विवेचना के ‘कला महोत्सव’ को जिसने देखा, देखता ही रह गया!

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हिमांशु राय, इंदौर स्टूडियो। ‘विवेचना’ जबलपुर का ये 50 वां साल है। 1975 की 1 मई को ‘विवेचना’ का पहला नाटक हुआ था। तब से 50 साल पूरे होने तक की यह यात्रा शानदार रही है। पचासवें साल के अवसर पर 2 नवंबर से 9 नवंबर 2025 तक विवेचना का ‘कला महोत्सव’ रामपुर में मौजूद ‘तरंग ऑडिटोरियम’ में मनाया गया। कला महोत्सव में विचार के साथ परफॉरमेंस: इस बार महोत्सव में व्याख्यान, गायन और नृत्य के कार्यक्रम हुए और हमेशा की तरह राष्ट्रीय नाट्य समारोह भी। राष्ट्रीय नाट्य समारोह में दिल्ली, मुंबई, पुणे, भोपाल के पाँच थियेटर ग्रुप्स ने अपने चर्चित नाटकों की प्रस्तुति दी। इनका चयन हमेशा की तरह सोच-समझकर किया गया। ‘तरंग प्रेक्षागृह’ में महोत्सव के लिये प्रतिबद्ध दर्शकों के साथ मध्यप्रदेश विद्युत परिवार की कंपनियों और अनगिनत सहयोगियों का साथ मिला। दिवाली से शुरू हुई ‘तरंग’ को सजाने की तैयारी: पचासवें साल में कला महोत्सव के निर्णय के साथ ही विवेचना के साथियों ने जमकर तैयारियां शुरू कर दी थीं। ऑडिटोरियम को सुंदर तरीके से चिन्टू स्वामी ने सजाया। दीवाली के समय जाकर चिन्टू और एडी (अजय धाबर्डे) बहुत सा सजावट का सामान ले आये।‘तरंग’ के परिसर को करीने से सजाया गया: तरंग इतना भव्य है कि उसे सजाना मुश्किल होता है मगर चिन्टू स्वामी ने कर दिखाया। गेट से सीढ़ियां तक रेड कारपेट बिछाया गया। तब तक भेड़ाघाट से कलाकार पुरूषोत्तम आ गये। उन्होंने कैम्पस के बीचो-बीच खूब बड़ी रांगोली बना दी। सुरेश पेन्टर ने तरह-तरह के होर्डिंग, फ्लैक्स से पूरा खाली पन भर दिया। चित्रकला प्रदर्शनी बनी नया आकर्षण: इस बार का एक नया आकर्षण था- ख्यात चित्रकार अवधेश बाजपेयी की चित्रकला प्रदर्शनी। अवधेश, आदित्य रूसिया और दोस्तों ने मिलकर कला प्रदर्शनी को परिसर के एक हिस्से में अच्छी तरह से सजा दिया। परिसर में ही अजय यादव और ‘रीड ऑन रेन्ट’ की पुस्तक प्रदर्शनी लगाई गई। दोनों ही जगहों पर कला रसिकों और साहित्य प्रेमियों की ख़ासी भीड़ रही। रंगीन बत्तियों से जगमगाया परिसर: इस बार गुड्डा (जगदीश यादव) ने पूरे तरंग में हैलोजन, झालर और रंगीन लाइट्स लगाकर जगमगा दिया। चिन्टू ने चढ़कर तरंग के ऊपर से लाइट और रंगीन पर्दे लगा दिये। चारों ओर लगे पेड़ों में लाइट लगी थी। गेंदे के फूल और मालाएं से सजावट की गई। पूरा परिसर जगमगाने लगा।2 नवंबर से प्रारंभ हुए कार्यक्रम: 2 नवंबर की सुबह विवेचना के अभिभावक स्व. शरत् चन्द्र तिवारी के नाम पर बनी सड़क का लोकार्पण भव्य आयोजन के साथ हुआ। शाम को 7 बजे वैज्ञानिक वक्ता अमिताभ पांडेय का व्याख्यान हुआ। विषय बहुत चर्चित था ‘आदम का सफर-अफ्रीका से आसमान तक’। इस व्याख्यान को जिसने भी सुना, प्रभावित हुआ। श्री जानकी बैंड की मंत्रमुग्ध प्रस्तुति: 3 नवंबर को तरंग के भव्य ऑडिटोरियम में नाट्य लोक सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था, जबलपुर के श्री जानकी