हाल ही में जनवादी लेखक संघ के धज तले इंदौर में लेखक और कवि प्रो.विनोद डेविड के काव्य संग्रह- ‘खुद से जिरह’ का विमोचन हुआ। कार्यक्रम को अतिथि के रूप में वरिष्ठ कवि लीलाधर मंडलोई,साहित्यकार प्रमोद त्रिवेदी और कथाकार-चित्रकार प्रभु जोशी ने सम्बोधित किया। यह कविता संग्रह शायद विनोद डेविड के एकाकी चिंतन और दर्शन के खामोश पन्नों तक ही सीमित रह जाता। अगर संग्रह को पाठकों तक पहुंचाने का दायित्व प्रभु जोशी ना निभाते। विमोचन का कार्यक्रम क्रिश्चियन कॉलेज में संपन्न हुआ। क्रिश्चियन कॉलेज में उनके सुपुत्र डॉ.अमित डेविड प्राचार्य का पदभार संभाल रहे हैं। कार्यक्रम का संचालन रजनी रमण शर्मा ने किया। आभार प्रदीप कांत ने माना। यहां पढ़िये विनोद डेविड के इस संग्रह की ख्यात लेखक और साहित्यकार जीवन सिंह ठाकुर की समीक्षा। साथ में देखिये विनोद डेविड के जीवन और उनकी लंबी कविता ‘गुलगुता की यात्रा’ के विशेष वीडियो। आवाज़ और निर्देशन प्रभाकर मोरे का है। लंबी कविता का गायन संतोष अग्निहोत्री ने किया है। – संपादक, इंदौर स्टूडियो।
दर्शन और साहित्य के गंभीर अध्येता विनोद डेविड: यह आकस्मिक नहीं कि विनोद डेविड, अर्थशास्त्र के अनुशासन से गहरे जुड़े रहने के बावजूद दर्शन और समकालीन साहित्य के एक गंभीर अध्येता रहे हैं। हालांकि, वे अपनी नैसर्गिक-प्रकृति में एकान्त के वासी ही रहे हैं लेकिन, अपने उस एकान्त में उन्होंने स्वयम् को सृजन की निरन्तरता से बांधे रखा। आपातकाल के दौर में उन्होंने अभिव्यक्ति के संकट को व्यक्त करने वाली, एक लम्बी कविता, ‘बांझ-रात’ लिखी थी, जो लगभग ‘अंधेरे में’ की तरह की एक फन्तासी ही थी और उसका ‘नेशनल स्कूल आफ ड्रामा’ के राजेन्द्र गुप्त ने मंचन भी किया था। लेकिन, हिन्दी में, जैसा कि चलन है, उन्हीं कृतियों को सिर आंखों पर लिया जाता रहा है, जिसे समीक्षा के किसी अधिपति ने अभिषेकित कर दिया हो। विनोद डेविड ने इसको लेकर कभी कोई क्षोभ प्रकट नहीं किया और अपने ढंग से कविता-कर्म करते रहे।
प्रभु जोशी के आग्रह पर ढूंढी कविताएं: पिछले दिनों प्रभु जोशी के आग्रह पर उन्होंने अपनी कविताएं ढूंढ-ढांढ कर प्रकाशन के लिए दीं और इस बात को जानते हुए कि हिन्दी कविता अपनी वैचारिकों से मुक्त नहीं हो पाई है। वे अपनी तरह की कविताएं लिखते रहें हैं। कुंवर नारायण उनके प्रिय कवियों में से है और वह भी इस वजह से कि उनकी कविता में, ‘वादों’ का आतंक नहीं है। वैसे, विनोद डेविड अपनी दृष्टि में ‘प्रतिबद्ध’ व्यक्ति हैं और, वे सात्र के उस ‘ईमानदार सन्देह’ को सामने रखते हैं, जिसके चलते उन्होंने अपने जीवनानुभव अपने ‘परिवेश’, ‘समय’ और ‘समाज’ के सचों को लगातार, सन्देह से देखा।
