अपने ‘क्रियेशन’ के वक्त कहीं गुम हो जाते थे अरुण- मीना पांडेय

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शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। ‘पेटी भर कविताएं। कविताओं की कई डायरियां, रजिस्टर। हाथ से लिखे नाटक। जतन से जुटाई गई किताबें। प्रॉपर्टी और कॉस्ट्यूम के बक्से। यही सब थी अरुण जी की दुनिया। अपने ‘क्रियेशन’ के वक्त वे अक्सर कहीं गुम हो जाते थे’। प्रख्यात नाट्य निर्देशक, लेखक और पत्रकार स्व.अरुण पांडेय को याद करते हुए यह बात उनकी पत्नी श्रीमती मीना पांडेय ने कही। उनसे यह बातचीत जबलपुर के राइट टाउन में मौजूद उनके निवास पर हुई। उनके घर पर मैं ख्यात रंग हस्ताक्षर अनिल रंजन भौमिक के साथ पहुँचा था। ‘विवेचना’ जबलपुर के नाट्य समारोह में शामिल होने की वजह से यह स्वाभाविक ही था कि हम अरुण जी के घर पर जाते। संयोग से यह बातचीत उसी समय हुई। इस दौरान श्रीमती मीना पांडेय जो कुछ कह रही थीं, वह तो बहुत कम था, लेकिन जो वो नहीं कह रही थीं, वो बहुत ज़्यादा। वह सब मैं उनकी आँखों में देख और पढ़ सकता था। यहां तक कि मैं उनकी आँखों में ‘अरुण पांडेय’ जी को देख सकता था! मीना और अरुण जी का साथ कॉलेज के ज़माने से रहा। 1985 में शादी हुई। मगर उससे पहले 7 साल तक  ‘कोर्टशिप’ रही। अरुण जी ने ग्रेजुएशन के साथ ड्रामा में कोर्स किया और मीना जी ने एमएससी,बीएड किया। मीना जी ने कहा – ‘शादी से पहले से ही मुझे पता था कि अरुण का मन थियेटर में रमता है। वो बुलाते थे और मैं नाटक देखने जाती थी। डरा हुआ आदमी, जुलूस जैसे नाटक मैंने उस वक्त ही देखे थे। तब वे नाटकों में अभिनय किया करते थे’।तो क्या कभी आपने भी स्टेज पर एक्टिंग की? मीना जी बताने लगीं- ‘दो बार ऐसा मौका आया जब मैंने उनके नाटकों में अभिनय किया। वो नाटक रहे- ईसुरी और हानूश। असल में ईसुरी में 7-8 लड़कियां काम कर रही थी। अरूण जी के प्ले में पहली बार इतनी लड़कियां काम कर रही थीं। इस नाटक में 30 से ज़्यादा कलाकार थे। अरुण ने कहा, इसमें तुम भी रोल कर लो। लड़कियों के परिजनों में थोड़ा ‘कॉन्फिडेंस’ रहेगा। शो के लिये शहर से बाहर जाना पड़ा तो पेरेंट्स में उनकी बच्चियों को लेकर भरोसा रहेगा। उनकी ये बात मुझे ठीक लगी। हालांकि लड़कियों की मौजूदगी के हिसाब से मेरी ज़रूरत नहीं थी, लेकिन अरुण की बात मान ली। इसमें मैंने ज़मीदार की पत्नी और दूसरी भूमिकाएं निभाईं थीं’।मीना जी याद कर रही थीं – ‘हानूश में मैंने, हानूश बने नवीन चौबे की पत्नी ‘कात्या’ की भूमिका अदा की थी लेकिन केंद्रीय विद्यालय में टीचर होने की वजह से मेरे लिये नाटकों में लगातार काम करना आसान नहीं था। हमें साल में 8 केज़ुअल लीव मिलती थी। नाटक के एक-दो शो होने के साथ ही दो-तीन छुट्टियां ख़त्म हो जाती थी। ज़ाहिर है मेरे लिये छुट्टियां मैनेज करना भी आसान नहीं था। मैंने इनसे कह दिया – मेरी जॉब के हिसाब से थियेटर नहीं हो सकेगा। टीचिंग के जॉब के अलावा घर की ज़िम्मेदारियां भी थीं। अरुण ने भी इस बात को समझा’।लेकिन आपकी वजह से जीवन की गाड़ी और अरुण जी की रचनात्मक यात्रा आसानी से चल सकी’। मेरे यह कहने पर मीना पांडेय ने कहा – ‘हां, सेंट्रल गवरमेंट की जॉब थी तो कभी परिवार या बच्चों के किसी काम में कोई दिक्कत नहीं आई। सब काम ठीक से चलता रहा’। आज दोनों बच्चे अपनी जगह अच्छे हैं। बेटा उत्कर्ष पांडे जर्मनी में है, वो विप्रो में पदस्थ हैं। बेटी, यांका पांडे हैदराबाद में हैं, वे एक साफ्टवेयर आर्किटेक्ट हैं’।   