Tuesday, June 16, 2026
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तीन महीने के बेसिक ड्रामा कोर्स की उपलब्धि: ‘येरमा’

शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। महज़ तीन महीने के बुनियादी प्रशिक्षण के बाद, नवोदित कलाकारों का किसी क्लासिक कृति के साथ मंच पर उतरना एक साहसिक कदम ही माना जायेगा। स्पेन के मशहूर नाटककार और कवि फ़ेडेरिको गार्सिया लोर्का के नाटक ‘येरमा’ (Yerma) की प्रस्तुति इसी बात का प्रमाण है। हालांकि अभिनय के स्तर पर कुछ कमियाँ नज़र आईं, लेकिन नाटक की बेहतरीन डिज़ाइनिंग, प्रभावशाली मंच सज्जा, सटीक प्रकाश योजना, वेशभूषा और  संगीत ने इन खामियों को बखूबी ढँक दिया। इस प्रस्तुति की परिकल्पना और कुशल निर्देशन शेखर कावंत ने किया है।Saqib Siddiqui and Ananya Mishra in the play 'Yerma', directed by Shekhar Kawant. A review by Shakeel Akhter. IndoreStudio.com. ‘येरमा’ नाटक का मंचन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD), दिल्ली के परिसर में मौजूद ‘चहुँमुख’ प्रेक्षागृह में हुआ। इसकी सबसे पहली खूबी इसकी मंच सज्जा रही। इस छोटे से प्रेक्षागृह में प्रवेश करते ही आप नाटक की मुख्य पात्र ‘येरमा’ के घर और उसके गाँव में पहुँच जाते हैं, जहाँ नाटक के दृश्य मूल रूप से मंच के दो हिस्सों में घटित होते हैं। एक घर में और दूसरा दर्शकों के बाएँ हाथ पर मौजूद वृक्ष के नीचे। ‘चहुँमुख’ में बमुश्किल दो सौ दर्शक बैठ सकते हैं और स्वाभाविक रूप से वह पूरी तरह से भरा हुआ था। Saqib Siddiqui and Ananya Mishra in the play 'Yerma', directed by Shekhar Kawant. A review by Shakeel Akhter. IndoreStudio.com.येरमा का विवाह जुआन नाम के एक किसान से हुआ है, जो सिर्फ पैसे कमाना जानता है और हर वक्त अपनी खेती-बाड़ी में व्यस्त रहता है। उसे लगता है कि सारे सुख- पैसे कमा लेने से ही उसे मिल जाएँगे; जिससे उसका और उसके ख़ानदान का रुतबा समाज में बड़ा हो जाएगा। उसे पसंद नहीं कि उसकी पत्नी येरमा घर से बाहर जाए, किसी से मिले-जुले या बात करे। इन बातों के लिए उसके पास एक ही दलील है – लोग क्या कहेंगे, समाज में कहीं हमारा ख़ानदान बदनाम ना हो जाए!manju sahani and Ananya Mishra in the play 'Yerma', directed by Shekhar Kawant. A review by Shakeel Akhter. IndoreStudio.com. येरमा अपनी ‘मर्यादा’ में पति धर्म निभा रही है, मगर उसकी एक ही ख़्वाहिश है कि वह जल्द माँ बन जाए। साल बीतते जा रहे हैं। वह संतान पाने के लिए लालायित है और हर तरह से पति को मनाने की कोशिश कर रही है, लेकिन पति बाकी सारी बातों के अलावा इस एक बात को मानने के लिए तैयार नहीं है। वह ना प्रेम देना चाहता है और ना ही बच्चा। ऐसे में दोनों के बीच तनाव बढ़ता ही जाता है। इस बीच येरमा की उसके बचपन के एक दोस्त विक्टर से मुलाक़ात होती है, और इसी तरह माँ बन चुकी एक नवविवाहिता सहेली से भी। वे भी चाहते हैं कि येरमा जल्दी से माँ बन जाए। मगर उसका पति अपनी बात पर अडिग है। नि:संतान येरमा समाज के तानों का शिकार भी बन रही है। तंग आकर वह तांत्रिकों की शरण में जाती है, यह बात भी उसके पति को नागवार गुज़रती है।