|
Getting your Trinity Audio player ready...
|
हर साल इक्कीस मार्च को यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व कविता दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य केवल कवियों का सम्मान नहीं, बल्कि उस संवेदना की आदिम परंपरा का सम्मान करना है जिसे दुनिया कविता के नाम से जानती है। कविता किसी भी भाषा और संस्कृति की जीवित परंपरा है, जो निजी सीमाओं को पार कर मनुष्यता की सार्वभौमिक सीमाएं रचती है। आइये इस संबंध में जानते हैं – विशिष्ट मीडिया एवं शोध संस्थान, इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर, दिल्ली के वरिष्ठ संपादक लोकमित्र गौतम के विचार।
लोकमित्र गौतम के अनुसार, लिखित भाषा से पहले भी कविता थी—गुनगुनाहट, लोक गान, मंत्र, लय और छंद के रूप में। कविता भाषाओं की आत्मा को बचाए रखने का अंतिम उपाय है। राजनीति जहां सीमाएं खींचती है, वहीं कविता पुल बनाती है और एक देश का कवि दूसरे देश के प्रेम, संघर्ष और दर्द को सहजता से समझता है।
तकनीक और उपभोक्तावाद ने सोचने का समय कम कर दिया है, लेकिन कविता आज भी मनुष्य को मनन और मंथन का अवसर देती है। यह कहना कि कविता किसी विचारधारा से मुक्त होनी चाहिए, आधा सच है। इतिहास गवाह है कि कविता समाज को दिशा देती है, आंदोलनों को गति प्रदान करती है।
नस्लवाद, स्त्री अधिकार, शांति और पर्यावरण जैसे विषयों पर कविताएं जन चेतना का स्रोत बनी हैं। कविता व्यक्तिगत स्तर पर भी अवसाद से बचाती है और जीवन के प्रति दृष्टिकोण को दृढ़ करती है। इसका संकल्प हमेशा आंतरिक होता है।
‘कविता’ अपने आप में सम्पूर्ण है, लेकिन ‘विश्व कविता’ सीमाओं से परे का अनुभव देती है। यह केवल किसी एक संस्कृति की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझी चेतना का प्रतिनिधित्व करती है। अनुवाद के माध्यम से यह अलग-अलग संस्कृतियों के अनुभवों का आदान-प्रदान करती है। विश्व कविता का अर्थ है कि उसके सरोकार वैश्विक हों जैसे जलवायु संकट, युद्ध, शरणार्थी जीवन और मानव अधिकार। यह केवल कलात्मकता नहीं, बल्कि साझी मनुष्यता की बात करती है।
लोकमित्र एक लेखक ही नहीं वे एक खुद एक कवि भी हैं, वे कहते हैं, विश्व कविता के तीन आयाम है। पहला सार्वभौमिकता, इसमें प्रेम, मृत्यु, पीड़ा और आशा जैसे भाव हर संस्कृति में होते हैं। दूसरा सह-अस्तित्व यानी अलग परंपराओं के बावजूद मनुष्य की मूल आकांक्षा साझी होती है और तीसरा कर्तव्य जो हमें याद दिलाता है कि हमारा दायित्व केवल अपने समाज तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी मानवता तक फैला है।
इस नज़रिये से रवींद्रनाथ टैगोर की कविता “जहां मन भय से मुक्त हो” विश्व कविता का आदर्श प्रस्तुत करती है। यह कविता स्वतंत्रता, सत्य और मानवता के उस स्वप्न लोक की ओर संकेत करती है जहां संकीर्ण दीवारें टूट जाती हैं और मनुष्य निरंतर विस्तृत विचार और कर्म की ओर अग्रसर होता है। चलिये पढ़ते हैं रवींद्रनाथ टैगोर की ये कविता।
टैगोर की इस कविता का शीर्षक है – जहां मन भय से मुक्त हो।
जहां मन भय मुक्त हो और सिर ऊंचा रहे
जहां ज्ञान स्वतंत्र हो
जहां संसार संकीर्ण घरेलू दीवारों से टुकड़ों में न बंटा हो
जहां शब्द सत्य की गहराई से निकलते हों
जहां अथक प्रयास पूर्णता की ओर अग्रसर हो
जहां तर्क की निर्मल धारा
मृत आदतों की नीरस रेगिस्तानी रेत में विलीन न हो
मेरे पिता, मेरे देश को उस स्वतंत्रता के स्वर्ग में जागृत करो
जहां मन तुम्हारे द्वारा
निरंतर विस्तृत विचार और कर्म की ओर अग्रसर हो
(प्रस्तुति: इंदौर स्टूडियो। )

