Wednesday, May 20, 2026
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वर्ल्ड थियेटर डे विशेष: दर्शक भी अब नाटक देखने की तैयारी करते हैं

थियेटर ग्रुप्स या नाट्य दल  जिस तरह से नाटक दिखाने की तैयारी नहीं करते, दर्शक भी अब उसी तरह से नाटक देखने की तैयारी करते हैं। वे प्रस्तुतियों की आपस में तुलना करते हैं। अभिनेता की क्षमता का आकलन करते हैं। विषय और भाषा की समीक्षा करते हैं। अपने समय का भी हिसाब लगाते हैं। अब उन्हें कुछ भी नहीं दिखा सकते। पढ़िये, विश्व रंग दिवस पर ख्यात नाटककार और समीक्षक अख़तर अली की यह विशेष टिप्पणी। साथ में देखिये, कोलकाता में, लिटिल थेस्पियन के 12 वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह में प्रस्तुत नाटकों, क्रमश: दूजो कबीर, लम्हो की मुलाक़ात, रेत और इंद्रधनुष और ओडिपस संवाद के दृश्य। अभिनेत्री, कवयित्री और निर्देशक उमा झुनझनवाला के नेतृत्व में यह नाट्य समारोह 18 से 23 मार्च तक संपन्न हुआ है। चित्र सौजन्य प्रशांत अरोरा।- संपादक,इंदौर स्टूडियो। धर्म की तरह अवतरित रंगकर्म : रंगकर्म पृथ्वी पर धर्म की तरह अवतरित हुआ है , मानवता के उत्थान के लिये, ठीक वैसे ही जैसे समय-समय पर ईसाइयत,सनातन और इस्लाम आया। उसी प्रकार रंगकर्म भी आया। विभिन्न धर्मों की तरह ही जिसने जो धर्म अपनाया वह उसका अनुयायी कहलाया। जैसे कि जिसने रंगकर्म को अपनाया वह रंगकर्मी हो गया।रंगकर्म के सामने अपने संकट: रंगकर्म एक धर्म है और इसके सामने वे सारे संकट खड़े है जो हर धर्म के सामने खड़े है। रंगकर्म हमारा धर्म है और हर धर्म की तरह हमारे पास अपने ग्रंथ है , अपने संत है और अपने शत्रु है । हर धर्म की तरह हमारे इस धर्म का भी यही मकसद है कि जो भटक गए है उन्हें राह पर लाना है। मौजूदा समय के कंस और यज़ीद इस धर्म को नष्ट करने पर आमादा है लेकिन सब हार जायेगे क्योंकि इतिहास गवाह है कि जीत हमेशा धर्म की ही हुई है। समय के साथ बदलने की ज़रूरत: वक्त के साथ काम के अंदाज़ भी बदलते जाते है , इसीलिये कहा जाता है कि परिवर्तन समय की आवश्यकता है । यह परिवर्तन उन माध्यमों तक भी होता है जहां तक हमारी नज़र नहीं जाती है जिस मुकाम पर पहुँचकर हमारी सोच ठहर जाती है उसके आगे भी जहां है , वहाँ भी अंदाज़े बयाँ में यकीनन बदलाव आता होगा और आने वाली सदियों में भी यह सिलसिला जारी रहेगा क्योंकि मानव मननशील प्राणी है। रंगमंच एक सामाजिक ज़िम्मेदारी: मनोरंजन हर कला के केंद्र में मौजूद होता है , सो वह रंगमंच में भी है। पहले नाटकों में मनोरंजन ही था पर अब नाटकों में मनोरंजन भी है । पहले इस प्रदर्शकारी विधा में मनोरंजन के अतिरिक्त और कुछ नहीं था और अब बहुत कुछ के साथ मनोरंजन भी है । इस वाक्य में “भी” पर ख़ास तवज्जो देनी होगी।  मैंने कहा है पहले नाटकों में मनोरंजन ही होता था पर अब नाटकों में मनोरंजन भी होता है। मैं कहना यह चाह रहा हूँ कि अब नाटक मात्र कला का प्रदर्शन नहीं अपितु सामाजिक ज़िम्मेदारी का निर्वाह है। पृथ्वी राजकपूर से हबीब तनवीर तक:  जब से मैंने होश संभाला है, अब तक जिस तरह का रंगमंच हुआ है वह एक सा नहीं हुआ। जबकि हुआ रंगमंच ही है जिस में एक कहानी और हमेशा की तरह उसके लिये अभिनय , संगीत , सैट , लाईट और वेशभूषा थी लेकिन हर दौर के बाद थियेटर के अंदाज़ बदलते गये । पृथ्वी राजकपूर का थियेटर अलग अंदाज़ का था , बलराज साहनी का अलग अंदाज़ का था , इब्राहिम अल्काज़ी जी का अलग अंदाज़ का था , हबीब तनवीर जी का अलग अंदाज़ का था , कारंत जी का अलग अंदाज़ का था , उसी प्रकार उत्पल दत्त , बादल सरकार , प. सत्यदेव