
मीरा और दि डार्क गर्ल भी पुरस्कृत: कैटगरी में दिलीप हरनारायण दीक्षित की फीचर फिल्म ‘मीरा’ दूसरे नंबर पर रही, जबकि सिद्धुपूर्णा चंद्रा की ‘तारिणी’ तीसरे नंबर पर रही। इसी कैटगरी में निपुण धोलुआ की फिल्म ‘मुझे स्कूल नहीं जाना’ को स्पेशल ज्यूरी अवार्ड मिला। इंटरनेशनल कैटगरी में एनरिको सेलर की फिल्म ‘द डार्क गर्ल’ दूसरे नंबर पर रही। म्यूजिक वीडियो कैटगरी में ‘तोहोरा’ पहले नंबर पर रही, दूसरे नंबर पर ‘टेक यू थ्री’, जबकि ‘पोन्नियन सेल्वन’ तीसरे नंबर पर रही। भगत सिंह के जीवन के अंतिम पलों पर आधारित फिल्म ‘द लास्ट मील’ ने ऑडिएंश चॉइस अवार्ड अपने नाम किया। फिल्म का निर्देशन किया है केतकी पांडेय ने, जबकि फिल्म में इश्तियाक खान जैसे मंझे अभिनेता ने अपनी अदाकारी से लोगों का दिल जीत लिया।
एमपी के इन फिल्मकारों ने किया कमाल: स्टेट फोकस (मध्य प्रदेश) कैटगरी में रोहित पाटीदार की शॉर्ट फिल्म ‘पापी’ को बेस्ट शॉर्ट फिल्म का अवार्ड मिला, जबकि राघव परमार की ‘ए टेल ऑफ टू इंडियंस’ दूसरे नंबर पर रही. कनुप्रिया गुप्ता की फिल्म ‘आउटरे’ को स्टेट फोकस कैटगरी में स्पेशल ज्यूरी फीचर फिल्म का अवार्ड मिला। सागर के सरस्वती पुस्कालय और वाचनालय पर केंद्रित राहुल पांडेय की डॉक्यूड्रामा फिल्म ‘आद्या’ को स्टेट फोकस कैटगरी में बेस्ट डॉक्यूमेंट्री अवार्ड मिला। सागर दास की नर्मदा दूसरे नंबर पर रही, जबकि तीसरे नंबर पर रही शुभम नेवारे की डॉक्यूमेंट्री- 47′ 42 जीप्स ऑफ भोपाल।
आयोजन समिति ने जताया आभार: अवार्ड सेरेमनी में मुख्य अतिथि जाने-माने रंगकर्मी गिरिजा शंकर, विशिष्ट अतिथि राज्यसभा सदस्य अजय प्रताप सिंह के हाथों फिल्मकारों को ट्रॉफी प्रदान की गई। इंद्रावती नाट्य समिति के निदेशक और फिल्म फेस्टिवल के संयोजक नीरज कुंदेर सीधी ने स्थानीय लोगों का हृदय से आभार जताया। उन्होंने कहा कि तमाम चुनौतियों के बावजूद सीधी के लोगों की वजह से इतना बड़ा कार्यक्रम लगातार सफल होता आ रहा है। उन्होंने देश-विदेश से आए फिल्मकारों का भी धन्यवाद किया। वहीं, फेस्टिवल डायरेक्टर प्रवीण सिंह चौहान ने कहा कि सीधी जैसे छोटे शहर में इस तरह के आयोजन की कल्पना करना भी बेहद मुश्किल था। 5 साल पहले जब हमने इस फेस्टिवल की शुरुआत की थी, तब तमाम दिक्कतें थीं, आज भी कई तरह की चुनौतियां आती हैं, लेकिन वे ही हमें मांझती भी हैं।
क्षेत्रीय फिल्मकार कर रहे कमाल: तीसरे और अंतिम दिन जाने माने रंगकर्मी गिरिजा शंकर की अध्यक्षता में एक अहम सत्र का आयोजन हुआ। इस सत्र में विशेष वक्ता जाने-माने फिल्म पत्रकार और समीक्षक अजित राय ने कहा कि मुंबइया सिनेमा एक टापू है और ये हिंदुस्तानी सिनेमा का बेहद छोटा सा हिस्सा है। मुंबई के बाहर जो सिनेमा बन रहे हैं, खासकर क्षेत्रीय भाषाओं में, असल कमाल वही कर रहे हैं। अजित राय ने कहा कि फीचर फिल्म में भले ही हिंदुस्तानी सिनेमा पीछे हो, लेकिन डॉक्यूमेंट्री में भारत का सिक्का विश्व फलक पर बोलता है। उन्होंने दिल्ली के प्रदूषण पर राहुल जैन की फिल्म इनविजिबल डेमोंस का जिक्र करते हुए कहा कि इस फिल्म ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का नाम रौशन किया। ये फिल्म कांस फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गई और बर्लिन ने स्पेशल परमिट देकर बुलाया गया। अजीत राय ने कहा कि युवा फिल्ममेकर्स अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदुस्तानी सिनेमा का झंडा बुलंद कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि कैसे गिरिजा शंकर से मिलने के बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। जैसे चंद्रगुप्त को चाणक्य और विवेकानंद को रामकृष्ण परमहंस मिले थे, वैसे ही उन्हें बड़े नसीब से गिरिजा शंकर मिले।
प्रबंधन सहयोग के लिये जताया आभार: महोत्सव के संरक्षक इंजीनियर आर बी सिंह, डॉ. अनूप मिश्र और विवेक सिंह चौहान ने आयोजन में सहयोग के लिये सभी का आभार व्यक्त किया। महोत्सव के आयोजन में राजेश सिंह बब्बू ,जगत प्रताप सिंह, रचना राजे सिंह, नारायण तिवारी, गुड्डू आहूजा, विनोद वर्मा , पुष्पराज सिंह परिहार , दीपक गुप्ता जी, राम बुक्स, मोहित आनंद, अमित सोनी, शिवम सिंह, सनी मोटवानी, आशीष मोटवानी, सौरभ सिंह चंदेल, सतीश गुप्ता, रिंकू सिंह, सूर्यप्रकाश सिंह, नीरज सिंह चौहान, कनिष्क तिवारी, अभिषेक गुप्ता छोटू, विमल सिंह, गौरव अवधिया, संदीप चौरे, तमेका चक्रबर्ती, प्रमोद पाण्डेय, राकेश जायसवाल, मो अतीक अहमद, कुंदन वर्मा, सुनील चौधरी, सुनील भुर्तिया, नीलेश जायसवाल, अनुराग वर्मा चिंटू, संजीव श्रीवास्तव, कुंजेश परिहार, धीरज कचेर, अतुल सोनी, नीरज गुप्ता आदि ने विभिन्न स्तर पर अपना सहयोग दिया।

