सिने प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। गोवा के इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (Iffi-2025) में विधु विनोद चोपड़ा ने फिल्म ‘1942- ए लव स्टोरी’ के बारे में बहुत सी दिलचस्प बातें कहीं है। उन्होंने कहा कि इस फ़िल्म में रियल लव था! आज की फिल्मों के जैसा कारोबारी (commercial) नहीं। उन्होंने कहा, इसके संगीत से लेकर एक-एक शॉट लेने तक बड़ी मेहनत हुई है’। वे फेस्टिवल में आयोजित एक कन्वर्सेशन सेशन में पटकथा लेखक अभिजीत जोशी के साथ चर्चा कर रहे थे। इसका शीर्षक था- ‘Unscripted: The Art and Emotion of Filmmaking’
आर.डी. के संगीत ने रचा इतिहास: 35 साल पुरानी इस फ़िल्म के निर्देशक ने कहा – ‘मैं चाहता था कि संगीतकार आर.डी.बर्मन ही इसका म्यूज़िक बनायें। हालांकि तब लोग उनके बारे में कहने लगे थे कि अरे साब, उनका दौर चला गया! लेकिन जब उन्होंने ‘कुछ न कहो’ गीत की धुन सुनाई, तब मुझे लगा मेरा संगीत मिल गया। फिर 1942 के संगीत ने इतिहास रचा’! चोपड़ा ने कहा, मैं चाहता था कि आर.डी. बर्मन के संगीत में सचिन देव बर्मन के संगीत की आत्मा महसूस हो। आर.डी. ने पहले जो धुनें बनाईं थीं, वह मुझे बकवास लगी थीं। मगर कुछ दिन बात ही ‘कुछ न कहो’ से बात बन गई। फिर इसका संगीत यादगार बन गया।
असली परिंदों के लिये फेंके ब्रेड के टुकड़े: उन्होंने ‘1942’ के एक दृश्य के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा, मैं चाहता था कि पहाड़ की चोटी पर असली परिंदे उड़ते दिखाई दें। अपनी टीम को मैंने यह बात कही। उन्होंने पंछियों को बुलाने के लिये वहां ब्रेड के टुकड़े बिखेर दिये। रात के वक्त ब्रेड के टुकड़े बिखेरने वालों में जाने-पहचाने निर्देशक संजय लीला भंसाली भी हैं, तब वे हमारी टीम में थे’। आपको बता दें, फिल्म के गीत ‘प्यार हुआ चुपके से’ मैं पहाड़ पर उड़ते पंछी दिखाई देते हैं।
मेरी आँखें ख़ुशी से नम हो गईं: चोपड़ा ने कहा, मैंने जब फिल्म का 8k वाला रिस्टोर्ड वर्ज़न देखा, वही दृश्य देखकर मेरी आँखें ख़ुशी से नम हो गईं। बातचीत के सबसे भावुक पलों में कुछ ऐसी ही बात फिल्म की लेखिका 92 साल की कामना चंद्रा ने भी कही। वे निर्माता योगेश ईश्वर के साथ इस बातचीत में शामिल हुई। कामना चंद्रा जी विधु विनोद की सास भी हैं। उन्होंने कहा- ‘रिस्टोर्ड वर्ज़न देखते वक्त मुझे लगा जैसे मैंने ज़िंदगी में कुछ कर दिखाया है’।
मेरी फ़िल्में मेरे व्यक्तित्व का आईना: चोपड़ा ने कहा, उनकी हर फिल्म, उनके उस समय के व्यक्तित्व को आईना है। इस बात पर उन्होंने फ़िल्म ‘परिंदा’ का ज़िक्र किया। ‘जब मैंने ‘परिंदा’ बनाई थी, तब मैं गुस्से में रहा करता था। आप फिल्म में उस हिंसा को देख सकते हैं’। उन्होंने बताया कि परिंदा के डिस्ट्रिब्यूटर्स ने अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित के किरदारों को जिंदा रखने के लिए 11 लाख रुपये तक की पेशकश की थी, जिसे उन्होंने यह कहते हुए ठुकरा दिया कि “हिंसा, हिंसा को जन्म देती है।” आपको बता दें फ़िल्म परिंदा का क्लाइमेक्स भावनात्मक और ट्रैजिक है। इसमें अन्ना ेके गुंडे पारो (माधुरी दीक्षित) की हत्या कर देते हैं। इस बात से आक्रोशित करन (अनिल कपूर) अपने भाई किशन (जैकी श्रॉफ़) के साथ अन्ना के अड्डे पर पहुँचता है। अन्ना के गिरोह से उनकी जबरदस्त भिड़ंत होती है। लड़ाई में किशन, अपने भाई करन को बचाते हुए मारा जाता है।
चलो बदलाव के लिए ईमानदार बनें: ब्लॉक बस्टर ’12 वीं फ़ेल’ को उन्होंने अपने आस-पास के सामाजिक-राजनीतिक माहौल पर एक व्यक्तिगत प्रतिक्रिया बताया। उन्होंने कहा: “यह फ़िल्म मेरे लिए यह कहने का एक तरीका थी कि चलो बदलाव के लिए ईमानदार बनें। अगर मैं नौकरशाही का एक प्रतिशत भी बदल सकूं, तो यह काफ़ी होगा।” सत्र के दौरान, चोपड़ा ने बहुत सी मज़ेदार और भावुक यादें ताज़ा कीं। उन्होंने बताया कि कैसे फ़िल्म ‘खामोश’ लिखते वक्त वे एक छोटे से फ्लैट में छत से डायलॉग चिल्लाते थे।
कैश की जगह मिला 4 हज़ार का पोस्ट बांड: उन्होंने अपने राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के किस्से को भी दोहराया। उन्हें पुरस्कार के साथ 4,000 रुपए नकद मिलने की उम्मीद थी, लेकिन उन्हें आठ साल का बांड मिला। उन्होंने बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी के साथ इस पर हुई बहस को मज़ेदार अंदाज़ में सुनाया, जिस पर हॉल तालियों से गूंज उठा। एक अन्य मज़ेदार किस्सा अभिनेता जैकी श्रॉफ का था, जो रिहर्सल के दौरान गलती से गलत अपार्टमेंट में चले गए। उन्हें देखकर वहां मौजूद महिला घबरा गई, तब जैकी उन्हें फूल भेंटकर वापस लौटे।
स्वागत-सत्कार के साथ सम्मान: बातचीत का यह सेशन आख़िर में लोगों के सवाल-जवाबों से ख़त्म हुआ। इसकी शुरुआत में संयुक्त सचिव (फ़िल्म) डॉ. अजय नाग भूषण एम. एन. और फ़िल्म निर्माता रवि कोट्टाराक्कारा ने स्वागत-सत्कार किया। कोट्टाराक्कारा ने ‘परिंदा’ को एक “क्रांतिकारी फ़िल्म” बताया जिसने भारतीय सिनेमा की दिशा बदली। इनपुट और तस्वीरें पीआईबी गोवा। आगे पढ़िये- एक भूले हुई तहज़ीब का सफ़र थी फ़िल्म ‘उमराव जान’ – https://indorestudio.com/iffi-conversation-muzaffar-ali-shad-ali/