हिन्दी काव्य चेतना में ईसाई रचनाकार : कहना न होगा कि हमें यह आश्चर्य से भरता है कि हिन्दी की ‘काव्य-चेतना’ में, ईसाई समुदाय से कोई रचनाकार नहीं आया। कहानी में मात्र एक राबिन शॉ पुष्प को छोड़कर, ईसाई समुदाय से एक भी कथाकार नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में एकाध नाम सुनाई दिया लेकिन विनोद डेविड आधी सदी से कविता में सक्रिय हैं और मध्यप्रदेश के दो वित्त आयोगों के सदस्य रह चुके हैं। कविता के वे गंभीर पाठक बने रहे हैं और अपने ही ‘पोयटिक-ब्रूडिंग’ में, उन्होंने कविता को एक ऐसे तीसरे गवाह के रुप में रखा, जो उनके भीतर के चिन्तन के द्वैत का द्वन्द्व परखता है।
इलियट की तरह ‘बीज शब्द’ संदेह : पश्चिम के दर्शन के अध्येता होने की वजह से वे यह जानते हैं कि धर्म ने आन्तरिक जीवन को किस तरह नियोजित किया, मध्ययुगीन योरप को तो ‘क्रिस्तानिस्तान’ कहा जाता था, सारा योरप ईश्वर पर विश्वास करता था। टी.एस. इलियट की चर्चित कविता ‘दि वेस्टलैण्ड’ की भावभूमि ही एक संदेह की ‘बीजशक्ति’ है। विनोद डेविड की कविता का भी ’बीज शब्द’ सन्देह है – जो एक ‘विश्वास’ की अनवरत खोज में है, जो ‘मिथक’ से भी रुबरु होता है। एक किस्म के ‘निरीश्वरवाद’ के भीतर से भी कवि गुजरता है। वह कहता है – ‘स्वयम् मैं, बार-बार त्याग देता हूँ। ईश्वर को – दूर बहुत दूर, उससे निरन्तर भागता रहता हूँ, उससे, कभी चाहते हुए, कभी न चाहते हुए।’
अपने ‘आत्म’ से ‘युद्धरत’ कवि : विनोद जी का कवि ‘रुपकात्मकता’ के सहारे, कभी मिथकीयता के आवरण को उतारने की चेष्टा में, अपने ‘आत्म’ से, ‘युद्धरत’ रहता है। अंग्रेजी कविता में, डिकिन्सन और येट्स, अपने-अपने ढंग से, रहस्य को वेध्य बनाते हैं। एमिली डिकिन्सन, जब ईसा मसीह द्वारा पुनर्जीवन दान का या मृत्यु का प्रभाव उत्पन्न करना चाहती हैं, तो वह मरते-घुटते, जड़ीभूत होते हुए, मनुष्य होने की, उसके स्वत्व को अविष्कृत करने की कोशिश करती है। येट्स की कविता को याद कीजिए, ‘बाइजेण्टियम’ को। वे विभीषिका और उसके वर्तमान को भी देखते हैं, विनोद डेविड भी कहते है – ‘बेतरतीब गलियों में/सफेद कपड़े पहने कुछ लोग/दोनों हाथों से/नोटों की गड्डियां उछाल रहे हैं/बगल में जवान लड़कयां दबाये, अंधेरे में/नंगे चमकदार चाकू लिये/एक दूसरे के पीछे/हिंसक भेड़िये, झुण्ड में दौड़ते हैं। कविता अपने रचाव में, एक निरन्तर कविता है, जो चतुर्दिक यथार्थ के पीछे के यथार्थ को प्रश्नांकित करती है। ‘आबादी के बीहड़ में, एक अजीब सन्नाटा है, और आदमी अब/केवल अपनी पहचान गिरोह से बनाता है।’