दुबे , जब्बार  पटेल , देवन्द्र राज अंकुर और फिर उसके बाद लगातर उषा गांगुली ,मुश्ताक काक , संजय उपाध्याय , सलीम आरिफ़ ,योगेन्द्र चौबे , अनिल रंजन भौमिक , राजकमल नायक , मिनहाज असद जैसे नाट्य पंडितों ने अपनी नाट्य प्रस्तुतियों में रंगमंच के बेहतर से बेहतर अंदाज़ प्रस्तुत किये हैं। बदल गये अब दर्शक भी: अब नाट्य मंडलियाँ ही नाटक दिखाने की तैयारी नहीं करती बल्कि दर्शक भी नाटक देखने की तैयारी करता है। वह प्रस्तुतियों की आपस में तुलना करता है , अभिनेता की क्षमता का आकलन करता है , विषय और भाषा का विश्लेषण करता है । अब नाटक की समाप्ति पर दर्शक ताली बजाकर चुपचाप घर नहीं चला जाता बल्कि देखे गए की समीक्षा करता है । अपने दिये गये समय से, देखी गई प्रस्तुति को तौलता है कि कहीं वह आकर घाटे में तो नहीं रहा । दर्शकों के देखने ने निर्देशक और अभिनेता को सावधान कर दिया है उनकी ज़िम्मेदारी को बढ़ा दिया है । इन दिनों नाट्य प्रस्तुतियों में जो लगातार निखार आते जा रहा है उसका श्रेय का कुछ प्रतिशत दर्शकों के देखने के अंदाज़ को भी जाता है। नाटक अभिनेता का माध्यम: अब इस बात पर पुर्नविचार की कोई आवश्यकता नहीं कि नाटक अभिनेता का माध्यम है । मेरा अपना सोचना है कि अभिनेता अभिनेता में अंतर होता है। हर अभिनेता रंगकर्मी नहीं होता , मंच पर कई तरह के अभिनय होते है पर रंगकर्मी वही है जो गंभीर रंगमंच से जुडा है और नाटकों में अभिनय करता है।नाटक अब बावजह होते हैं: रंगमंच के बदले स्वरूप में रंगमंच करने में करने का कारण भी जुड़ गया है । अब नाटक बेवजह नहीं बल्कि बावजह होते है । यही वजह है कि अब नाटक देखना आँख का सब से अच्छा उपयोग हो गया है , ताजमहल देखने और सर्कस देखने में अंतर होता है , नाटक देखना ताजमहल देखने की तरह हो गया है । हमें मंच पर अभिनेता का शरीर दिखाई देता है उसकी आत्मा दिखाई नहीं देती, उसका ईमान दिखाई नहीं देता जबकि वह उसकी साथ होता है । सिर्फ अभिनय देखना नाटक देखने का सही तरीका नहीं है , उस अभिनय का मकसद समझना भी देखने में शामिल होना चाहिये।इंसान को बेहतर इंसान बनाने की कला: नाटक देखने के बाद दर्शक पहले से थोडा ज़्यादा खिल जाना चाहिये , पहले से थोडा और ज़्यादा बेहतर इंसान हो जाना चाहिये , और अधिक आशावादी हो जाना चाहिये , और अधिक कोमल स्वभाव का हो जाना चाहिये । जो कला यह काम कर सकती है वही कला , कला है , इसमें ही  अभिनय करने वाला अभिनेता रंगकर्मी है , यही प्रस्तुति रंगकर्म है । अगर अभिनय बहुत प्रभावशाली है , मंच की सजावट बहुत आकर्षक है , प्रस्तुति में भरपूर मनोरंजन है लेकिन उससे गलत संदेश पहुचता है , उसमें अश्लीलता है , भेदभाव को बढ़ावा है , नफ़रत के बीज मौजूद है , हिंसा की संभावनाए शामिल है , उससे देशप्रेम चोटिल होता है , तो ऐसी कोई भी प्रस्तुति कितनी भी आकर्षक हो , कितनी भी प्रभावशाली हो , उसमें अभिनय कितना भी सहज हो पर ऐसे अभिनय को कला नहीं कहा जा सकता , ऐसे अभिनेता रंगकर्मी नहीं कहे जा सकते और ऐसी प्रस्तुतियाँ चाहे जो कहलाये पर रंगकर्म नहीं कही जा सकती। मौजूदा समय में नाट्य दलों और आयोजकों की ज़िम्मेदारी बीते समय की तुलना में बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है क्योकि अब नाटक मात्र कला का प्रदर्शन नहीं, मनोरंजन का माध्यम नहीं , सिर्फ आनंद की वस्तु नहीं बल्कि सामाजिक ज़िम्मेदारी का निर्वाह भी है। (पता:अख़तर अली, निकट मेडी हेल्थ हास्पिटल, आमानाका, रायपुर, छत्तीसगढ़। E-Mail: akhterspritwala@gmail.com) आगे पढ़िये-

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