वो एक चिड़िया थी जिसे देखकर बाबा गाने लगे!

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कीर्ति राणा, इंदौर स्टूडियो। ‘जब बाबा तपेदिक से पीड़ित थे, तब उन्हें एक चिड़िया से प्रेरणा मिली थी। उस चिड़िया को लगातार चहकते देखकर बाबा ने सोचा, जब इस नन्ही सी जान में इतनी ताक़त है कि ये मुझे सोने नहीं देती। तो भला मैं फिर से क्यों गा नहीं सकता’!…प्रख्यात शास्त्रीय गायिका कलापिनी कोमकली ने यह बात कही। वे अपने पिता और गुरू स्व.कुमार गंधर्व को याद कर रहीं थीं। संगीत नाटक अकादमी से पुरस्कृत होने के बाद वे पहली बार अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहीं थीं। पढ़िये यही दिलचस्प बातचीत, जिसमें हैं कुमार जी के जन्मशती वर्ष की चर्चा के साथ उनके उन मौन दिनों की याद है, जब वे बीमार थे और उनका गाना बंद हो चुका था।                   बाबा के जन्मशती वर्ष में मिला पुरस्कार: कलापिनी जी को हाल ही में संगीत नाटक अकादमी के पुरस्कार से नवाज़ा गया है। इस सम्मान के बारे में पूछने पर इस विद्वान गायिका ने कहा, ‘यह सम्मान पाकर मैं बहुत खुश हूं। इसकी वजह यह भी है कि मुझे यह पुरस्कार बाबा के जन्मशती वर्ष में मिला है। मैं इसे बाबा-ताई (मां वसुंधरा कोमकली) के चरणों में अर्पित कर चुकी हूं। मैं यह भी जानती हूं मुझ से भी एक उम्दा कलाकार है जो इस सम्मान का हकदार है। परंतु सम्मान-पुरस्कार के बाद पैर ज़मीन पर होना जरूरी है क्योंकि मुझे पता है पुरस्कार के बाद मेरे हर काम को और अलग नजर से देखा जाएगा’।कैसे मनाएंगे कुमार जी का जन्मशती वर्ष:  यह पूछे जाने पर कलापिनी ने कहा – ‘कुमारजी का संगीत, व्यक्तित्व, सोच और कला को देखने का जो अल्हदा नजरिया रहा है, उसी तरह पूरे वर्ष में काम करना है। वरना तो बहुत आसान है कि मैं, ताई और भुवनेश  देश के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यक्रम पेश कर सकते थे। ऐसे कुछ कार्यक्रम कर देने से शताब्दी पूरी नहीं हो सकती। सभी कलाकारों की शिरकत ना हो, शताब्दी आकार नहीं ले सकती। केवल उनके शिष्यों को लेकर भी शताब्दी का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। हर घराने के उम्दा कलाकारों को इसमें ला सकूं,यह कोशिश है’।सचित्र और क्यूआर कोड वाली किताबें:  उन्होंने कहा, बाबा के गायन-उनके व्यक्तित्व के संस्कार बच्चों को देना भी ज़रूरी है। इसी उद्देश्य से मराठी, हिंदी, अंग्रेजी में तीन किताबें लिखीं गईं हैं, ये किताबें सचित्र हैं। एक किताब ‘कुमार एक गंधर्व स्वर’ माधवी पुरंदरे ने मराठी और हिंदी में लिखी है। सोपान जोशी ने ‘शिवपुत्र एक गंधर्व कथा’ लिखी है। मराठी पुस्तक की एक ख़ासियत भी है। उसमें बाबा की बंदिशों का क्यूआर कोड दिया हुआ है,  किताब पढ़ने के दौरान कोड को स्कैन कर उनकी बंदिशें सुनी जा सकती हैं। भारत में अपने किस्म का यह पहला प्रयोग है। आई और बाबा के संघर्ष की याद: कुमार जी के संघर्ष को याद करते हुए कोमकली जी ने बताया – ‘बाबा को तपेदिक ने घेर लिया था। उपचार-एक्सरे आदि के लिए बार-बार मुंबई जाना संभव नहीं था। डॉ. एमडी देशमुख मुंबई के थे उनके संबंधी थे डॉ ऋषि, जो इंदौर में रहते थे, उनके पास एक्सरे निकालने के लिए बाबा को आना पड़ता था। रामू भैया दाते उन्हें पुत्रवत स्नेह करते थे, यात्रा के इस झंझट से बचाने के लिए उन्होंने ही कहा था – ‘तुम चिंता मत करो देवास आ जाओ’। वो आ तो गए लेकिन रामू भैया कि पत्नी को चिंता रहती थी कि कुमार जी के निरंतर घर आने से उनके दोनों पुत्रों अरुण, रवि दाते को यह रोग ना घेर ले। पत्नी ने चिंता जाहिर भी कि कहीं रवि को रोग ना हो जाए। तब रामू दाते ने पत्नी को कहा था, इस एक कुमार पर मेरे दस रवि न्यौछावर है।