकाय की डीन के रूप में कार्यरत हैं। इसके साथ ही, वे कैलिफ़ोर्निया स्थित एरिया यूनिवर्सिटी में भरतनाट्यम विभाग की विभागाध्यक्ष (HOD) भी हैं। उनकी अकादमिक उपलब्धियों में 7 पुस्तकें और 90 से अधिक शोध लेख शामिल हैं। विशेष रूप से, ‘रंगा वैभव’ नामक वृत्तचित्र—जो उनके शोध और PhD शोध-प्रबंध पर आधारित है—को कला और संस्कृति के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाले राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों के अंतर्गत दो ‘रजत कमल’ (Silver Lotuses) से सम्मानित किया गया है। डॉ. करुणा विजयेन्द्र ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन सेंसर बोर्ड की सदस्य के रूप में भी अपनी सेवाएँ दी हैं, और उन्हें राज्योत्सव तथा आर्यभट्ट पुरस्कारों सहित 30 से अधिक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। आगे पढ़िये – गुरू-शिष्य परंपरा के नये नियमों से कला जगत में खलबली https://indorestudio.com/guru-shishya-parampara-scheme-new-rules-controversy/

