चला गया अंग्रेज़ों के ज़माने का ‘जेलर’

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इदरीस खत्री, इंदौर स्टूडियो। असरानी हमारे बीच नहीं रहे। वैसे तो उन्होंने फिल्मों में कई किरदार निभाये लेकिन फिल्म ‘शोले’ में उनका अभिनय हमेशा के लिये दर्शकों की याद बन गया। आज उनके जाने पर वही किरदार आँखों में घूम रहा है। उनका संवाद गूँज रहा है- ‘हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं’! इस श्रद्धांजलि लेख में उनकी फिल्मी करियर के साथ, उनकी कही बातों की याद आ रही है। उनका निधन 84 बरस की उम्र में हुआ। उनके निधन की पहले भी तीन बार खबरें आईं, लेकिन हर बार वो अफवाह ही निकली, लेकिन इस बार यह सच साबित हुई। नाटकों से अभिनय की शुरूआत हुई: असरानी ने अभिनय की शुरुआत नाटकों से की थी। यह शुरुआत जयपुर में बिताए बचपन के दौरान ही हो गई थी। इस बारे में उन्होंने एक बार बताया था: “जयपुर में स्कूल की रामलीला में लक्ष्मण का किरदार निभाया था। जब लोग तालियां बजाते थे, तो लगा कि कुछ खास कर रहा हूँ। वहीं से अभिनय का बीज मन में पड़ा।” जयपुर में ही उनके पिता की साड़ियों की दुकान “लक्ष्मी साड़ी” राजमंदिर के पास है। यह उनके भाई के बच्चे चला रहे हैं। उन्होंने सेंट जेवियर्स स्कूल से पढ़ाई की, जहाँ वे डांस, ड्रामा और संगीत में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते थे।जयपुर आकाशवाणी का वह ऑडिशन: असरानी ने एक साक्षात्कार में बताया था: “1955 में जयपुर आकाशवाणी की स्थापना हुई थी। बच्चों के ड्रामे के लिए ऑडिशन चल रहा था। एक अफ़सर ने कहा –‘ नाखून काटो, साफ कपड़े पहनो। अगले दिन तैयार होकर गया तो उसी अफ़सर ने कहा – ‘काम ही पूजा है।’ यह बात मेरे ज़हन में छप गई।” उनका पहला रेडियो नाटक था ‘जॉर्ज’ – एक ऐसा किरदार जो हर काम में टांग अड़ाता था। यह इतना लोकप्रिय हुआ कि मंचन भी होने लगे और उन्हें पाँच रुपये पारितोषिक मिला- जबकि स्कूल की फीस मात्र एक रुपये थी।अभिनय की शिक्षा और FTII का अनुभव: 1960–62 तक भाई ठक्कर से अभिनय की शुरुआती शिक्षा ली। पिता के विरोध के बावजूद बॉम्बे पहुंचे। जयपुर रेडियो और मुंबई आकाशवाणी में वॉयस ओवर आर्टिस्ट के रूप में काम किया। किशोर साहू और ऋषिकेश मुखर्जी से मुलाकात हुई, जिन्होंने अभिनय सीखने की सलाह दी। 1964–66 में FTII पुणे की पहली बैच में शामिल हुए। जया भादुड़ी उनकी सहपाठी थीं। कॉमेडी हमेशा से मेरे अंदर थी: उन्होंने कहा था: “कॉमेडी मेरे भीतर थी, लेकिन मैंने चार्ली चैपलिन और किशोर कुमार को देखकर सीखा कि हँसी के पीछे भी एक दर्द होता है।” FTII में इंदिरा गांधी के दौरे पर उन्होंने शिकायत की कि छात्रों को काम नहीं मिलता। इंदिरा जी ने फिल्म इंडस्ट्री से अनुरोध किया कि FTII के छात्रों को अवसर दिए जाएं।फिल्मी सफर और संघर्ष: 1966 में ‘हम कहाँ जा रहे हैं’ में कॉलेज बॉय का किरदार मिला। 1970 में ‘हरे कांच की चूड़ियां ‘में त्रिपाठी का किरदार निभाया- हीरो थे विश्वजीत। इसी साल गुजराती फिल्मों की शुरुआत की। फिल्म बावर्ची’ (1972), नमक हराम, मेरे अपने, परिचय, कोशिश जैसी फिल्मों में यादगार अभिनय किया। असरानी ने कहा था: “गुलज़ार साहब ने ‘कोशिश’ में नकारात्मक भूमिका दी, लेकिन दोस्तों ने कहा – ‘तुम तो हँसाते हो, वही करो’। ‘शोले’ का जेलर और हास्य की शैली: असरानी ने फिल्म शोले के किरदार के बारे में कहा था: ‘हम अंग्रेजों के ज़माने के जेलर हैं’ – ये डायलॉग मैंने हिटलर की स्टाइल में बोला। चाल, हाथ की हरकतें और आवाज़ की तीव्रता को कॉमेडी में ढाल दिया।” यह किरदार आज भी अमर है- एक तानाशाह की विडंबना को हास्य में बदलने की कला की एक मिसाल।लीड रोल, निर्देशन और गुजराती सिनेमा: असरानी ने ‘चला मुरारी हीरो बनने और सलाम मेमसाब’ में मुख्य भूमिका निभाई। 1972–82 तक गुजराती फिल्मों में बतौर हीरो काम किया। बतौर हीरो गुजराती की फिल्म ‘संसार चक्र, सात कैदी, पाखीनो मानो, छैल छबीला गुजराती और जुगल जोड़ी में काम किया। 1974–97 तक असरानी ने 6 फिल्मों का निर्देशन भी किया। ये फिल्में थीं-अहमदाबाद नो रिक्शा वालो (1974) मां बाप (1977) चला मुरारी हीरो बनने (1977/ लेखक और निर्देशन)। उनका विवाह मंजू बंसल से 1970 में विवाह हुआ था। मंजू बंसल ने कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया। राजेश खन्ना के साथ ‘बावर्ची’ से दोस्ती हुई।उपलब्धियाँ और सम्मान : असरानी को बालिका वधू और आज की ताज़ा खबर’ के लिए बेस्ट कॉमेडियन अवार्ड मिला। 70 के दशक में लगभग 101 हिंदी फिल्मों में काम किया। 80 के दशक में लगभग 107 फिल्मों में अभिनय किया। कुल मिलाकर लगभग 350 फिल्मों में अभिनय किया। फिल्म ‘नमक हराम, रफू चक्कर, चुपके चुपके, बिदाई’ जैसी फिल्मों में भी उनके किरदार यादगार रहे। आगे पढ़िये – बीवी कारंत के दौर का रंगमंडल फिर होगा जीवंत -चित्तरंजन त्रिपाठी  https://indorestudio.com/karanth-bharatbhawn-nsd-chittranjan-tripathi/

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