क्या कभी दोनों में किसी बात पर कोई अनबन हो जाती थी…? ‘हाँ हुई ना’…तब, जब अरुण अपने काम में इतने मसरूफ हो जाते थे कि वो घर-परिवार से पूरी तरह से कट जाते थे। नाटक ‘तुम निर्भय जो सूर्य गगन में’ जब तैयार हो रहा था, तब काफी दिनों तक वो अपने काम में ही गुम गये थे। एक वक्त ऐसा आया जब बात करना भी कम हो गया था। तब उनसे स्वाभाविक रूप से मैंने लड़ाई की – लेकिन बाद में समझ में आया कि इस नाटक का निर्माण ही बेहद कठिन था, वह मुक्ति बोध का लिखा काव्य नाटक था। उसे मंच पर प्रस्तुत करना आसान नहीं था। उसकी प्रोसेस ही ऐसी थी जिसने अरुण जी को उनके ‘क्रियेशन’ (सृजन) में पूरी तरह से डुबा दिया था। धीरे-धीरे मेरी ये बात समझ में आई। लेकिन शुरू में लगता था कि अभी-अभी शादी हुई है। कहीं जाना है, घर-परिवार के काम है- हमें भी तो वक्त मिलना चाहिये’!..कोई ऐसा नाटक जिसे उन्होंने एकदम ख़ुशी से बनाया हो, बिना तनाव के? ... ‘वो नाटक ईसुरी था… बुंदेलखंड के लोकप्रिय कवि पर आधारित’। मीना जी कहने लगीं- ‘वो नाटक बड़े उत्साह के साथ तैयार हुआ। बुंदेलखंड की परंपराओं और संगीत पर आधारित यह एक शोधपूर्ण नाटक था। एक तरफ वे नाटक लिखते जा रहे थे- उसका संगीत तैयार होता जा रहा था, कलाकार जु़डते जा रहे थे। दूसरी तरफ उन्हें ईसुरी के बारे में जो भी जानकारियां चाहिये थीं, वो मिलती जा रही थीं। सागर से उन्होंने बहुत सी जानकारियां मंगवाईं थीं। मतलब रिसर्च से लेकर ड्रामा कंस्ट्रक्शन तक सब बड़ी आसानी से होता गया! जबकि मुक्ति बोध वाले नाटक का संगीत तैयार करना भी बड़ा कठिन काम था।’मीना जी ने याद किया- अरुण ने एक दर्जन से ज़्यादा नाटकों में अभिनय किया। 50 के करीब नाटकों का निर्देशन। उनके लिखे ‘तुम निर्भय जो सूर्य गगन में, निठल्ले की डायरी, और अंत में प्रार्थना, देख तमाशा लकड़ी का’ जैसे नाटक छपे। ‘ईसुरी, मैं नर्क से बोल रहा हूं’ आदि नहीं छप सकें। उन्होंने नाटक भी 12 से अधिक लिखे। उनकी प्रतिभा कई स्तरों पर रही’। बातचीत के बीच मीना जी ने मुझे अरुण जी का कहानी संग्रह भेंट करते हुए कहा – ‘ये देखिये उनका कहानी संग्रह ‘स्नो मंकी को पिज्जा मत खिलाओ’…इस संग्रह की शीर्षक कहानी, Amway से जुड़े उनके एक परिचित से मुलाक़ात के बाद लिखी थी। उनका वो दोस्त कई दिनों से Amway के बारे में उन्हें बताना चाहता था। एक दिन वो घर पर आया, काफी बातें हुईं। फिर वो चला गया। उसी रात उन्होंने ये कहानी लिख दी’।  अरुण जी के रचनात्मक सफ़र में बहुत से साथियों का योगदान रहा होगा? वे बनारस से यहां आये। कॉलेज के दिनों से विवेचना से जुड़े और एक दिन ‘विवेचना’ के सम्मानित निर्देशकों में से एक बन गये। मीना जी ने कहा – ‘अलखनंदन जी का उनपर बहुत प्रभाव रहा, उनसे उन्होंने सीखा, प्रेरणा मिली। मगर अलख जी, आलोक चटर्जी, राजकुमार कामले, गंगा मिश्रा आदि भोपाल के भारत भवन चले गये। इसके बाद उन्होंने ‘विवेचना’ में निर्देशन की बागडोर मज़बूती से संभाली। हिमांशु राय जी से उनकी ख़ासी बनती थी। दोनों ने थियेटर के कई अच्छे प्रोजेक्ट्स किये। वो अरुण जी की रचनात्मकता को समझते थे। हालांकि कभी-कभी अरुण की कल्पना के मुताबिक, चीज़ों को जुटाने में परेशान भी होते थे – लेकिन अरुण उन्हें किसी तरह मना लेते थे’।