बैंड ने अपनी प्रभावशाली प्रस्तुति के साथ दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस सांगीतिक प्रस्तुति की परिकल्पना, संयोजन दविन्दर सिंह ग्रोवर द्वारा किया गया। संगीत निर्देशन डॉ. शिप्रा सुल्लेरे का रहा। कार्यक्रम में लोक एवं काव्य रचनाओं पर आधारित गीतों की श्रृंखला प्रस्तुत की गई। श्रोता गीतों को गुनगुनाते हुए बाहर निकले। कथक नृत्य की सम्मोहक प्रस्तुति: 4 नवंबर मंगलवार को कथक नाद अकादमी, जबलपुर के द्वारा शालिनी खरे व उनकी शिष्याओं के द्वारा कथक नृत्य की सम्मोहक प्रस्तुति दी गई। शालिनी अंतरराष्ट्रीय ख्यात प्राप्त कलाकार हैं और उन्होंने देश में कथक के कई नृत्य कार्यक्रम दिये हैं। समारोह में उन्होंने अपनी टीम के साथ नयनाभिराम प्रस्तुति दी। कथक की विविध मुद्राओं से परिचय: कार्यक्रम में शालिनी खरे ने कथक की विविध मुद्राओं से दर्शकों का परिचय कराया। अपनी प्रभावशाली प्रस्तुति के साथ दर्शकों को मंत्र मुग्ध कर दिया। राधा कृष्ण रास और होली के साथ अपने प्रदर्शन को समाप्त किया। इसमें राधा कृष्ण और गोपियों की होली और कृष्ण की शरारतों ने सब का मन जीत लिया। 5 नवंबर से शुरू हुआ नाट्य समारोह: विवेचना के राष्ट्रीय नाट्य समारोह का यह 31 वां साल है। नाट्य समारोह का उद्घाटन देश के वरिष्ठ हास्य कलाकार और स्टैंड अप कॉमेडी के जनक के. के. नायकर ने किया। उन्होंने अपने भाषण के दौरान दर्शकों को खूब हंसाया भी। नायकर साहब जबलपुर के सबसे सीनियर थियेटर आर्टिस्ट भी रहे हैं। रंगमंच के प्रति उनकी दिलचस्पी का इसी बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उन्होंने सभी नाटकों को हर दिन देखा और उसपर अपने सजग विचार रखे। यह संयोग ही कहा जायेगा कि उन्होंने तरंग में सभी नाटकों को दिल्ली से आये साथी शकील अख़्तर के साथ देखा और उनके साथ प्रस्तुतियों पर हँसते-हँसाते, विचार-विमर्श करते रहे।

बिछुड़े साथियों की स्मृति में समारोह: नाट्य समारोह में सबसे पहले इस साल बिछुड़े साथियों का स्मरण किया गया। इस साल विवेचना के अति प्रिय आनंद सिन्हा, शरत् चन्द्र तिवारी, डॉ. गोपाल पोल, आलोक चटर्जी, सीताराम सोनी और अरूण पांडेय हमारा साथ छोड़ गये। इन सभी का विवेचना के नाट्य सफर में सुदीर्घ और यादगार साथ रहा है।4 कहानियों की प्रस्तुति ‘मालगुडी डेज’: पुणे की ‘स्वतंत्र थियेटर’ की टीम पहली बार जबलपुर आई। इस नाट्य दल ने  ‘मालगुडी डेज़’ के मंचन की 22 वीं प्रस्तुति दी। आर. के. नारायण के ‘मालगुडी डेज’ में 32 कहानियां हैं। नाटक की रूपांतरकार और सह-निर्देशक धनश्री हिबलीकर और निर्देशक अभिजीत चौधरी ने किया है। उन्होंने प्रस्तुति के लिये 4 कहानियों को चुना और उन्हें नाटक में बदला। पहली कहानी में ‘पोस्ट मैन’ का संवेदनशील चित्रण है जो इस नाटक की एक सर्वाधिक प्रशंसित, अभिनय से सशक्त प्रस्तुति रही। नाटक का कल्पनाशील निर्देशन और लेखन बड़ी ख़ूबी है। टकराव और दोस्ती का मनोरंजक प्रसंग: ‘मालगुडी डेज़’ में प्रस्तुत दूसरी कहानी में राजम और मणी है। इसमें पुलिस वाले के लड़के और