Saqib Siddiqui, Ananya Mishra and Yuvraj Verma in the play 'Yerma', directed by Shekhar Kawant. A review by Shakeel Akhter. IndoreStudio.com.इस बात को लेकर पति से उसका विवाद बढ़ता है, और ख़ुद को बाँझ महसूस करने वाली येरमा अपनी बिगड़ी मनोदशा के बीच पति का क़त्ल कर देती है। क़त्ल के बाद वह अपनी उसी मनोदशा में कहने लगती है- ‘मैं अब पक्की बाँझ हूँ, रात को अकेले चैन से सो सकती हूँ, मैंने अपनी होने वाली संतान को मार दिया है!’ जुआन की हत्या कर येरमा सिर्फ अपने पति को नहीं मारती, बल्कि वह अपनी ‘माँ बनने की आखिरी उम्मीद’ को भी हमेशा के लिए क़त्ल कर देती है। यह चित्रण पति और समाज से मिली घुटन के एक भीषण विस्फोट की तरह सामने आता है। कमोबेश यहाँ यह बताना होगा कि स्पेनिश भाषा में येरमा का मतलब ‘बाँझ’ या ‘बंजर’ होने से है।Yuvraj Verma and Ananya Mishra in the play 'Yerma', directed by Shekhar Kawant. A review by Shakeel Akhter. IndoreStudio.com.92 वर्ष लिखे गए इस नाटक की कहानी भले आज अप्रासंगिक लगती हो, मगर एक स्त्री का नि:संतान होना या ख़ुद को बांझ महसूस करना आज भी प्रासंगिक है। आज भी एक शादीशुदा मगर नि:संतान स्त्री के जीवन में यह सब घटता और गुज़रता है।  यह विषय भी अपूर्ण मातृत्व, सामाजिक दबाव, वैवाहिक घुटन और एक स्त्री का मनोवैज्ञानिक संघर्ष है। यह विषय इतना सार्वभौमिक और शक्तिशाली है कि दुनिया भर के साहित्य, रंगमंच और सिनेमा ने इसे अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत किया है। Saqib Siddiqui and Ananya Mishra in the play 'Yerma', directed by Shekhar Kawant. A review by Shakeel Akhter. IndoreStudio.com.परंतु नाटक में जिस तरह का अंत (निराशा और क्रोध की मनःस्थिति में पति का क़त्ल) दिखाया गया है, वह प्रस्तुति में उस तरह से चरम पर नहीं पहुँच पाता जैसा कि वह मंच पर घटित होता है। नाटक में यह साफ़ नहीं है कि क्या जुआन में मर्द ना होने जैसी कोई कमी है, जिसकी वजह से वह अपनी पत्नी से संबंध नहीं बनाना या बच्चे को जन्म देना नहीं चाहता। शायद यह उद्घाटित ना करने के पीछे लेखक की मंशा रही है कि वह कथ्य में सिर्फ पितृसत्ता और सामाजिक दबाव में एक स्त्री की व्यथा-कथा को प्रस्तुत कर सके।Kherul islam in the play 'Yerma', directed by Shekhar Kawant. A review by Shakeel Akhter. IndoreStudio.com.इस नाटक में उन कलाकारों ने अभिनय किया है जिन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा संचालित तीन महीने का बेसिक ड्रामा सर्टिफिकेट कोर्स किया है। तीन महीने के बाद ऐसे कोई 32 नए प्रशिक्षित कलाकारों के तीन ग्रुप बनाए गए थे। उन तीनों ग्रुप्स को लेकर तीन प्रस्तुतियाँ तैयार की गईं। चिन्मय दास और शांतनु बोस के नाटकों के बाद तीसरी प्रस्तुति युवा और प्रतिभाशाली निर्देशक शेखर कावंत ने तैयार की। उन्होंने महज़ 3 हफ्ते के समय में स्पेन के ग्रामीण अंचल और सौ साल पुराने समाज का निरूपण अपने नाटक में किया।