Wednesday, May 13, 2026
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वो कलाकार जिन्होंने ‘खजुराहो नृत्य समारोह’ में रचा इतिहास!

26 फरवरी रविवार को खजुराहो में 49 वें नृत्य समारोह का समापन हो गया। इस दौरान देश-विदेश से आये प्रख्यात कलाकारों ने अपनी सम्मोहक प्रस्तुतियाँ दी, एक नया इतिहास रचा। 20 फरवरी से प्रारंभ हुआ यह नृत्य समारोह स्मृति पटल पर सदा के लिये अंकित हो गया। पढ़िये उत्सव की विशेष रिपोर्ट।- इनपुट राज बेन्द्रे, संयोजन: इंदौर स्टूडियो। समारोह की यादों को लेकर कलाकार विदा: समापन दिवस पर गोपिका,अरूपा और पुष्पिता और उनके साथियों के नृत्य से जुड़ी लेकर यादों को लेकर कलाकार अपने शहरों, देशों को रवाना हो गये।मध्यप्रदेश राज्य के संस्कृति विभाग के तहत उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी के साथ पर्यटन विभाग, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, वर्ल्ड डांस एलायंस और छतरपुर जिला प्रशासन के साझा प्रयासों से यह समारोह आयोजित किया गया।  हर दिन अवतरित हुईं नृत्य की नायिकायें: खजुराहो नृत्य समारोह में हर शाम सदियों पुराने मंदिरों के समक्ष देश के प्रख्यात नृत्य कलाकारों ने अपनी मनोहारी प्रस्तुतियां दी। इन पारंपरिक और प्रायोगिक प्रस्तुतियों ने दर्शकों को भाव विभोर कर दिया। फागुन के महीने में लय-ताल,घुंघरूओं और नर्तकों की थिरकन ने नवरसों का संचार किया। नृत्य के माध्यम से कई पुरातन कहानियां सुनाई। उनका नृत्य अभिव्यक्ति में एक से बढ़कर एक प्रदर्शन किया। शास्त्रीयता के साथ नवाचार का नया संचार हुआ। कलाकारों ने एक दूसरे से बहुत कुछ सीखा,समझा जाना,प्रस्तुत किया। चलिये संक्षेप में नज़र डालते हैं, समारोह में किन कलाकारों और उनके साथियों ने नृत्य की नई आभा का रंग बिखेरा। पहले दिन से ही नृत्य कला ने बाँधा समां: पहले दिन शाम को प्रख्यात भरतनाट्यम नृत्यांगना डॉ. जानकी रंगराजन,धीरेंद्र तिवारी एवं अपराजिता शर्मा ने अपनी नृत्य प्रस्तुतियों से रस विभोर किया। सिने तारिका प्राची शाह ने कथक नृत्य से दर्शकों को मुग्ध कर दिया। दूसरे दिन श्रीलक्ष्मी गोवर्धनन के कुचिपुड़ी, मैथिल देविका और संगियों के मोहिनी अट्टम तथा वैभव आरेकर और उनके साथियों के भरतनाट्यम नृत्य की थिरकन से खजुराहो का वैभव दमक उठा। मैथिल देविका,धनुक और अर्जुन की तिकड़ी ने मोहिनीअट्टम का मनोहारी रंग बिखेरा। समापन वैभव आरेकर और उनके नौ साथियों के भरतनाट्यम नृत्य से हुआ। जब नृत्य में खिले फागुन और बसंत: तीसरे दिन प्रतिशा, हिमांशी कटरगड्डा,आरती नायर और कदम्ब सेंटर फॉर डांस के नर्तकों ने मंच पर अवतरित होकर अपनी प्रस्तुतियां दीं, तब ऐसा लगा जैसे बसंत ओर फागुन यहां बहार और होली गाने आए हों। जगदम्बी और कंदरिया महादेव के मंदिरों के बीच बने विस्तीर्ण मंच पर जब वे नृत्यरत हुये, तब फागुन का मौसम एक नई अनुभूति दे गया। आगाज़ प्रतिशा सुरेश के पांच सौ साल पुराने सत्रीया नृत्य से किया। दूसरी प्रस्तुति में हिमांसी कटरगड्डा और आरती नायर के कुचिपुड़ी और भरतनाट्यम नृत्य की जुगलबंदी हुई। सभा का समापन कदम्ब सेंटर फॉर डांस के कलाकारों की कथक प्रस्तुति से हुआ। इस ग्रुप में रूपांशी कश्यप,मिताली ध्रुव,मानसी मोदी,अभिषेक खींची,निर्जरी व्यास,वैष्णवी वकील,सुनिधि गेमावत और धारा बनेरा शामिल रहीं। भगवान राम पर केंद्रित अनुपम प्रस्तुति: चौथे दिन मलेशिया से आये रामली इब्राहीम के ग्रुप ने ओडिसी नृत्य की अविस्मरणीय प्रस्तुति दी। भगवान राम पर केंद्रित अपनी