एक बदमाश बच्चे में टकराव और दोस्ती का मनोरंजक प्रसंग है। तीसरी कहानी ‘चार रूपये’ है। इसमें चार रूपये के लिए एक आदमी कुएं में कूदने का तैयार हो जाता है। चौथी कहानी ‘फादर्स हेल्प’ है। इसमें स्वामी नाम का चुलबुला बच्चा सिर दर्द का बहाना बनाकर स्कूल नहीं जाता है। इसमें स्वामी की करतूतों का मनोरंजक चित्रण है। बाल भूमिकाओं ने नाटक को बनाया रोचक: नाटक के सैट ने मालगुडी के ग्रामीण जीवन को मंच पर जीवंत कर दिया। किशोर उम्र के कलाकारों ने बच्चों की भूमिकाओं में नाटक को बहुत रोचक बना दिया। बड़ों को बच्चा बनाने के लिए वेशभूषा और मेकअप का सुंदर प्रयोग किया गया। नाटक में संगीत मालगुडी की याद दिलाता रहा। इसी नाम से बने सीरियल के कारण इस नाटक का नाम सुनते ही देखने की इच्छा होती है। यद्यपि नाटक और फिल्म या सीरियल की तुलना संभव नहीं है। क्योंकि माध्यम अलग-अलग हैं। नाटक में किशोरों और युवकों ने बच्चों की भूमिकाएं अद्भुत तरीके से निभाईं और मंचन अविस्मरणीय बन गया। सपना बन चुकी दुनिया की सैर: ‘मालगुडी डेज़’ के माध्यम से दर्शकों ने मंच पर एक ऐसी दुनिया की सैर की जो अब सपना बन चुकी है। नाटक श्रोताओं को अतीत के उस दौर में ले जाता है जब छोटे-छोटे शहर होते थे- जिनमें बहुत सरल, सहज संबंध होते थे। बच्चों की शरारतें इस नाटक की आत्मा हैं। जो दर्शकों को अपने बचपन में ले जाती हैं। विशेष रूप से पोस्ट मैन अश्विन शर्मा, मणि प्रेम गौड़ा, कुएं में कूदने वाला कुशल शहाने, सायाली राव बहुत देर तक गुदगुदाते हैं। छोटे बच्चों में विहान और कमाक्षी ने अपने रोल में यादगार अभिनय किया। थियेटर लैब की प्रस्तुति श्रीमान चोर’: विवेचना के समारोह में डारियो फो का प्रसिद्ध नाटक ’द वर्चुअस बर्गलर’ का हिन्दी अनुवाद ‘श्रीमान चोर’ खेला गया। इसे मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय थियेटर लैब के युवा रंगकर्मियों ने प्रस्तुत किया। इसका निर्देशन जाने माने अभिनेता इश्तियाक खान ने किया है। मुम्बई में इश्तियाक खान इस नाटक में अभिनेता रहे हैं। मज़ेदार और दिलचस्प है यह नाटक: एक चोर एक घर में चोरी करने पहुंचता है। तभी उसकी पत्नी का फोन आ जाता है। चोर और उसकी पत्नी के बीच चुटीले संवाद होते हैं। फिर मकान मालिक और उसकी प्रेमिका का प्रवेश होता है। चोर छुप जाता है और उनकी कारस्तानी देखता है। नाटक बार-बार मज़ेदार मोड़ लेता है। मकान मालिक की पत्नी आती है तो लगता है कि कुछ सरकी हुई है। वो कविताएं सुनाती हैं। नाटक अच्छे हास्य के साथ समाप्त होता है। नाटक मज़ाक-मज़ाक में समाज के अंदर स्त्री-पुरूष संबंधों की पर्तें खोलता है। अब किसका पति या पत्नी आयेगी: नाटक में हंसते-हंसते कौतुहल बना रहता है कि अब किसका पति या पत्नी या आ जाएगी? दर्शकों ने इस नाटक का खूब आनंद लिया। नाटक मूलतः यूरोपीय पृष्ठभूमि का है। डारियो फो के नाटकों में पात्र कुछ अलग ही तरह से व्यवहार करते हैं। ये बात एक्सीडेंटल डेथ ऑफ एन एनार्किस्ट के ‘मेनियाक’ में भी दिखाई देती है।