डॉ. जफर महमूद, इंदौर स्टूडियो। साहित्यिक एवं सांस्कृतिक नगरी उज्जयिनी में 12 फरवरी से 30 जून तक जारी 139 दिवसीय विक्रमोत्सव के अंतर्गत लोक रंजन में भारतीय जनजातीय भाषाओं और बोलियों पर आधारित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन ने सुधी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। मालवी, अवधी, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, निमाड़ी, भीली एवं हाड़ोती बोलियों की मिठास की सुगंध पूरे समय कालिदास अकादमी के मंच से आती रही।
शुभारंभ और संचालन: कवि सम्मेलन का शुभारंभ सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के वरिष्ठ कार्य परिषद सदस्य राजेश सिंह कुशवाह, पुराविद् डॉ. रमण सिंह सोलंकी एवं साहित्यकार डॉ. हरीश कुमार सिंह ने सम्राट विक्रमादित्य के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन कर किया। संचालक कवि अशोक भाटी ने उज्जयिनी की महिमा और गुरु सांदीपनि की गौरव गाथा को उद्घाटित करने वाली पंक्तियों से कार्यक्रम की शुरुआत की। इसके बाद कवियों ने बोलियों में कविताएं सुनाईं।
मालवी (शशांक दुबे):
तीन काम में लोग होन के घणा मज़ा आय—
उठावना में बेठा बेठा दरी का तूँतड़ा उधेड़वा में,
ऑफिस में रोटी खावा के बाद दाँत कुरेदवा में,
ने टीवी पर मैच देखता टेम अपनी ज टीम के कोसवा में।
मेवाड़ी (राजकुमार बादल):
नेम ने निभाण राखी, पलकां ने ताण,
रियो मंगरा मे बण र फकीर थारी जै हो।
मुगलां री सेना ने नाकां चणा चबाय दिया,
हल्दीघाटी रा राता नैण थारी जै हो।
अवधी (अजय प्रधान):
मातु ज्ञान दायिनी हौ, श्रेष्ठ वरदायिनी हौ,
महा निरगुन का बनाय देत गुनिया।
साधन विहीन जानि मुंह बिचुकावत हैं,
ठुकराय चुकी हमका समूची दुनिया॥
मानस के तार झनकाय दो सितार जस,
अंग-अंग बाजि जाय, जइसे हरमुनिया।
वरद का अंचरा ओढ़ावौ मम शीश पर,
माई निज-सुत का उठाय लेव कनिया॥
छत्तीसगढ़ी (किशोर तिवारी):
राजिम म सोंढ़ूर पैरी महानदी के धार,
बइठे बम्लाई डोंगरगढ़ के सजे पहाड़।
शिवरी खल्लारी भोरम रतनपुर मल्हार,
राम के ममा गांव ल घेरीबेरी हे जोहार।
भीली (रतन प्रेमी):
कोसी आवों में आंबा तोळे!
मारो भायो ते सूवे रे खोळे!!
काई कोरों घोणो काळजो बोळे,
मारो भायो ते सूवे खोळे…
भोजपुरी (बादशाह प्रेमी):
मोबाइल जबसे जग में आइल बा,
एही में लोग सब भुलाइल बा।
शान से कान में सटे सबके,
हाथ हीलता मुंह बवाइल बा।
निमाड़ी (वीरेंद्र चौरे):
तंगई म तमन हमख पालयो कसो बाबूजी,
घर का अधधर छप्पर तमन नाख्यो कसो बाबूजी।
एक रोटी न एक कुर्ता म जिन्गी काटी बाबूजी,
एक रोटी ख पांच लेकरू म वाटी कसी बाबूजी।
मालवी (डॉ. विक्रम विवेक):
मालव-माटी पग पखारे,
जग में फैली परसिद्धि।
बड़ा गणपति लाडू देवे,
और आसीस माता हरसिद्धि॥
तो काल होण का काल,
ज्योतिर्लिंग महाकाल सरकार है।
अवंतिका उज्जैनी में,
आपको अभिनंदन बारम्बार है।
भारत की भाषाई आत्मा: भारत और भारतीयता से ओतप्रोत इस अनूठे अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में देश की भाषाई विविधता देखने को मिली। कवि अशोक भाटी की संचालन शैली ने पूरे समय श्रोताओं को बांधे रखा और आयोजन को गरिमा प्रदान की। आगे पढ़िये – विश्व कविता दिवस पर विशेष: कविता मनुष्यता की साझा विरासत https://indorestudio.com/vishva-kavita-diwas-manushyata-ki-sanjhi-virasat/

