शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। क्या यादों को छुआ जा सकता है? क्या विस्थापन के दर्द को बिना किसी भाषा के महसूस किया जा सकता है? META 2026 में प्रदर्शित नाटक ‘Y – व्हाट रिफ्यूज़ टू फेड’ इन सवालों का जवाब अपनी अद्भुत शारीरिक भाषा से देता है। नाटक को बेस्ट लाइट डिजाइन (संदीप यादव) के लिये अवॉर्ड भी दिया गया है। ‘द इंटरलिंक थिएटर’ की इस प्रस्तुति का निर्देशन रमित रमेश ने किया है।
‘फिजिकल थिएटर’ और ‘जिबरिश’ थियेटर: यह नाटक पारंपरिक रंगमंच की सीमाओं को तोड़ते हुए ‘फिजिकल थिएटर’ और ‘जिबरिश’ (Gibberish) के माध्यम से एक अलग दृश्य अनुभव रचता है। इस नाटक में गार्गी अनंतनाथन, जिजीविषा अक्षय, मल्लिका एम, केवल कार्तिक, अलका पीएस ने अभिनय किया है। तकनीकी टीम में अमजद अली, सुधीश कोटक्कड़,साहिल और सारथ एवीएस शामिल हैं।
कहानी और दर्शन: जो कभी धुंधला नहीं होता: नाटक का शीर्षक ‘Y’ स्वयं में एक पहेली है। यह एक प्रश्न चिह्न भी है और उस ‘मोड़’ का प्रतीक भी जहाँ से यादें अपना रास्ता बदल लेती हैं। नाटक की कोई निश्चित रेखीय कहानी (Linear Story) नहीं है, बल्कि यह स्मृतियों, घर की तलाश और उस चीज़ के बारे में है जो समय की मार के बाद भी ‘मिटने से इनकार’ (Refuses to Fade) कर देती है। विस्थापन की पीड़ा और अपने अस्तित्व की जड़ों को खोजने की छटपटाहट इस नाटक का मूल दर्शन है।
मंच पर शब्द नहीं केवल ध्वनियां: रमित रमेश ने इस नाटक के लिए ‘जिबरिश’ (एक ऐसी भाषा जिसका कोई शब्दकोश नहीं होता) को चुना है। यहाँ शब्द केवल ध्वनि (Sound) हैं, अर्थ नहीं। नाटक का पूरा दारोमदार कलाकारों की देह-भंगिमाओं, उनकी साँसों की गति और उनके शारीरिक तालमेल पर है। जब शब्द अर्थ खो देते हैं, तो भावनाएँ प्रखर हो जाती हैं। कलाकारों ने अपनी देह को एक जीवित मूर्तिकला में बदल दिया है, जहाँ हर हरकत एक कहानी कहती है। यह प्रयोग दर्शकों को भाषा के अवरोध से मुक्त कर सीधे संवेदनाओं से जोड़ता है।
निर्माण प्रक्रिया: देह को शब्द बनाना: इस नाटक की निर्माण प्रक्रिया अत्यंत जटिल और गहन रही है। निर्देशक रमित रमेश के अनुसार, यह एक ‘डिवाइज्ड थिएटर’ (Devised Theatre) प्रक्रिया का नतीजा है। कलाकारों ने महीनों तक अपनी शारीरिक क्षमताओं पर काम किया। इसमें न केवल फ्लेक्सिबिलिटी (लचक) बल्कि ‘इमोशनल मेमोरी’ (भावनात्मक स्मृति) को शरीर के विभिन्न अंगों के जरिए व्यक्त करने का अभ्यास शामिल था। रिहर्सल के दौरान कलाकारों को अपनी व्यक्तिगत यादों को शारीरिक गतिविधियों में ढालने की छूट दी गई, जिससे मंच पर दिखने वाला हर मूवमेंट ‘ऑर्गेनिक’ और सच्चा लगता है।
डिज़ाइन और संगीत: दृश्यात्मक भव्यता: मंच सज्जा न्यूनतम है लेकिन प्रतीकात्मकता से भरपूर है। मंच पर प्रयुक्त वस्तुएँ (Props) केवल सामान नहीं, बल्कि यादों के बोझ की तरह नज़र आती हैं। प्रकाश योजना (Lighting) इस नाटक का एक अन्य महत्वपूर्ण ‘पात्र’ है, जो स्मृतियों के धुंधलके और वास्तविकता के बीच के अंतर को स्पष्ट करती है। पार्श्व संगीत और ध्वनियों का संयोजन जिबरिश संवादों के साथ मिलकर एक ऐसा ‘साउंडस्केप’ रचता है, जो दर्शकों को एक अलग ही दुनिया में ले जाता है।