सधा हुआ निर्देशन और अभिनय: नाटक में सैट भी आकर्षक था। निर्देशन और अभिनय दोनों बहुत सधे हुए थे। संवाद बहुत चुस्त थे। नाटक में कुल 6 पात्र थे और सभी ने अपने चरित्रों को बखूबी निभाया। नाटक के संवाद दर्शकों को लगातार गुदगुदाते रहे। निर्देशक ने अभिनेताओं से स्वाभाविक अभिनय करवाया और दर्शकों को हंसाने के लिए अतिरेक करने से परहेज किया।ग़ालिब की 653 वीं प्रस्तुति: ‘ग़ालिब इन न्यू दिल्ली’ नाटक पीरोज़ ट्रुप दिल्ली ने मंचित किया। इसके लेखक और निर्देशक डॉ. एम. सईद आलम हैं। यह इस नाटक की 653 वीं प्रस्तुति थी। सन् 1997 से यह नाटक मंचित हो रहा है। सईद आलम ने विवेचना के समारोह में पिछले साल ‘अकबर द ग्रेट नहीं रहे’ से धूम मचाई थी। सईद आलम को अकबर या ग़ालिब के बहाने अपनी बात कहने में महारत हासिल है। सीधा व्यंग्य चुभता है। मगर सईद आलम हंसी-हंसी में वो बातें कह जाते हैं जो आजकल आमतौर पर कहने की हिम्मत बहुत कम लोगों के पास है। सईद आलम बख़ूबी कहते हैं अपनी बात: ग़ालिब हों या अकबर हों सईद आलम को अपनी बातें कहना है। और क्या खूब कहते हैं। इस तरह की न जाने कितनी कहानी, नाटक और व्यंग्य लिखे गये हैं जिनमें कोई इतिहास का चरित्र यदि वर्तमान में जी उठे तो वो कैसा व्यवहार करेगा ? ग़ालिब यदि आज दिल्ली आ जाएं तो क्या हो ? उन्हें दिल्ली और दिल्ली वासी कैसे लगेंगे ? इस नाटक में गालिब दिल्ली आते हैं तो ऑटो वालों से दो-चार होते हैं, एक बिहारी छात्र के साथ रूम शेयर करते हैं, उनकी मकान मालकिन उनसे बुरा व्यवहार करती है। कोई गालिब को जगजीत सिंह के नाम से पहचानता है तो कोई ग़ालिब सीरियल के नाम से। पर ये बात अहम नहीं है। सईद आलम इसी दौरान अपने संवादों से न केवल खूब हंसाते हैं बल्कि अपने राजनैतिक व्यंग्य से दर्शकों के दिमाग़ को ठकठकाते चलते हैं। यही उनकी सफलता है।हर शो होता है एकदम नया: सईद आलम का नाटक और उनके संवाद लगातार बदलते रहते हैं और इसीलिए उनका हर शो नया होता है। उनकी ख़ूबी है कि 7 बजे के शो के लिए वो 3 बजे दिन में भी यदि कोई घटना घटी हो तो उसे भी नाटक में अपने अंदाज़ में कवर कर लेते हैं। इस तरह नाटक को प्रासंगिक बना देते हैं। यही उनकी सफलता का राज है। उनका व्यंग्य, हंसी के इंजेक्शन से लगाया जाता है। ‘ग़ालिब इन न्यू दिल्ली’ ने लोगों को जी भर कर हंसाया। मगर हर दर्शक समझ रहा था कि चोट कहां हो रही है। बिना सैट, बिना संगीत, नृत्य के केवल चुटीले संवादों और गालिब के सवालों से दो घंटे तक दर्शक बंधे रहे।चेखव की कहानियों पर ‘आपस की बात’: समारोह में अंक मुंबई ने नाटक ‘आपस की बात’ प्रस्तुत किया। यह प्रस्तुति चेखव की कहानियों पर आधारित थी। चेखव की कहानियां में मजेदार स्थितियां रहती हैं। इन कहानियों का मंचन दिनेश ठाकुर किया करते थे। अब प्रीता ठाकुर माथुर यह दायित्व संभाल रही हैं। अलग-अलग रंग की कहानियां: चेखव की चार कहानियों को उन्होंने कहानी मंचन के लिए चुना था। चारों कहानियां एक-दूसरे से अलग हैं। और उन्हें अलग-अलग ही प्रस्तुत किया गया। कहानियां को भारतीय परिस्थितियों में प्रस्तुत किया गया। पहली कहानी, मिली और मालकिन में, मालकिन अपनी नौकरानी मिली से बात करते हुए उसे मज़दूरी लूटने की कोशिश करती है और बाद में उसे अन्याय को सहने नहीं, उसका विरोध करने की सीख देती है।