Saqib Siddiqui and Ananya Mishra in the play 'Yerma', directed by Shekhar Kawant. A review by Shakeel Akhter. IndoreStudio.com.तीन हफ्ते में तैयार इस नाटक में जिस तरह से कलाकारों ने काम किया, उसे एक उपलब्धि ही कहा जाएगा। नाटक में येरमा की मुख्य भूमिका निभाने वाली अनन्या मिश्रा से लेकर साकिब सिद्दीक़ी (जुआन), युवराज वर्मा (विक्टर), चंदा साहनी (मारिया) और ख़ैरुल इस्लाम (बूढ़ी महिला और डोलारेस) जैसे कलाकार पहली बार इस तरह की क्लासिक कृति में काम कर रहे थे। सिर्फ तीन हफ्ते में इस तरह की कृति को तैयार करना आसान नहीं है। बेसिक ड्रामा कोर्स वाले कलाकारों के स्तर पर तो यह उनके लिए चुनौती से भरा ही कहा जाएगा। फिर भी कुछ बातों पर ध्यान देना ज़रूरी है, जैसे कि बहुत धीमे स्वर में संवाद कहना। नाटक के बहुत से डायलॉग दर्शकों को सुनाई नहीं दिए। इसी तरह से अपने किरदारों को अभिनीत करने में प्रारंभिक हिचक नज़र आती रही।The cast of the play 'Yerma', directed by Shekhar Kawant. A review by Shakeel Akhter. IndoreStudio.com.नाटक की मंच सज्जा, प्रकाश योजना, साउंड और पार्श्व संगीत असरदार रहे। इसमें राहुल चौहान और राहुल गुसैन का योगदान रहा। एनएसडी में किसी भी प्रॉडक्शन के लिए स्वाभाविक रूप से जिस तरह का सहयोग मिलता है, हर बार की तरह उसकी भी बड़ी भूमिका रही। शेखर कावंत चूँकि एनएसडी के पूर्व छात्र हैं, इसलिए उन्हें यहाँ पर काम का व्यावहारिक ज्ञान है। इसका लाभ उन्हें मिलता है। उन्होंने एनएसडी से डिग्री लेने के बाद मुंबई में मुकेश छाबड़ा जी के नाट्य समूह के साथ जुड़कर निर्देशन का सफ़र शुरू किया और अपने रंग प्रयोगों से अपनी अलग पहचान बनाई है। तीन हफ्ते में नए कलाकारों के साथ तैयार उनका यह प्रॉडक्शन उनकी इसी योग्यता को सिद्ध करता है।Shekhar kawant With Yerma Team. Report: Shakeel Akhter, indorestudio.comShekhar kawant With Yerma Team. Report: Shakeel Akhter, indorestudio.comबता दें कि येरमा, लेखक फ़ेडेरिको गार्सिया लोर्का (Federico García Lorca) लिखित ‘रूरल ट्रिलॉजी’ (ग्रामीण त्रयी) का हिस्सा है। इसी त्रयी के दो और नाटक हैं – ‘ब्लड वेडिंग’ और ‘द हाउस ऑफ बर्नार्डा अल्बा’। यह नाटक केवल एक स्त्री की कहानी नहीं है, बल्कि पुरुष-प्रधान समाज की उन बेड़ियों का भी प्रतीक है जो इंसान को अंदर से खोखला कर देती हैं। इसे 1934 में लिखा गया था और इसका प्रीमियर मैड्रिड (स्पेन) में उसी साल हुआ था। उसके बाद से ही इस नाटक के दुनिया भर के देशों में अनगिनत मंचन हुए हैं। एनएसडी के साथ देश के कई थियेटर ग्रुप्स ने इसे खेला है। येरमा को लंदन में अभिनेत्री बिली पाइपर (Billie Piper) ने आधुनिक रूपांतरण के साथ प्रस्तुत किया है। आगे पढ़िये -मॉस्को में कर्मांकुश और राम चरितम्  https://indorestudio.com/nsd-students-performance-gitis-fest-moscow/

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