शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। एक लेखक अपने वक्त का आईना होता है। वह अपने दौर की बातें किसी कैमरे की मानिंद अपने भीतर जज़्ब करता रहता है और फिर वक्त आने पर वह उसे अपनी लेखनी में ढालकर अभिव्यक्त करता है। अगर वह लेखक ग़ालिब जैसा ज़हीन और संवेदनशील शायर हो तब वह लेखनी एक अमर दास्तान बन जाती है। इसी अज़ीम शायर की ज़िदंगी को अपने 90 मिनट के उर्दू नाटक ‘ज़िक्रे ग़ालिब’ में ज़फर मोहिद्दीन ने अपने सोलो एक्ट में पेश किया। एलटीजी,दिल्ली में मंचित यह नाटक एक जीवंत दस्तावेज़ की तरह सामने आता है, अतीत के भावनात्मक दौर में ले जाता है।
ज़फ़र की संकल्पना,निर्देशन और अभिनय: ‘ज़िक्रे गालिब’ की संकल्पना, निर्देशन और अभिनय ज़फर मोहिद्दीन का ही है। पेशे से आर्किटेक्ट ज़फर बेंगलुरू के एक प्रतिष्ठित कलाकार हैं। रंगमंच के साथ सिनेमा के हस्ताक्षर हैं। वे बेंगलुरू में कठपुतलियां थियेटर ग्रुप के संचालक हैं। अपने ग्रुप के ज़रिये 20 से अधिक सफल नाटकों का मंचन कर चुके हैं। मंच पर वे ‘ज़िक्रे ग़ालिब’ को ग़ालिब के लिखे ख़तों और उनकी शायरी के साथ पेश करते हैं। यानी यह प्रस्तुति ग़ालिब के ‘प्रोज़ और पोएट्री’ का समायोजन है। इसमें एक तरफ़ जहाँ जफर, गालिब के ख़तों के साथ दर्शकों से मुखातिब हुये तो दूसरी तरफ़ गालिब की चुनिंदा नज़्मों और ग़ज़लों को अपनी सुरीली आवाज़ में गायक रघुपति झा ने पेश किया। अभिनय और संगीत की इस जुगलबंदी के बीच में एक कड़ी स्मिता श्रीनिवासन के नृत्य की भी है। उन जगहों के लिये, जहाँ पर दर्द और ख़लिश है। तन्हाई,उदासी या तल्ख़ी है। ऐसी जगहों पर मंच पर कथक के अनुशासन में नंदिनी मेहता अपनी भावपूर्ण अभिव्यक्ति से इस शो को एक नया आयाम देती हैं।
महान शायर की ज़िंदगी का दस्तावेज़: ‘ज़िक्रे गालिब’ की खूबी सशक्त अभिनय, बेहतरीन गायिकी और उत्कृष्ट नृत्य संरचना भर नहीं है। असल में यह नाटक उर्दू भाषा के सार्वकालिक महान शायर मिर्ज़ा बेग असदुल्लाह ख़ान (1796-1869) की ज़िदंगी का दस्तावेज़ है। उनके उस वक्त के हालात की ज़िंदा तस्वीर है। इसमें भी सबसे ज़्यादा, तबाह होती दिल्ली का दर्द है। मिसाल के लिये एक जगह गालिब के ख़त को ज़ुबां देते हुये ज़फर कहते हैं- ‘11 मई 1857 को यहाँ फसाद शुरू हुये। उसी दिन से मैंने अपने घर का दरवाज़ा बंद कर दिया है’। दूसरी जगह वे बयान करते हैं – ‘दिल्ली को वैसा ही आबाद जानते हो, जैसे आगे थी? क़ासिम जान की गली, मीर ख़ैराती के फाटक से फतेहउल्लाह बेग खाँ के फाटक तक बेचिराग़ है। हाँ,आबादी तो है। मगर वो है गुलाम हुसैन की हवेली में बने अस्पताल में। और काले साहब के मकानों में एक और साहब, आलीशान इंग्लिश्तान तशरीफ़ रखते हैं। लाल कुएं के मुहल्ले में खाक़ उड़ती है। आदमी का नामो-निशान नहीं’।
दिल्ली में अब ये पाँच बातें कहाँ: एक और जगह दिल्ली की पहचान इस तरह बताते हैं- ‘दिल्ली की हस्ती मुनहसिर कई हंगामों पर थी। क़िला,चाँदनी चौक। हर रोज़ बाज़ार मस्जिदे-जामा का। हर हफ़्ते सैर जमना के पुल की और हर साल मेला फूलवालों का। अब ये पाँचों बातें कहाँ, फिर कहो दिल्ली कहाँ’? और फिर हालात के चश्मदीद बनकर ग़ालिब के लफ़्ज़ बयान करते हैं – ‘परसों मैं सवार होके कुओं का हाल मालूम करने गया। मस्जिदे जामा से होता हुआ, राजघाट के दरवाज़े को चला। पंजाबी गठड़ा, होजीवाड़ा, रामजी गंज, सादत ख़ान का गठड़ा, जरनैल की बीवी की हवेली, रामजी दास गोदामवाले के मकानात, साहब राम का बाग, हवेली.,इनमें से किसी का पता नहीं। क़िस्सा मुख़्तसर, शहर सहरा हो गया है। अब जो कुएं जाते रहे तो ये शहर सहरा-ए-करबला हो जायेगा’!