औरतों को फंसाने वाला आदमी: दूसरी कहानी -‘औरतों को फंसाने वाला आदमी में’ सुमित निखिल की पत्नी को फंसाने के लिए निखिल का इस्तेमाल करता है। तीसरी कहानी ‘पानी में डूबने वाला आदमी में’ एक अनजान आदमी समुद्र तट पर प्रकट होता है, जो कुछ पैसे कमाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर लेखक को मनोरंजन बेचना चाहता है। चौथी कहानी ‘एक दिन बैंक में’ एक अनजान महिला कुछ पैसे ऐंठने के लिए बैंक में घुस जाती है और तूफान खड़ा कर देती है।कमाल का अभिनय और निर्देशन: मंच पर प्रीता माथुर ठाकुर, अमन गुप्ता, शंकर अय्यर, रवीश कुमार, गौरव कुमार, अक्षांश और अस्मिता ने विविध भूमिकाएं निबाहीं। नाटक में सैट, मेकअप, प्रापर्टी सामान्य थे। अपने अभिनय और निर्देशन के कमाल से इस प्रस्तुति को कलाकारों ने रोचक बना दिया। इस नाटक को हाल ही में फिर से तैयार किया गया है। यह इसका चौथा मंचन था। अभी इस प्रस्तुति पर और श्रम किए जाने की जरूरत है।मोबाइल ऑन कर  देखिये नाटक ‘मैडबेथ’: ‘मैडबेथ’ मंच पर पीछे की ओर लाल प्रकाश है। तीन लाल पर्दे लहर के रूप में पीछे हैं। इनमें खून की नदी बह रही है। मंच पर एक कुर्सी है। एक ओर कुछ दूर पर एक गिटार एक स्टैंड पर रखा है। साधारण वेशभूषा में एक पात्र प्रवेश करता है। और दर्शकों को कहता है कि अपने मोबाइल ऑन कर लीजिये। जी भरकर फेस बुक, व्हाट्स एप वगैरह देखिये। बातें करिये। आपके सामने ‘मैडबेथ’ पेश हो रहा है। दर्शकों को नाटक से जोड़कर प्रस्तुति: तेज संगीत के बीच हाथ पैर फेंकते हुए ‘मैडबेथ’ पेश होता है। ये फुग्गेदार पेंट के ऊपर एक चुन्नट वाला कोट पहने हुए है। वो दर्शकों से बात करना शुरू करते हैं। कभी मंच से कूद कर दर्शकों के बीच पंहुच जाते हैं। तो कभी मंच पर वापस आ जाते हैं। हॉल की लाइट चालू रखी गई है। दर्शकों को लगातार व्यस्त रखा जा रहा है। उनसे ताली बजवाई जा रही है। ताली बजाने के निर्देश दिये जा रहे हैं। दर्शक खेल का मज़ा ले रहे हैं।नाटक देखने आई युवती नाटक की क्वीन:  ‘मैडबेथ’ शेक्सपियर के नाटक ‘मैकबेथ’ के संवाद बोलते हैं फिर अपने आप से कहते हैं कि कैरेक्टर में वापस आओ। बीच में जाकर दर्शकों के बीच से एक युवती को मंच पर ले आते हैं और उसे क्वीन बना देते हैं। कुछ देर बाद फिर जाकर दूसरी पंक्ति में बैठे एक बुजुर्ग दर्शक- तिवारी जी को किंग का ताज पहनाकर मंच पर ले आते हैं। उनसे तरह-तरह का अभिनय करवाते हैं। नाटक देखने आये और अब कलाकार बने तिवारी जी बढ़िया परफार्म करते हैं। दर्शकों को दोस्त बना लेते हैं रूपेश: ‘मैडबेथ’ अचानक गिटार उठाकर गाने बजाने लगते हैं। नाचने लगते हैं। दर्शकों को अपने साथ ले लेते हैं। दर्शकों से दोस्ती हो जाती है। वो लगातार मज़ेदार हरकतें करते हैं। ये रूपेश टिल्लू हैं। नाट्य समारोह के अंतिम दिन शेक्सपियर के नाटक ‘मैकबेथ’ ने ‘मैडबेथ’ बनकर पूरे तरंग