शकील अख़्तर,इंदौर स्टूडियो। राजेंद्र गुप्ता, हिमानी शिवपुरी, सुरेश भारद्वाज, जयंत देशमुख और आमोद भट्ट। जब रंगमंच के ये साधक किसी नाटक में साथ आते हैं। तब प्रस्तुति में कैसा रचनात्मक ‘जादू’ होता है, इसकी मिसाल है नाटक – ‘जीना इसी का नाम है’। लेकिन ज़रा ठहरिये…’24 एक्ट’ की दिल को छूने ले वाली इस प्रस्तुति में दो प्रमुख नाम और भी शामिल हैं…पहले हैं, राकेश वेदा जिन्होंने इस नाटक को लिखा और जिसे अपनी दिलचस्पी लेकर राजेंद्र गुप्ता और हिमानी शिवपुरी ने प्रस्तुति के रूप में आगे बढ़ाया। दूसरे हैं, इस नाटक के निर्देशक सुरेश भारद्वाज के सहयोगी सुपुत्र, राहिल भारद्वाज। राहिल भी अपने पिता की रंग और सिने विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि असल में मूल रूप से यह प्रस्तुति अलेक्सी अर्बुज़ोफ़ के लिखे नाटक ‘ओल्ड वर्ल्ड’ पर आधारित है।
नाटक के दृश्यों में बहते गये दर्शक: ‘जीना इसी का नाम है’ का 22 वें भारत रंग महोत्सव में मंचन हुआ। कमानी ऑडिटोरियम में हुये इस नाटक में दर्शक बहते चले गये। 80 मिनट कब बीते पता ही नहीं चला। इस बीच मंच पर जब राजेंद्र गुप्ता और हिमानी शिवपुरी एक ही छतरी के नीचे बारिश में भीगे, युवा जोड़ों की तरह थिरके और जब हिमानी की गोद में सिर रखकर उन्होंने अपनी ‘नई बॉस’ के आगे ख़ुदको सरेंडर किया। रोमांचित दर्शक भी इस ‘सिक्टी प्लस’ रोमांस में खो गये।…युवा दर्शक इस ‘अनूठी दोस्ती’ से ख़ुद को अलग नहीं रख सके। इस नाटक ने बड़े प्यार से दर्शकों को संदेश दिया कि अकेली, उदास और साठ पार ज़िदंगी भी हसीन बन सकती है बर्शते उसमें रूटीन से हटकर मस्ती का नया रंग भर दिया जाये। सोच बदलने वाला कोई दोस्त, कोई साथी मिल जाये। फिर उदासिया तो क्या ग़म भी आँसू बहाते हैं!
दो विपरीत किरदारों की कहानी: यह नाटक दो विपरीत स्वभाव वाले पात्रों डॉक्टर भुल्लर (राजेंद्र गुप्ता) और सरिता शर्मा (हिमानी शिवपुरी) की कहानी है। 69 बरस के डॉक्टर भुल्लर मुंबई में समंदर के किनारे एक हेल्थ सेंटर के चीफ़ मेडिकल ऑफिसर हैं। वहाँ पर सरिता शर्मा एडमिट हैं। एक मरीज़ के रूप में डॉ.भुल्लर से उनकी स्वाभाविक मुलाक़ात होती है। मगर पहली मुलाक़ात में ही दोनों को मालूम हो जाता है कि दोनों मंगल और शुक्र तारे की तरह दो अलग प्रकृति के व्यक्तित्व हैं। सरिता शर्मा एक थियेटर आर्टिस्ट हैं वे ज़िदंगी से भरपूर हैं। उन्हें ख़ूबसूरत रहना और उसी अंदाज़ में पेश आना अच्छा लगता हैं। वे अपने ग़मों को भुलाकर बिंदास तरीके से ज़िदंगी को जीने में यक़ीन रखती हैं। वहीं डॉक्टर भुल्लर बेहद अनुशासन प्रिय और रूखे मिज़ाज के हैं। सिगरेट छोड़ने की चाहत में पिछले छह साल से चाकलेट लगातार खा रहे हैं। बेतरतीब से रहते हैं। शुरूआती मुलाक़ात में ही दोनों के बीच विकर्षण का भयंकर विस्फोट होता है।
हर सवाल के लाजवाब तर्क: डॉक्टर भुल्लर को शिकायत है अस्पताल में एडमिट मरीज़, सरिता शर्मा ने अपना फार्म तक ठीक से नहीं भरा है। उसमें उम्र नहीं लिखी है। मैरिड हैं या अनमैरिड ये भी नहीं बताया है। एपाइंटमेंट फिक्स होने के बावजूद समय पर नहीं आईं। इस पर सरिता शर्मा के अपने तर्क हैं। …ज़रा ग़ौर फरमाइये- ‘डॉक्टर साहब क्या आपको पता नहीं, किसी महिला से उसकी उम्र पूछना, निहायत बेअदबी की बात है। ‘… ‘और आपको मेरी शादी से क्या लेना-देना? ’…10 बजे की जगह मैं 1 बजे मैं इसीलिये आ सकी, क्योंकि मैं गार्डन में चिड़ियों को दाने डाल रही थी। वरना दाना खिलाने का टाइम गड़बड़ा जाता!’ ज़ाहिर है कि तल्ख़ मिज़ाज डॉक्टर साहब ऐसी अजीब तर्कों पर कसमसा जाते हैं, उखड़ जाते हैं!
