शकील अख़्तर,इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर एनएसडी,#nsd दिल्ली के सम्मुख सभागार में नाटक ‘वो’#woh पहला कामयाब शो देखने का अवसर मिला। यह तस्वीरें इसी शो की हैं। युवा और प्रतिभाशाली कलाकार #राहिल_भारद्वाज निर्देशित इस नाटक में #बोरनाली_बोराह ने बेहद सशक्त अभिनय किया है। नाटक का हिन्दी अनुवाद इंदौर के वरिष्ठ अभिनेता,निर्देशक #आशीष_कोतवाल ने किया है।
मूल रूप से मराठी में *’ती’* नाम से यह नाटक /#विक्रम_भागवत जी ने लिखा है। वे एक जाने-पहचाने पटकथा और नाटककार हैं। सवा घंटे का यह नाटक कब ख़त्म हो जाता है, पता नहीं चलता। जबकि मंच पर अकेले बोरनाली बोराह ही होती हैं। वे नाटक में अपने पात्र को इस तरह से जीवंत कर देती हैं, कि नाटक का पूरा घटनाक्रम,दृश्य और बाक़ी किरदार भी मंच पर नज़र आने लगते हैं। दर्शकों को लगता है कि मंच पर ..सर जी, अभिजीत या इंस्पेक्टर जाधव जैसे पात्र मौजूद हैं, हालांकि वो है नहीं !
नाटक में बोरनाली एक ऐसी स्त्री की मनोदशा को जीती है जो 20 साल से पति के उत्पीड़न और यौन हिंसा का शिकार है। उसके अंदर आक्रोश इस कदर बढ़ता है कि एक दिन वो अपने पति यानी सर जी का मर्डर कर देती है। मगर जब तक वो नहीं चाहती, इस राज़ को खुलने नहीं देती। नाटक में पीड़ित पत्नी का किरदार इतना बड़ा हो जाता है कि वह एक सशक्त और भाव प्रवण अभिनेत्री की मांग करने लगता है। इस दृष्टि से बोरनाली अपने किरदार के साथ काफी हद तक न्याय करती हैं। वे एनएसडी की उन नई महिला कलाकारों में हैं जिन्होने अपने काम से अलग पहचान बनाई है। बेशक इसका श्रेय राहिल भारद्वाज के सधे निर्देशन और कसी स्क्रिप्ट को जाता है। हालांकि राहिल नाटक की सफलता का श्रेय बड़ी विनम्रता से अपनी कलाकार को देते हैं। मंच पर उन्होंने आंचल शर्मा के सहयोगी पात्र को भी जगह दी है, जो स्क्रिप्ट से हटकर मंच के लिये अविष्कृत है। यह पात्र कहीं शेड की तरह है कहीं पर मंच संचालन की आसानी के लिये।

राहिल रंगमंच और सिनेमा के विशेषज्ञ और गुरु सुरेश भारद्वाज के सुपुत्र हैं जो पिता की रंग परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। हमारी उन्हें बहुत शुभकामनाएं। एक बहुत अच्छे और यादगार दिन उन्होंने यह बड़ी शुरुआत की है। यहां मैं कहना चाहूंगा कि अनुवादक के रूप में आशीष कोतवाल ने हिन्दी को मराठी की एक उत्कृष्ट नाट्यकृति दी है। उन्हीं के शब्दों में, ऐसी स्क्रिप्ट हिन्दी में नहीं के बराबर है। बड़ी बात यह है कि वयोवृद्ध लेखक विक्रम भागवत जी ने उन्हें भावानुवाद की पूरी आजादी दी। ताकि मराठी की जगह हिंदी को अपनी तर्जुमानी मिल सके। उम्मीद है इंदौर के दर्शकों को भी जल्द हिन्दी में यह नाटक देखने को मिलेगा।