हॉल में खूब धमाल मचाया। रूपेश ने इस नाटक को फिजिकल कॉमेडी नाम दिया है जिसे उन्होंने सार्थक कर दिया। रूपेश टिल्लू ने विदेशों में मंचन से इस नाटक की शुरूआत की है। यह एकल नाटक है। उन्हें इस नाटक के लिये अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली है। नाटक में क्लाउन टेक्नीक और माइम टेक्नीक का उपयोग किया जाता है। इसमें लाइव सिंगिंग है। यह नाटक ‘मैकबेथ’ की मूल कथा से जुड़ता है। रूपेश सत्ता की लालसा को एक जोकर की तरह प्रस्तुत करते हैं और यह बताते हैं कि यह कितनी हास्यास्पद हो सकती है। मैडबेथ’ एक ऐसा मज़ेदार अनुभव: ‘मैडबेथ’ एक ऐसा मज़ेदार अनुभव है जहां दर्शक इतिहास के क्रूर और विक्षिप्त किरदार के साथ खिल-खिलाकर हंसते हैं। ‘मैडबेथ’ सबसे मज़ेदार, हाज़िर जवाब और अनोखे अंदाज़ में हंसाता है। शो बहुत दिलचस्प और मनोरंजक है। इसमें हास्य, मजे़दार संवाद और गजब की फुर्ती देखने का मिलती है। यह ऐसा नाट्य प्रयोग था जो बरसों याद रखा जाएगा। इस नाटक की परिकल्पना, डिजायन और लेखन रूपेश टिल्लू का ही है। इसमें उनका साथ दिया रोहित ने और लाइट तथा मैनेजमेंट का काम देखा अभिषेक नारायण ने। नाटक कारवां मुम्बई और रेडनोज़ मुम्बई ने प्रस्तुत किया। रिकार्ड संख्या में दर्शकों की रही भागीदारी: किसी भी आयोजन की सफलता दर्शकों की भागीदारी से संभव है। विवेचना के नाट्य समारोह में हर नाटक को देखने के लिये रिकार्ड संख्या में दर्शक पहुँचे। इस दृष्टि से भी यह नाट्य समारोह ऐतिहासिक रहा। इसमें दर्शकों की संख्या भरपूर रही। दर्शकों ने पूरे महोत्सव को खूब पसंद किया। हमेशा की तरह बहुत से दर्शकों ने पहले से ही सीज़न टिकट खरीदे। जो छूट गये, वे टिकट काउंटर पर टिकट लेते नज़र आये। नाटकों के दोबारा प्रदर्शन की ख़्वाहिश: रामपुर का तरंग प्रेक्षागृह, शहर से कुछ दूर है, इसके बावजूद नाट्य प्रेमी देश भर से आये नाट्य दलों के रंगमंच को दिलचस्पी से देखने पहुँचे। हर अच्छे दृश्य पर कलाकारों को दर्शकों ने दाद दी। नाटक के बाद कलाकारों से मिलकर ख़ुश हुए। उनके साथ तस्वीरें खिंचाईं। एक स्थानीय दर्शक उस्मान ने कहा कि ‘ग़ालिब इन न्यू दिल्ली और श्रीमान चोर’ इस बार के श्रेष्ठ नाटक रहे’। उन्होंने इन नाटकों के दोबारा प्रदर्शन की ख़्वाहिश ज़ाहिर की। कुछ ने इन दोनों नाटकों के साथ ही ‘मैडबेथ और मालगुडी डेज़’ की जमकर सराहना की।
आमंत्रित किये गये कला क्षेत्र के अतिथि: विवेचना की 50 वीं वर्षगांठ के महोत्सव में इस बार रंगमंच के क्षेत्र में अपनी-अपनी तरह से योगदान दे रहे हस्ताक्षरों को भी विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। इनमें कला गतिविधियों पर केंद्रित वेबसाइट ‘इंदौर स्टूडियो’ के माध्यम से ‘थियेटर जर्नलिज़्म’ को नई पहचान देने वाले श्री शकील अख़्तर, ख्यात रंग-निर्देशक इलाहाबाद के श्री अनिल रंजन भौमिक और भिलाई से आये वरिष्ठ रंगकर्मी सर्वश्री मणिमय मुकर्जी और शक्तिपद चटर्जी शामिल रहे। इन सभी का विवेचना की तरफ़ से अभिनंदन किया गया। अनिल रंजन भौमिक विवेचना के नाट्य समारोह में अपने निर्देशित नाटकों को भी प्रस्तुत करते रहे हैं। वे एक सदस्य की तरह ही विवेचना की नाट्य गतिविधियों में अपना सहयोग देते रहे हैं। 