रात को आप कहाँ गायब हो जाती हैं: डॉ.भुल्लर को जब अपने सवालों का जवाब नहीं मिलता, तब वे उनके पास आई स्टाफ़ की शिकायतों का कच्चा चिट्ठा खोल देते हैं। …सरिता शर्मा से इसके भी लावजाब जवाब देती हैं – ‘डॉक्टर साहब मैं आधी रात के वक्त अपने वार्ड की खिड़की से इसीलिये गायब हो जाती हूँ, क्योंकि मुझे चाँद को देखना बहुत अच्छा लगता है। मैं रात को गार्डन में देर तक चाँद को निहारती हूँ। घूमती हूँ फिरती हूँ और सुकून से बैठकर गीत गुनगुनाती हूँ।… और आप ही बताइये क्या सुबह-सुबह वार्ड में अपने बिस्तर बैठकर भजन गाना, क्या बुरी बात है?’
जब बदलते हैं बेमेल-समीकरण: मगर हॉस्पिटल की शुरूआती मुलाक़ातों के विपरीत जल्द ही दोनों एक-दूसरे के दोस्त बन जाते हैं। यह सब होता है, सरिता शर्मा यानी हिमानी शिवपुरी के ज़िदंगी से भरपूर किरदार की वजह से। इस दौरान दोनों की आप बीती सामने आती है। डॉक्टर भुल्लर की पत्नी तब ही चल बसी थी, जब उनकी बेटी सिर्फ 5 साल की थी। अब बेटी शादीशुदा है। उन्हें बेटी और दामाद के आने का, बीते डेढ़ साल से इंतज़ार है। जबकि सरिता शर्मा के पति एक नामी कलाकार हैं। वे कार्यक्रमों की वजह से देश-विदेश के दौरे पर रहते हैं। वे एक यंग, थियेटर आर्टिस्ट से शादी कर चुके हैं। लिहाजा सरिता शर्मा दोनों से अलग अपनी ज़िदंगी जी रही है। ज़ाहिर है कि दोनों एकाकी और टूटी ज़िदंगी जीने को मजबूर है। सवाल है कि क्या दोनों की पटरी एक-दूसरे के साथ कभी बैठ सकेगी ? क्या विपरीत प्रकृति वाले दोनों उम्रदराज़ बची ज़िदंगी के सफ़र पर साथ चल सकेंगे? नाटक अंत तक इसी कशमकश के साथ आगे बढ़ता है।
अभिनय कला के नायाब रंग: नाटक में राजेंद्र गुप्ता और हिमानी अपनी अभिनय कला के बेहतरीन आयाम और रंग बिखरते हैं। कहानी के अनुसार, मंच पर खुद को बेहद बेहतरीन अंदाज़ में प्रस्तुत करते हैं। दर्शकों को सहज ही अपने किरदारों से बाँध लेते हैं। एक रोमानी और ज़िदंगी से भरपूर पात्र के रूप में हिमानी शिवपुरी दर्शकों की आँखों और दिल में कुछ ज़्यादा ही उतर जाती हैं। नाटक मंच पर जितना जीवंत था उसको प्रभावशाली बनाने में नेपथ्य के कलाकारों का उतना ही महत्वपूर्ण श्रम रहा।
नेपथ्य का योगदान मंच का आकर्षण : नाटक में दृश्यों को बदलने के लिये स्लाइडिंग सीन्स फ्रेम्स या पैनल का कल्पनाशील उपयोग किया गया है। संगीत दृश्यों और दर्शकों दोनों को जोड़ता रहा। प्रॉप्स और वेशभूषा किरदारों में नया रंग भरती हैं। फिर चाहे डॉक्टर भुल्लर का जैकेट हो या कोट या रेस्टारेंट जाने के लिये सरिता शर्मा की नई ड्रेस। नीचे गिरा पड़ा छाता भी नाटक का हिस्सा बन जाता है। बैक स्टेज के इन कामों में जयंत देशमुख, आमोद भट्ट के साथ ही ख़ुद राहिल भारद्वाज, राजीव मिश्रा, किरण कुमार, देवरूप और आशीष शर्मा का योगदान रहा। इस सफल संयोजन,प्रस्तुति और प्रबंधन में निर्देशक सुरेश भारद्वाज एक बार फिर एक स्तंभ की तरह सामने आये। हम जानते ही हैं सुरेश भारद्वाज रंगमंच और सिनेमा के हस्ताक्षर हैं और उनका कला के क्षेत्र में बहुस्तरीय योगदान और काम है। वे अब मुंबई में रहते हुए ‘एक्ट 24’ के ज़रिये रंगमंच और फ़िल्म दोनों के लिये काम कर रहे हैं। नई प्रतिभाओं को देश भर में शिक्षित और संस्कारित कर रहे हैं। नाटक की प्रस्तुति के बाद ख्यात रंग समीक्षक बीएस बाजेली ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की तरफ़ से गुलदस्ता भेंट कर निर्देशक और कलाकारों के प्रति आभार व्यक्त किया। अगले दिन ‘मीट दि डायरेक्टर्स’ के तहत उनसे इस नाटक के निर्माण और निर्देशन को लेकर चर्चा की गई। आगे पढ़िये।
राजेंद्र गुप्ता और हिमानी शिवपुरी का ‘भारंगम’ के मंच पर चला जादू!
RELATED ARTICLES


Excellent performance. Super Show.