मुश्किल हालात में जन्म लेती शायरी: इन हालात के बीच से गुज़रती ग़ालिब की मुश्किल जिदंगी है और उनके ज़हनो दिल पर पड़े असर से जन्म लेती शायरी। जिसे ज़फर मोहिद्दीन के जीवंत एकल अभिनय के बीच, गायक रघुपति झा दिल को छूने वाली आवाज़ में पेश करते हैं। इस तरह दर्शक, ग़ालिब की चुनिंदा रचनाओं, उसके लेखन और उसके पीछे के हालात से रूबरू होते हैं। इन चुनिंदा ग़ज़लों के चंद मिसरे बानगी के लिये ज़रा पढ़ लीजिये – ‘वो तेरा दौर वो विसाल कौन कहाँ / वो शबो रोज़ वो माह-ओ-साल कहाँ…हरेक बात पर कहते हो कि तू क्या है / तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़े गुफ्तगू क्या है…दिले नादान तुझे हुआ क्या है / आख़िर इस दर्द की दवा क्या है… गालिब छूटी शराब पर अब भी कभी-कभी / पीता हूँ रोज़-ए-अब्र-ओ-शब-ए-माहताब में …उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक / वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है … पिला दे ओक से साकी जो हम से नफ़रत है / प्याला गर नहीं देना, न दे, शराब तो दिखा…आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक / कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक …हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पर दम निकले / बहुत निकले मेरे अरमां लेकिन फिर भी कम निकले…ना था कुछ तो खुदा था,कुछ ना होता तो ख़ुदा होता / डुबोया मुझको होने ने, ना होता मैं तो क्या होता !
हर ख़त एक नये मंज़र का तर्जुमानी: नाटक में ग़ालिब का हर ख़त एक नये मंज़र को सामने लेकर आता है। लफ़्ज़ दृश्य बनकर आँखों में तैरने लगते हैं- ‘सुबह का वक्त है, जाड़ा खूब पड़ रहा है, अँगीठी सामने रखी हुई है। दो हरफ लिखता हूँ, आग तापता जाता हूँ। आग में गरमी सही मगर हाय वो आतिशे सय्याल (शराब) कहाँ ? या फिर -‘बरसात का हाल ना पूछो ख़ुदा का कहर है,क़ासिम ख़ान की गली साबिर ख़ान की नहर है, मैं जिस मकान में रहता हूँ मस्जिद की तरफ़, दालान की तरफ़ जाते हुये जो दरवाज़ा था, गिर गया। सीढ़ियाँ गिरना चाहती हैं, सुबह के बैठने का हुजरा छुप रहा है। छतें ढीली हो गईं है। अब्र दो घंटे बरसे तो छतें चार घंटे बरसती हैं’। हर ख़त जैसे ग़ालिब की ज़िदंगी का रोज़नामचा है। इसमें तंज़ भी हैं और नसीहतें भी। गौर कीजिये – ‘पीयो,खाओ,मज़े उड़ाओ। मगर ये याद रहे, मिस्री की मक्खी बनो,शहद की मक्खी ना बनो’ …. ‘खुदा ने मुझपर रोज़ा माफ़ कर दिया है। रोज़ा रखता हूँ मगर रोज़े को बहलाये रखता हूँ। कभी पानी पी लिया। कभी कोई टुकड़ा रोटी का खा लिया। जिसके पास रोज़ा खोलकर खाने को कुछ ना हो तो वह रोज़ा ना खाये तो क्या करे’?
सहज अभिनय और बाँधकर रख देने वाली आवाज़: नाटक में ज़फर साहब अपने किरदार को बेहद सहजता से जीते हैं। उनकी खरज वाली आवाज़ और कहन का अंदाज़ प्रेक्षकों को बाँधकर रख देता है। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि ज़फर एक प्रोफेशनल वाइस ओवर आर्टिस्ट हैं। कई फ़िल्मों,डाक्युटमेंट्रीज़,प्रोग्राम्स और विज्ञापनों में आवाज़ दे चुके हैं। नाटक में ग़ालिब की पोएट्री और प्रोज़ का बेहद उम्दा चयन है। इस काम में ज़फर मोहिद्दीन ने गुलज़ार, प्रो.गोपीचंद नारंग और टीपी इस्सर जैसे दिग्गज लेखकों के अनुवादित काम को महत्व दिया है, हालांकि नाटक में शामिल ज़्यादातर कंपोज़िशन जगजीत सिंह की हैं, मौलिक धुनों का नितांत अभाव है। प्रकाश योजना,मंच सज्जा,मेकअप,कॉस्ट्यूम नाटक के अनुकूल रही। बैक स्टेज के इन कामों में प्रदीप बेलावाड़ी, आक़िब जमाल और सुहैल आर्यन का सहयोग रहा। इस प्रस्तुति को दिल्ली एलटीजी में डॉ.सईद आलम के Pierrots troupe के सहयोग से प्रस्तुत किया गया। इसके लिये ज़फर मोहिद्दीन ने आलम साहब के प्रति आभार जताया। उन्होंने दर्शकों की तालियों के बीच कहा, – ‘ज़िक्रे ग़ालिब’ को गालिब के शहर दिल्ली में परफॉर्म करते हुये मुझे बहुत ख़ुशी हुई। आप दर्शकों ने जिस तरह से पूरे नाटक को देखा,रेस्पांस दिया,यह हमारे लिये बड़े सम्मान और हौसले की बात है।
(Please help Indore studio. Donate by visiting this link – https://indorestudio.com/donate/)