50 वर्ष पूरे होने पर विशेष कवरेज: उल्लेखनीय यह भी है कि indorestudio.com के संस्थापक-संपादक शकील अख़्तर ने विवेचना के 50 वर्ष पूरे होने पर समारोह की शुरूआत से ही विशेष रिपोर्ट्स लिखीं। वे अपने स्तर पर देश के कला जगत तक इस ऐतिहासिक घटना को देश के रंगकर्मियों तक, एक ‘डिजिटल लिन्किंक ब्रिज’ रूप में पहुँचाना चाहते थे। विवेचना पर लिखी गई उनकी रिपोर्ट्स देश के थियेटर ग्रुप्स के साथ ही अमेरिका में हिन्दी रंगमंच से जुड़े अप्रवासी भारतीयों ने भी पढ़ी। विवेचना के 50 साल के सफर पर मेरा एक विशेष लेख ‘विवेचना के 50 साल’ इंदौर स्टूडियो के माध्यम से पाठकों तक पहुँचा। इसके साथ ही स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं और सोशल मीडिया ने भी कला महोत्सव और नाट्य समारोह पर हमेशा की तरह बहुत-सी समीक्षाएं और रिपोर्ट्स प्रकाशित की। हमने इस अवसर पर विशेष रूप से एक ब्रोशर का भी प्रकाशन किया।    मंचित नाटकों पर हुई परिचर्चा: नाट्य समारोह में हर नाटक के मंचन के पश्चात दूसरे दिन नाट्य परिचर्चा आयोजित की गई। इसमें निर्देशक और अभिनेताओं से बातचीत और सवाल-जवाब हुए। परिचर्चा बहुत उपयोगी रही। हर नाटक का बारीक विश्लेषण हुआ और गुण-दोषों पर चर्चा हुई। इसमें भी विवेचना के प्रमुख साथियों के साथ ही आमंत्रित अतिथियों की हिस्सेदारी रही। नाट्य निर्देशकों ने उनके नाटकों पर अपना दृष्टिकोण रखा। यह विचार-विमर्श रंगकर्म के ताज़ा परिदृश्य पर चिंतन के साथ ही कला की नई संभावनाओं के लिये सार्थक मेल-मिलाप बना। मध्यप्रदेश विद्युत परिवार का आभार: नाट्य समारोह का सफल बनाने में मध्यप्रदेश विद्युत परिवार की सभी कंपनियां और विशेष रूप से श्री राजीव गुप्ता और श्री सुनील तिवारी जी का विशेष योगदान रहा। विवेचना की बड़ी टीम अनिल श्रीवास्तव, हिमांशु राय, बांके बिहारी ब्यौहार, मनु तिवारी, बदरीश पांडेय, आदित्य रूसिया, पुष्पेन्द्र, ध्रुव, अजय धाबर्डे, शुभम पांडेय, चिन्टू स्वामी, मंझले बढ़ई, क्षितिज राय, सुरेश साहू, जगदीश यादव, सुरेश पेन्टर, सतीश नेमा, उदेश और उनकी मीडिया टीम, संतोष केटरर, नरेश गुप्ता और बहुत सारे लोगों ने दिन-रात मेहनत कर समारोह को सफल बनाया। सफल आयोजनों के पीछे परिवारिक सम्बल: पचासवें वर्ष के इस सफल आयोजन के लिये पूरी टीम के साथ ही सभी साथियों के परिजनों के समर्थन और सहयोग को भी भुलाया नहीं जा सकता। वे हर साल की तरह इस बार भी आयोजन में अपनी भूमिका निभाते आये हैं। प्रबंधन में हाथ बंटाते हैं। (लेखक हिमांशु राय विवेचना के सचिव, इप्टा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और प्रतिष्ठित लेखक, संस्कृतिकर्मी और कला प्रबंधक हैं।) आगे पढ़िये – दिल्ली की सर्द रात और प्लेटफार्म पर प्यार का मौसम!  https://indorestudio.com/dilli-me-plateform-par-pyar-ka-mausam/

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