दार्शनिक अवसाद के ‘पीड़ाग्रस्त’ प्रश्न : वह समय को केवल राजनीतिक घटनाचक्र या परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में ही नहीं देखते, बल्कि, एक दार्शनिक के जरुरी अवसाद में ‘पीड़ाग्रस्त’ प्रश्न की तरह देखते हैं। क्षण जो समय से परे नहीं, समय में ही है, समय जो इतिहास है, क्षण जो समय में प्रवेश कर इतिहास का विभाजन करता है, अनंत के समय में प्रवेश का वह क्षण, यह एक किस्म के आत्म से सम्वाद की स्थिति है जिसमें कवि खुद कभी आकुल व्याकुल तो कभी हताहत भी होता है। वह कहता है – ‘मृत्यु के पश्चात जीवन की निरन्तरता एक भ्रम है। एक निर्मूल कल्पना।‘ वे स्वीकारते हैं कि उनके आत्म की भिड़न्त गढ़न्त या विखण्डन, जो भी है, वह ‘बाइबिलिक सत्य’ से नत्थी है, लेकिन उसी में अवस्थित नहीं। हो सकता है, ‘सन्देह’ का कारण मेरा ‘अल्पज्ञान’ है, लेकिन अल्पज्ञान पर मेरा विश्वास और उस विश्वास पर, भी सन्देह। यह उनकी कविता का ‘आत्मीय’प्रत्यय’ भी है।
एक अलभ्य आध्यामिकता की कविताएं : प्रभु जोशी ने इन कविता के बारे में अपनी टिप्पणी दी है, जो पुस्तक में ब्लर्ब के रुप में छापी है, उसके यहां इस टिप्पणी में उल्लेख से भी विनोद डेविड की कविता को एक अलग कोण से समझने की सहूलियत देती है। प्रभु जोशी ने लिखा कि ‘ये कविताएं, विरल-सृजन चेष्टा का कदाचित पहला उदाहरण है, जब हिन्दी के काव्यानुभव के आलोक में, एक नई द्युति को जोड़ने की कोशिश है। इनमें कोई धार्मिकता नहीं, बल्कि एक अलभ्य आध्यात्मिकता है। जो, समकाल के संदेह से हर सत्य को विखण्डित करता है। यह भीतर से बाहर का प्रयाण नहीं है, बल्कि अन्दर के ‘अन्दर-घनमथन’ को निथारने की काव्य प्रखिधि है।’
जीवन के हाहाकार से ध्वनित काव्य : इन दिनों, जबकि ‘फण्डामेण्टलिज्म’, पुरा-कथा के पात्रों को कठपुतली की तरह अपने राजनीतिक हित में नचा रही है, और उसे एक छदम-इतिहास बोध की तरह, रख रही है। ऐसे में विनोद डेविड का कवि ‘बाईबिलिक-सत्य’ को टी.एस. इलियट की तरह संदेह से देखता है। यह अमानवीयता से ‘आत्म संघर्ष’ है। विनोद डेविड की कविता, एक आत्म प्रज्ञा की प्रतिज्ञा को प्रकट करती है और, अपने आयविकता में भी, पद्य के परम्परागत अनुशासन की अवमानना नहीं करती, बल्कि उसे सहेजती है। अंत में यही कहना होगा कि हम एक कवि मन को जीवन के उत्तरार्द्ध के भी अखिरी हिस्से में जिवेषणा से भरा पाते है। वहां प्रेम भी है,अध्यात्म भी है और वह सब है जो जीवन के हाहाकार से ध्वनित होता है। उम्मीद की जाना चाहिए कि विनोद डेविड, जो कि इस समय एक औपन्यासिक कृति पर काम कर रहे हैं- वह क्राइस्ट के जीवन को मनुष्य की तरह चित्रित करने वाली पहली कृति होगी। मेरी शुभकामनाएं, यह पुस्तक उन्होंने अपनी हाल में दिवंगत पत्नी पुष्पा डेविड को समर्पित की है।