कैसा था कुमार जी का गायन: कलापिनी का कहना था, राघव मेनन ने अपनी किताब में कुमार जी के पहले और उनके बाद के संगीत को नितांत अलग बताया है। कुमार जी के पहले, परंपरागत संगीत की परिपाटी रही। उन्होंने बताया, कुमार जी की शिष्यों को लेकर सोच रही कि गुरु से जो पाया है वह तो ठीक है। परंतु तुम अपना कुछ करो। बाबा को लेकर कहा जाता है कि वो विद्रोही कलाकार हैं, वो कैसे थे विद्रोही? उन्होंने राग बदले क्या? हमारा मित्र कहीं जा रहा है तो हम उसे पीछे से साइड से नहीं देख सकते क्या? बस पारंपरिक रागों में उन्होंने यही बदलाव किया। वो शिष्य पैदा करने वाली फैक्टरी नहीं थे वो अपने शिष्यों में देखने की, सोचने की, विचार की ताकत पैदा करते थे। क्राफ्ट और कला में फर्क कुमार जी ने सिखाया।जब आई चिड़िया से प्रेरणा वाली बात: कलापिनी बताया, जब तपेदिक हावी था बाबा चाह कर भी गा नहीं पाते थे। उनके इस संघर्ष का गवाह था देवास का लाल बंगला। बाबा ठीक से करवट नहीं ले पाते थे, सो भी नहीं पाते थे। वहीं सामने एक पेड़ पर एक चिड़िया ने घोंसला बनाया था। वह इस कदर चहकती थी कि सोने में बाधा उत्पन्न हो जाती थी। कुमार जी ने सोचा कि एक नन्ही-सी चिड़िया में इतनी ताकत है कि वह मुझे सोने नहीं देती, तो क्या मैं फिर से गा नहीं कर सकता। उस मौन की वजह से उनकी संगीत में बड़ा परिवर्तन आया।कबीर की वाणी ने प्रेरित किया: तपेदिक के वक्त में बाबा मालवा की लोक गायिकी पर विचार करते रहे। लेटे वक्त उनके कानों पर मालवा का निर्गुण पड़ा। उसे ही अपने स्तर पर बदलाव करते हुए गाया। वो जिंदगी का जिस तरह सामना कर रहे थे कबीर की वाणी उन्हें अंदर तक प्रभावित कर रही थी। कबीर की पंक्तियां उन्हें अपनी लड़ाई में ज्यादा नजदीक लग रही होगी। कबीर के गीतों में उन्हें अपनापन लगता था ‘निर्भय निर्गुण गाउंगा रे’….। यही वो समय था, जब उन्होंने लोक संगीत को सुना। उनके रागों का मिलान किया।शास्त्रीय संगीत युवाओं से दूर क्यों: इस सवाल पर कलापिनी का कहना था, आप को घरों में संगीत सुनना शुरु करना पड़ेगा, आकाशवाणी सुनना पड़ेगा। बचपन में हम रेडियो की सुबह की सभा सुन कर ही स्कूल जाते थे। बच्चों के कानों में संगीत पड़ेगा तो धीरे-धीरे पसंद आएगा। उन्हें संस्कार देना महत्वपूर्ण है। हमें संगीत की तालीम देने में बाबा ने कोई रियायत नहीं की। मुझे शुरुआत में एक घंटे तक तानपुरा बजाने को कहा, हाथ दर्द करने लगता था। तानपुरा बजाने का शास्त्र उन्होंने गढ़ा था। बाबा ने दिये थे सौ में से सौ नंबर: भावुक कलापिनी ने बाबा की याद मुंबई के एक कार्यक्रम को लेकर की। उन्होंने कहा, एक  बार गीत वर्षा का एक कार्यक्रम मुंबई में हुआ। उस स्पेशल प्रोग्राम में मैंने उनके साथ गाया था। कार्यक्रम सम्पन्न हुआ, मैं चाहती थी बाबा कुछ बोलें लेकिन बाबा ने मेरे गायन को लेकर एक शब्द नहीं कहा। सब को अचरज लग रहा था। उनसे सब ने पूछा, कोमकली ने कैसा गाया, आप ने कुछ नहीं कहा। बाबा कुछ पल चुप रहे फिर बोले मैं सौ में से सौ नंबर देता हूं। नैसर्गिक प्रतिभा के धनी थे कुमार गंधर्व: कर्नाटक के धारवाड़ में 8 अप्रैल 1924 को शिवपुत्र सिद्धराम कोमकाली का जन्म हुआ था। बाद में वही शिवपुत्र कुमार गंधर्व के नाम से प्रसिद्ध हुए। 1977 में भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। उनमें नैसर्गिक प्रतिभा थी। दस साल की उम्र में ही उनकी प्रसिद्धि फैल गई थी। प्रोफेसर बीआर देवधर उनके गुरु थे। वो अपने शिष्यों को एक अलग रास्ता अख्तियार करने के लिये प्रेरित करते थे। कुमार गंधर्व ने जहाँ मालवी गीतों को राग दरबारी ढंग से गाकर नए आयाम दिए।  वहीं उन्होंने सूर, तुलसी, कबीर और मीरा के पदों को गाकर उन्हें जन सामान्य में लोकप्रिय बना दिया। राग मालवती, लग्न गंधार सहेली तोड़ी और गांधी मल्हार रागों की रचना की। उन्होंने ‘अनूप राग-विलास’ नामक पुस्तक लिखकर संगीत प्रेमियों को संगीत की सीख दी। उनका अवसान अवसान 12 जनवरी 1992 को हुआ। (कीर्ति राणा वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक हैं। बीते 40 वर्षों से अपने विशिष्ट लेखन और राजनैतिक विश्लेषण के लिये पहचाने जाते हैं।) https://indorestudio.com/

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