मीना जी ने आगे कहा, ‘जब तक ‘विवेचना’ दो भागों में नहीं बंटा था। तब तक उन्हें हिमांशु राय जी का साथ मिलता रहा। उनकी यात्रा में मुख्य सहयोगी रहे – नवीन चौबे, सुयोग पाठक, मुरलीधर नागराज और कमलेश श्रीवास्तव। चित्रकार अवधेश बाजपेयी और विनय अंबर ने सैट और वर्कशॉप डिज़ाइन करने में हमेशा सहयोग करते रहे। वैचारिक सहयोग राकेश दीक्षित से मिलता रहा। आशुतोष द्विवेदी एक मज़बूत सहयोगी के रूप में हमेशा साथ खड़े रहे। दोस्तों में सीताराम सोनी, तपन बनर्जी का साथ बना रहा। ज्ञानरंजन जी से हमेशा सहयोग, प्यार और आर्शीवाद मिलता रहा। मीना जी ने कहा- ‘उनके छोटे भाई विवेक पांडेय, उनकी पत्नी प्रगति पांडेय, संतोष राजपूत, मनीष तिवारी और अंलकृति श्रीवास्तव ‘विवेचना’ के मज़बूत स्तंभ बनकर उनके साथ खड़े रहे’। उन्होंने कहा, ‘अरुण जी की एक ख़ासियत और रही। वे लोगों की प्रतिभा को पहचान कर उन्हें अपने साथ जोड़ लेते थे, उनका सहयोग लेते थे। उनके छोटे भाई विवेक पांडेय ‘विवेचना’ की गतिविधियों को काफ़ी समय से आगे बढ़ा रहे हैं। संजीवनी नगर में वो रहते हैं, वहीं छत पर रिहर्सल होती है। नाट्य निर्देशन और साहित्यिक गतिविधियों के अलावा अरुण जी पत्रकारिता में रहे। कैसा रहा 80 के दशक से सन 2010 तक का उनका वो दौर?  मीना जी ने कहा- ‘अरुण जी ने कॉलेज के बाद ‘ज्ञानयुग प्रभात’ को जाइन कर लिया था। यहीं से उनकी पत्रकारिता का सफर शुरू हुआ। मैं कहूंगी कि पत्रकारिता में भी उनका रचनात्मक और कलात्मक पक्ष प्रबल रहा। वे अपने लेआउट और नये प्रयोगों के लिये जाने जाते थे। उन्हें अगर काम करने की आज़ादी मिलती तो वे कुछ अलग कर दिखाते थे। वो रायपुर  ‘नव भास्कर’ में भी रहे। वहां भी उनके काम की प्रशंसा हुई। जिन दिनों वे नव भास्कर में थे। वहां से चिट्ठियां लिखा करते थे। उन्होंने वहां से एक कविता भी लिखकर भेजी थी। इसके बाद मीना जी ने एक काग़ज़ अरुण जी की लिखी और रायपुर से भेजी गई ‘चिड़िया’ नाम की वही कविता, हमें लाकर दिखाई। मेरे आग्रह पर उन्होंने उसे पढ़कर सुनाया। उनके कविता पढ़ते वक्त मैंने वीडियो बना लिया। वह वीडियो आप नीचे दिये लिंक को क्लिक कर आप देख सकते हैं। मीना जी ने कहा, उन्होंने मेरे लिये बहुत सारी कविताएं लिखी। पेटी भर कर। पेटी बड़ी नहीं छोटी है! आज भी उनकी कई डायरियां मौजूद हैं। उनके हाथ के लिखे काग़ज़ हैं, रजिस्टर हैं।…

शाम ढलने को थी और हमें ‘विवेचना नाट्य समारोह’ में शामिल होने जाना था। हमने मीना जी से इजाज़त माँगी, चलने को हुए… मीना जी ने कहा, आप लोग भोजन लिये बिना जा रहे हैं। जब मैं आप लोगों के लिये चाय बना रही थी। तब खयाल आ रहा था, अरुण जी घर से किसी को खाना खाये बिना जाने नहीं देते थे और आप लोग दिल्ली से आये और फिर भी बिना खाना खाये जा रहे हैं, अच्छा नहीं लग रहा। ….मगर हमें जाना ही था। हमारा जाना और अरुण जी की यादों का मीना जी की आँखों में आकर ठहर जाना, एक बार फिर मैं देख सकता था! भारी मन से अनिल दा और मैंने विदा ली – दिली दुआओं के साथ! नीचे वीडियो लिंक पर देखिये, मीना पांडेय की सुनाई और अरुण जी की लिखी कविता ‘चिड़िया’https://www.youtube.com/shorts/ZZJYNB-nCFE

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