देह कभी झूठ नहीं बोलती: निर्देशक रमित रमेश इस प्रयोग के बारे में कहते हैं: “हम अक्सर शब्दों के पीछे छिपते हैं, लेकिन देह कभी झूठ नहीं बोलती। ‘Y’ के जरिए हमने यह खोजने की कोशिश की है कि जब सब कुछ छीन लिया जाता है, तब भी हमारे भीतर क्या शेष रहता है। यह नाटक एक ‘अनुभव’ है, जिसे दिमाग से नहीं, बल्कि दिल से महसूस किया जाना चाहिए।” उन्होंने नाटक के दृश्यों, छवियों और ध्वनि निर्माण की प्रक्रिया के बारे में कहा कि असल में यह नाटक पहचान, विस्थापन और घर से जुड़े गहरे सवालों की एक कलात्मक खोज है।

दृश्य भाषा में ‘कुटियाट्टम’ के सिद्धांत: नाटक की दृश्य-भाषा को ‘कुटियाट्टम’ के सिद्धांतों और शारीरिक मुद्राओं (movement scores) के माध्यम से विकसित किया गया, जिससे व्यक्तिगत आघातों को एक कलात्मक स्वरूप मिला। भाषाई विविधता की चुनौती को पार करने के लिए कलाकारों ने भाषा को केवल अर्थ के बजाय एक ‘संवेदी ध्वनि’ के रूप में अपनाया और एक नई साझा भाषा का आविष्कार किया।
छवियों और ध्वनियों का संयोजन: नाटक में उपयोग की गई सामग्री, जैसे 184 कपड़ों के टुकड़े, दर्पण और लोचदार डोरियाँ, सामूहिक स्मृति और अदृश्य बंधनों का प्रतीक हैं। यह प्रस्तुति एक सीधी कहानी के बजाय छवियों और ध्वनियों का एक ऐसा संयोजन बन जाती है, जो दर्शकों को ख़ुद की पहचान और अनसुलझे सवालों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
कुछ भावनात्मक से जुड़े, कुछ दृश्यों से: रमित रमेश ने बताया- ‘हमें यह जानकर अच्छा लगता है कि ज़्यादातर दर्शक इस नाटक से भावनात्मक रूप से जुड़ पाते हैं। कुछ लोग महज़ इसके दृश्य संरचना का आनंद लेते हैं। META में भी, दर्शकों की प्रतिक्रियाएँ हर किसी के अनुभवों से काफ़ी अलग थीं। ‘Y’ का असल मतलब भी यही है। इसका मकसद उस समाज को, जिसमें हम रहते हैं, कई अलग-अलग नज़रिए और विकल्प देना है।
कलाकारों के लिये भी एक अलग अनुभव: रमित के मुताबिक, अगर कलाकारों के नज़रिए से देखें तो, यह उनके अब तक के काम करने के तरीके से बिल्कुल अलग था; इसलिए हर मंच और दर्शकों से मिलने वाली प्रतिक्रिया उन्हें इस बात को और गहराई से समझने में मदद कर रही है कि वे मंच पर किस तरह की छवि गढ़ रहे हैं। आपको बता दें, नाटक की निर्माण प्रक्रिया केरल में एक घर से शुरू हुई, जहाँ विभिन्न नाट्य संस्थानों के कलाकारों ने अपने निजी अनुभवों और सामाजिक ढांचों के तनावों को साझा किया। इस नाटक का प्रीमियर पिछले साल 4 दिसंबर 2025 को संगीत नाटक अकादमी, त्रिशूर में हुआ था। तब से अब तक इस अनूठे रंग प्रयोग के 6 शो हुए हैं। आगे पढ़िये – META 2026 में सबसे ज़्यादा अवॉर्ड पाने वाले बांग्ला नाटक ‘जे जानलागुलोर आकाश छिलो’ के बारे में – https://indorestudio.com/je-janlagulor-akash-chilo-bengali-play-meta-2026-awards-winner/