अनुपम नृत्य प्रस्तुति दी। वहीं तेजस्विनी साठे ने भी अपने ग्रुप के साथ कथक का कमाल दिखाया। संयुक्ता सिन्हा की प्रस्तुति मन को हरने वाली थी। उन्होंने दुर्गा स्तुति से नृत्य का शुभारंभ किया। समापन ठुमरीनुमा रचना से किया। “चांदनी सी रात ढोला कैसे आऊं” इस रचना पर पिया से मिलने की चाह में बैठी नायिका की विरह वेदना को उन्होंने अपने नृत्यभावों से बखूबी पेश किया। तेजस्विनी साठे और उनके साथियों ‘सजन संग प्रीत सजी री’ पर विरहणी नायिका के भावों को नृत्य अभिनय से पेश किया। उन्होंने ‘महादेव शंकर हरि’ पर नृत्य की यादगार प्रस्तुति दी। समापन भैरवी में एक तराने से किया। नृत्य में सर्वेश्वरी साठे, भक्ति सड़की, अलापी जोग ईशा ओझा, रेवा जोशी निषिगंधा केतकर, त्रुशाली कदम, रीना लेले, उर्मी कुलकर्णी, नमितो लवले ने साथ दिया।लय की गतियों में आनंद की अनुभूति: पांचवे दिन कथकली, कथक और भरतनाट्यम के शास्त्रीय नृत्यों ने रसिकों को आनंदित किया। समारोह की शुरुआत आकाश मलिक एवं रुद्र प्रसाद राय की कथकली और समकालीन नृत्य की युगल प्रस्तुति से हुई। आकाश और रुद्र की जोड़ी ने इस नृत्य में महाभारत से भीम औऱ हनुमान के संवाद की लीला को पेश किया। आकाश ने इस नृत्य संयोजन में हनुमान औऱ रुद्र ने भीम की भूमिका में बढ़िया नृत्याभिनय किया। इस प्रस्तुति में चेन्डा पर अभिषेक कुजरामन, मद्दलम पर विष्णुदत्तम, गायन पर श्याम किशोर, एवं सहायक मित्रा, कच्छप वीणा पर अभिजीत रॉय एवं पखावज पर जय दलाल ने साथ दिया। ओडिसी की मनभावन नृत्य रचनाएं: इस दिन की अगली नृत्य प्रस्तुति ओडिसी नृत्य की थी। कलाकार थी प्रख्यात ओडिसी नृत्यांगना शाश्वती गराई घोष। उन्होंने “जय देवा हरे” नृत्य रचना से शुरुआत की। दूसरी नृत्य रचना माया मानव की थी। विचित्र रामायण से ली गई सुनहरे हिरण की कथा को शाश्वती ने ओडिसी के नृत्यभावों से सहज ढंग से पेश किया। सभा का समापन भरतनाट्यम और कथक की जुगलबंदी से हुआ। कलाकार थे बाला विश्वनाथ और प्रफुल्ल सिंह गेहलोत। बाला भरतनाट्यम करती हैं और प्रफुल्ल कथक। इस प्रस्तुति में दोनों नृत्य अनुशासनों के 16 कलाकारों ने भागीदारी की। इस समूह ने भगवान विष्णु के दशावतारों पर अपनी नृत्य प्रस्तुति दी। रह गईं नृत्य उत्सव की यादें शेष: नृत्यों की समापन संध्या पर गोपिका,अरूपा और पुष्पिता और उनके साथियों का नृत्य हरेक की स्मृतियों में बस गया। नृत्य की शुरुआत गोपिका वर्मा के मोहिनीअट्टम से हुई। उन्होंने गणेश स्तुति से नृत्य की शुरुआत की। इसके बाद कृष्ण-रुक्मणी के बीच पासे का खेल, फिर कृष्ण द्वारा रुक्मणी और गरुड़ के घमंड को तोड़ने की कथा को उन्होंने नृत्य भावों में प्रस्तुत किया। अरूपा लाहिरी और उनके साथियों ने भरत नाट्यम, ओडिसी और मोहिनीअट्टम तीन शैलियों वाली अनूठी प्रस्तुति दी। पहली प्रस्तुति ‘भगवान सूर्य’ को समर्पित थी। दूसरी पेशकश ‘काम’ पर केंद्रित थी। अंत में उन्होंने तिल्लाना पेश किया। समापन पुष्पिता मिश्रा और उनके साथियों के ओडिसी नृत्य से हुआ। आरवी पल्लवी से नृत्य की शुरुआत की। इसमें उनका साथ शुभांगी नायक, ज्योतिर्मयी षड़ंगी, आद्याशा मिश्रा, श्रीया श्रीपति, देवाशीष महापात्रा, शुभेंदु दास, सुष्मिता दास ने दिया । उनकी अगली प्रस्तुति उदबोधन थी। इसमें उन्होंने उड़ीसा के वैभव, वहां की संस्कृति, जंगल-पहाड़ों आदि का नृत्यभावों से वर्णन किया। आगे पढ़िये –

‘खुजराहो नृत्य समारोह’ में नृत्य ‘कला-वार्ता’ का क्या रहा सार?

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