Wednesday, May 13, 2026
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‘योरकोट’ के मंच पर छलका दुष्कर्म की घटनाओं का दर्द,साथ आये 40 से ज़्यादा रचनाकार

इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। मॉनसून की पहली बारिश के मौके पर योरकोटने विजय नगर स्थित रिफ्फिंग कल्ट (Riffing Cult) कैफ़े में ओपन माइक के दसवें संस्करण (10.0) का आयोजन किया। कार्यक्रम में पढ़ी गई कविताओं में महिलाओं और बच्चियों के साथ बढ़ती दुष्कर्म की घटनाओं पर दर्द नज़र आया। बिहार में चमकी बुखार के कारण बच्चों की मौत पर भी दुःख व्यक्त किया गया।

 

कार्यक्रम में  40 से ज्यादा कवि/शायरों/ लेखकों ने अपनी कविताओं, ग़ज़लें, कहानियों एवम् गीत सुनाए। अदब के शहर में उभरते नए लेखकों और परिपक्व कवियों ने अपने अपने अंदाज़ में ख़ूबसूरत सुबह बनाई। कार्यक्रम का आयोजन कवि अवधेश शर्मा ध्रुवऔर संचालन  मयंक दादु कायनातने किया। कार्यक्रम के  शुरुआती दौर में  दीपक मालवीया ने अपना शेर यूँ पढ़ा अश्क़ नज़र न आए कोई रोए तो,

तू ऐसी भी आँख बना ऊपरवाले जिस पर ख़ूब दाद और तालियां मिली। 

 

अवधेश शर्मा ध्रुवने शहर की बारिश पर पढ़ा –

 

दिन में भी यहाँ रात बहुत है,

इस शहर में बरसात बहुत है।”

 

यही वो मौसम थे जिसमें कश्तियां चलाते थे

यही वो मौसम है के अब भीग जाने से डरते है

अपूर्व गुजराथी

 

तेरा  रूप  बयाँ  ना  कर  पाया  मैं,

लानत  है   मेरे   शायर   होने   पर ।

दीपक मालवीय

 

कार्यक्रम में पहली बार परफॉर्म कर रही मधु रानेजा पंचारिया ने पढ़ा-

मुझे डर लगता है, मेरे आत्म सम्मान से,लड़की होने की पहचान से।

मुझे डर लगता है, मेरे उड़ते पंखों के कटने से,

कलंक का टीका लगने से।

मुझे डर लगता है, हैवानियत की नज़रों से,

बलात्कार की घटनाओं से।

मुझे डर लगता है बढ़ते अत्याचार से,

कलयुग के साक्षात्कार से।

मुझे डर लगता है इंसान के हैवान बनने से,

भगवान की पहचान मिटने से।।”

 

माघवी राणा ने भी पहली बार पढ़ा-

मर्यादा , इज़्ज़त, पाबंदी,

है अगर तुम्हारी सोच आधी,

फिर क्यों,

उस सोच का इम्तिहान वही है।

सम्मान वही है, अपमान वही है,

दुनिया की भीड़ में अंजान वही है।”

 

सोनाली हुंका ने पढ़ा

क्या सही, क्या गलत

क्या करें, क्या ना करें

कौन अच्छा, कौन बुरा

कौन दोस्त, कौन दुश्मन

क्या किसी के मन के भीतर..?”

 

मेरी हर चीज़ अब उसके नाम पे ही कुर्बान है,

वो शख़्स कोई और नहीं मेरी अम्मी जान है

~निश्छल मिश्रा

 

शब्द शर्मा ने पढ़ा-

नन्ही आखों में ख़्वाब सजाना सीख रहा हूँ 

खुलें आसमानों में पर फैलाना सीख रहा हूँ 

माना की मैं बस मिट्टी हूँ उस मिट्टी को दीप बनाना सीख रहा हूँ 

और काट दिये मुश्किलों ने पांव मेरे

पर बना कर हौसले को पांव अपने मंज़िलों तक जाना सीख रहा हूँ”

 

मयंक दादु कायनातने अपने मिसरे कुछ यूँ बयां किये – 

मैं एक रवायत छोड़ कर एक नई कवायत कह जाऊंगा,

हाँ..जिस दिन मैं तुमको भूलूँगा 

उस रोज़ तुमको बहुत याद आऊंगा।

 

अमित कौरव ने पढ़ा-

एक नन्ही कली से मिला था मैं ,

जो हँसती चहकती आती थी।

अपनी नटखट बातों से,

सबका मन बहलाती थी।

हँसना ही जैसे काम था उसका,

अपने संग सबको हंसाती थी।

वो कोहिनूर सी लगती थी,

प्यार से जब मुस्काती थी।

थी नहीं वो आज भी है,

बस आजकल उदास सी है।

अपनी कीमत भूलकर जो,

ज़्यादा आस पास की है।

सारी दुनिया छान चुकी वो,

खुद से कुछ अनजान सी है

पहाड़ों से जो लड़ी कभी,

कुछ पत्थरों से परेशान सी है |

यूँही उसे दुर्बल न कहना,

आएगी वो लौटकर।

सारी दुनिया मे छा जाएगी,

आंखों का पानी पोछकर।

इंतज़ार है जिसका पूरी धरा को,

शुभ घड़ी वो जल्दी आएगी।

सारा जग उज्ज्वल हो जाएगा,

जब फिर से वो मुस्कायेगी।”

 

 खुशबू मालवीया, शुभांगी तिवारी, रोहित भिंडे, अमित भट्ट,अंकित विश्वकर्मा, खेलेंद्र सूर्यवंशी, प्रशांत, शैलेन्द्र चौहान, योगेश्वर मिश्रा, विनय शर्मा, श्रुति वर्मा, अक्षत, संजय, आदि ने भी बहुत बेहतरीन रचनाएँ पेश की। आखिर में आभार मयंका ने माना। कार्यक्रम की तस्वीर और वीडियों चिंटू सिसोदिया (ब्राइट फोटोब्लोग) ने लिए।                 

 

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